"गुरु" की भक्ति, प्रेम, विरह और गुणगान को शब्दों में अभिव्यक्त करने का असंभव और नादान 'लघु' प्रयास यहाँ किया है।
मई 2000 से मैं 'आर्ट ऑफ़ लिविंग' से जुड़ी हूँ और नवंबर 2002 की देव-दीपावली से आर्ट ऑफ़ लिविंग की टीचर हूँ। (GJ 0166)आर्ट ऑफ़ लिविंग के बहुत सारे कार्यक्रमों (Events) में हिस्सा लिया है, आयोजन (Organize) भी किया है और तन-मन-धन के साथ समय का योगदान भी दिया है। बहुत सारे कोर्स किए और करवाए हैं।
मेरे छोटे-से शहर हिम्मतनगर से लेकर ईडर, अहमदाबाद, गांधीनगर, वासद, वड़ोदरा, नडियाद, सूरत, ऋषिकेश, देहरादून और बेंगलुरु तक गुरुदेव के पीछे-पीछे दौड़ी हूँ, भागी हूँ। कभी दूर से, तो कभी नज़दीक से गुरुदेव के दर्शन हुए हैं। कभी तृप्ति तो कभी अतृप्ति, कभी दुख तो कभी परम आनंद नसीब हुआ है।
आज तक जीवन में कितने उतार-चढ़ाव आए और गए। कभी-कभी श्रद्धा पर सवाल भी उठे। ज़िंदगी के इतने सालों में हालात बहुत कुछ, शायद सब कुछ बदल गया! पर एक शाश्वत सत्य कभी नहीं बदला-वह है गुरुदेव की "कृपा और प्रेम"!
दुखद घटनाएँ, शारीरिक कष्ट, मानसिक पीड़ा, संताप, चिंता, विकट परिस्थितियाँ, अकेलापन, तहस-नहस कर देने वाले हादसे, उचाट, अवसाद और उद्वेग जैसी अनेक तकलीफ़ें आईं और चली भी गईं। लेकिन इतनी सारी तकलीफ़ें सिर्फ़ एक 'कृपा' से दूर हो सकती हैं, यह अपने आप में एक बहुत बड़ा चमत्कार है! हर बार ऐसा अनुभव हुआ है कि मैंने एक 'सुरक्षा कवच' (Life Jacket) पहना हुआ है, कोई अदृश्य शक्ति मेरी रक्षा कर रही है। बाक़ी एक सामान्य मानव की हैसियत ही नहीं है कि इस जटिल और तूफ़ानी संसार-सागर को अकेले पार कर सके। सदा विचलित रहने वाला मन, गुरुदेव के सिर्फ़ तीन शब्द-"सब ठीक है" सुनकर शांत और स्थिर हो जाता है, यह क्या है?
मुझे जीवन में पहली बार गुरुदेव के दर्शन जिस तरह से हुए, वह मेरे जीवन का सबसे बड़ा आश्चर्य रहा है। चलने-फिरने और यात्रा (Travel) क