क्या ' हवेली' के बंद दरवाज़ों के पीछे कोई राज़ दफन है?जेठ की वो झुलसती दोपहर और सन्नाटे में डूबा रामपुर गाँव... जहाँ सूरज आग उगल रहा था, वहीं हवेली की ऊँची दीवारों के भीतर एक अलग ही 'तपिश' आकार ले रही थी। यह तपिश मौसम की नहीं, बल्कि उन दबी हुई इच्छाओं और सत्ता के उस खेल की थी, जिसने मर्यादा की हर बेड़ी को पिघला दिया था।
जब ठाकुर जगत सिंह की लाचारी ने हवेली के वारिस के लिए 'नियोग' का रास्ता चुना, तो किसी ने नहीं सोचा था कि शहर से लौटा रघु महज़ एक जरिया नहीं, बल्कि इस सल्तनत का भाग्य विधाता बन जाएगा। रघु—जिसका गठीला बदन और अखाड़े की मिट्टी जैसी सोंधी महक हवेली की औरतों के जमे हुए खून में हलचल पैदा कर देती थी।
एक तरफ सुमित्रा की वो गरिमामयी चुप्पी है जो धीरे-धीरे टूट रह