हवेलियों की ऊँची दीवारें अक्सर उन राज़ों को छिपा लेती हैं, जो अगर बाहर आ जाएँ, तो कयामत आ जाए।
नवाब वाजिद अली खान की आलीशान हवेली बाहर से जितनी शांत दिखती है, अंदर से उतनी ही अशांत है। जब घर का मुखिया कमजोर पड़ जाता है, तो वफादारी का नकाब उतरने लगता है और दबी हुई ख्वाहिशें बगावत कर देती हैं।
यह कहानी है बेगम ज़ैनब की, जो रस्मों-रिवाजों के रेशमी परदे के पीछे एक दोहरी ज़िंदगी जीने को मजबूर हैं। एक तरफ आदिल, जो महज़ एक नौकर होकर भी हवेली का 'अघोषित मालिक' बनने के सपने देख रहा है और मर्यादा की हर लकीर लांघने को तैयार है। दूसरी तरफ, दिल्ली से आया रेहान—मासूमियत का मुखौटा पहने एक ऐसा खिलाड़ी, जिसके इरादे हवेली की नींव हिला देंगे।