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सहज की साँझ : सिसकन और एहसास

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न ही ये कोई कहानी है और ना ही सहज और साँझ कोई काल्पनिक पात्र। ये जीवंत उदाहरण हैं मूक भावनाओं की अभिव्यक्ति की।
एक तरफ जहाँ सहज जिम्मेदारियों और परंपराओं के भार को निभाता है, वहीं दूसरी ओर साँझ मर्यादा, लज्जा और लोक समर्पण की प्रतिमूर्ति बनकर अपनी खुशियों को न्यौछावर कर देती है।

अपनी खुशियों की कुर्बानी देकर परिवार, समाज सब को खुश रखना , आसान नहीं होता।

जब दिल टूटते हैं तब आवाज़ नहीं होती, बस घुटन होती है।
जब बचपन के ख़्वाब बिखरते है, तो भविष्य अनजाना सा लगता है।

सहज और साँझ कब बड़े हो गए, पता ही नहीं चला।
पता चला तो बस एक ही बात - वो दोनों हर पल एक दूसरे के दिलों में जी रहे थे।

सहज की साँझ - सिसकन और एहसास“, उन अनकहे पलों को चित्रित करने की कोशिश है,
उन अव्यक्त एहसासों को शब्

39 pages, Kindle Edition

Published March 13, 2026

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Alok Kumar

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