कुरैशी के जले हुए बंगले की राख ठंडी हो चुकी थी, लेकिन उस राख के नीचे कुछ ऐसा दबा था जो आग से भी ज्यादा खतरनाक था।
इंस्पेक्टर राठौर और हवलदार शिंदे ने मलबे से एक 'काला पिरामिड' बरामद किया—एक सबूत जो उनके करियर का सबसे बड़ा केस बनने वाला था। लेकिन उन्हें अंदाजा नहीं था कि वे सबूत नहीं, बल्कि अपनी मौत को थाने ले जा रहे हैं।
शहर के पुलिस स्टेशन का भारी लोहे का दरवाजा बंद हो चुका है। बाहर तूफान है, और अंदर... नरक।
हवलदार शिंदे अब शिंदे नहीं रहा। उसकी आँखों में अंधेरा है और हाथों में अपने ही साथियों का खून। वह 'इफरीत' वापस आ गया है, और इस बार उसे सिर्फ डर नहीं चाहिए... उसे दावत चाहिए।