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वीतराग

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हमारे स्मृतिहीन समय में कविता में भी विस्मृति व्याप गयी है। युवा कवि वसु गंधर्व की कविता इस प्रवृत्ति का अपवाद है। उसमें ‘स्मृतियों का अपना गल्प’ सहेजने का जतन है। उनके यहाँ अनन्त, शाश्वत, प्राचीन, उद्गम, प्रागैतिहासिक नींद, निराकार पतझर, निर्लिप्त तन्मयता, उँगलियों की प्राचीन उष्णता जैसे शब्द और अभिव्यक्तियाँ उनकी कविताओं को स्मृति की मोहक आभा देते हैं। वे सब घटित होते हैं ऐसे कविता-संसार में जिसमें चश्मा, चेहरा, खाली जगहें, थकना, धीमापन, धूप-बारिश, विदा, पीड़ा, भाई, माँ, पितामह, सोना, ढूँढ़ना, पानी, शोक, गोश्त, बक्सा, नींद, दीमक, नीलाम्बरी, बीज, क़मीज़, धूल आदि सब है जो उसे विपुल बनाते हैं। यह ऐसी कविता है जिसमें संग-साथ और निस्संगता दोनों हैं। भाषा की चमक इन कविताओं की असली चमक है।
रजा फ़ाउण्डेशन युवा कवियों की पहली कविता-पुस्तकें प्रस्तुत करने पर एकाग्र ‘प्रकाश वृत्ति’ के अन्तर्गत वसु गंधर्व के पहले संग्रह ‘वीतराग’ को प्रस्तुत करते हुए प्रसन्नता अनुभव कर रहा है।
— अशोक वाजपेयी

148 pages, Paperback

Published July 29, 2025

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