यह नाटक किसी धर्म, पंथ या गुरु की कथा नहीं है। यह एक मनुष्य की कथा है—जो बाहर की दुनिया जीतने निकला था, पर भीतर की दुनिया से हार गया। यह किसी को सिखाने के लिए नहीं लिखा गया। यह एक आत्म-यात्रा है—जहाँ कलाकार स्वयं को खोजता है, और दर्शक अनायास उसमें स्वयं को देख लेते हैं।