यूँ बिखरा जब कबीर — जहाँ खोज समाप्त होती हैकबीर को अक्सर एक रहस्यमय संत, चमत्कारिक व्यक्तित्व या धार्मिक प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह पुस्तक उस छवि को स्वीकार नहीं करती।
यूँ बिखरा जब कबीर — जहाँ खोज समाप्त होती है कोई भक्ति-ग्रंथ नहीं है। यह कोई धार्मिक व्याख्या या संत-महिमा नहीं है। यह कबीर को पूजनीय बनाने का प्रयास भी नहीं करती। यह एक विघटन की यात्रा है। इस पुस्तक में चयनित पचास दोहे कबीर को एक असाधारण रूप से स्पष्ट दृष्टि वाले चिंतक के रूप में सामने रखते हैं—जो मनुष्य के मन, उसकी मान्यताओं, उसकी पहचान और उसकी खोज को बिना किसी सांत्वना के उजागर करता है। कबीर यहाँ ईश्वर, धर्म या मोक्ष का प्रचार नहीं करते। वे यह दिखाते हैं कि मन कैसे विश्वास, नैतिकता, आध्य