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उसका बचपन

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147 pages, Hardcover

First published January 1, 1957

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Krishna Baldev Vaid

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Profile Image for Rajiv Choudhary.
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March 22, 2022
कृष्ण वलदेव वैद के उपन्यास 'उसका बचपन' पढ़ना हुआ. इन्होंने हर बार चौंकाया है. दूसरी तरफ यह कोफ़्त भी है कि इनके लिखे से बहुत देर से वाकिफ़ हुआ. न जानकारी कहें या फिर इन पर साहित्य विमर्शों में चर्चा का अभाव कह नहीं सकता.

एक नौकरानी की डायरी, नर-नारी के साथ उसका बचपन उनकी तीसरी रचना है जिसे पढ़ना हुआ. हमेशा की तरह इनकी शब्दों की मंजरकशी के साथ, इंसानों के मनोविज्ञान के इनके परख को जिस तरह इन्होंने उकेरा है वह बाँधे रखता है.

वैद जी वाकई मन को पढ़ने वाले 'वैद' कहे जा सकते है. हम जैसा महसूस करते है या लेखन के वक्त हमारे पात्रों का मन उस मौजूं में क्या महसूस करता होगा उसे उकेर हूबहू उतार पाना कहाँ संभव होता है. लेकिन इन्होंने अपनी रचनाओं में मानव-मन के सोच को लेखन में उतार के रख दिया है. चाहे वह मन में किसी स्केच की तरह आए या अनर्गल ही सही.

ठीक ऐसा ही उन्होंने 'उसका बचपन' उपन्यास में मुख्य पात्र के शिशु मस्तिष्क में उठने वाले ऊथल-पुथल को दर्ज किया है. साथ ही उसके परिवेश और आस-पास के घटना क्रम के साथ उसके परिवार के अन्य पात्रों का भी.

आप इनके शैली के साथ लेखक के व्यापक दृष्टि को इन्हें पढ़े बिना न समझेंगे. हिंदी लेखन एवं उपन्यासों के पाठक के तौर पर अगर आप इन्हें अब तक न पढ़ा हो तो बहुत कुछ मिस करेंगे.
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