नरेश सक्सेना ने कहीं लिखा है कि ‘कविता ऐसी जो बुरे वक्त में काम आए.’ तमस से प्रकाश की ओर, असत्य से सत्य की ओर उसकी इसी अनवरत यात्रा ने उसे मनुष्यता का पर्याय बना रखा है. जब भी मनुष्य के सामूहिक विवेक पर खतरा दीखता है कविता अपनी तन्वंगी काया के साथ खड़ी हो जाती है, रोकती, टोकती और समझाती हुई.
बुरे वक्त से जूझने के लिए हमारे पास नरेश सक्सेना की कविताएँ हैं. नरेश सक्सेना (१६ जनवरी, १९३९) के दो कविता संग्रह ही अभी प्रकाशित हैं- ‘समुद्र पर हो रही है बारिश' और ‘सुनो चारुशीला’. उन्हें वैज्ञानिक कवि भी कहा जाता है. नरेश सक्सेना परफेक्शनिस्ट कवि हैं, किसी-किसी कविता पर तो उन्होंने वर्षों तक कार्य किया है. उनकी कविताओं का गहरा असर ख़ास-ओ-आम सभी पाठकों पर है.
Naresh ji is considered as one of the most prominent contemporary Hindi writer, in the same lineage as Vinod Kumar Shukl ji and Vyomesh Shukl ji. He is not the one who writes a lot but his audience waits for his works. And that says a lot.
I however could not connect with his writing. Maybe some day.
नरेश सक्सेना की 'एक अनाम पत्ती का स्मारक' बहुत छोटी-छोटी तस्वीरों के ज़रिए लिखी गई गहरी कविताओं का संग्रह है। यह मछलियों के दिल, छायादार पेड़ों के वादे, युद्ध की राख और इंसानी संवेदनाओं के बचे-कूचे निशानों में अहमियत तलाशती है।
यह किताब कविता लिखने के तरीके के बारे में नहीं है। यह आपको चीज़ों को बारीकी से देखने की कला सिखाती है। और शायद यही वह चीज़ है जिसे हम सबसे पहले खो देते हैं, अपने आस-पास और अपने भीतर की दुनिया को निष्पक्ष रूप से देखने की क्षमता।
बहुत कम ही ऐसा होता है कि लेखन में विज्ञान और कला का मेल हो, इस किताब में मुक्तिबोध, हरिशंकर परसाई, ज्ञानरंजन और विनोद कुमार शुक्ल की रचनात्मक विरासत के साथ-साथ आइंस्टीन और स्टीफन हॉकिंग जैसी जिज्ञासु सोच का संगम मिलता है। इसे साहित्य और वैज्ञानिक सोच के सहज प्रवाह के नज़रिए के तौर पर देखा जा सकता है। आपको यह किताब ज़रूर पढ़नी चाहिए!