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कुछ अटके, कुछ भटके

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Yatra, safar, ghummakadi-har kalpnisheel insan ki khwahish hoti hai ki wah duniya ke kone kone me jaye, itihas ke anchhueye, andekhe, kitabon men padhe sthanon ko dekhe, us daur ko apne man ki aankhon se sakshat dekhe. Inhin sadkon par kabhi itihas-prasidhh raja-raniyan ghoome hain, yahan bhayanak jansanhar huye hain, tasweeron me dekhe samandar ki lahren hakikat men kaise chattanon par aa aa kar takrati hain, jangal ke raja ke kshetr me jakar usase ru-ba-ru hona-ek athah kshetr hai anubhawon ka. Kuchh aise hi anubhavon ko suprasidhh lekhika Mridula Garg ne apni rochak varnanatmak shaili me apne is yatra sansmaran me ukera hai.

Note: This book is in the Hindi language and has been made available for the Kindle, Kindle Fire HD, Kindle Paperwhite, iPhone and iPad, and for iOS, Windows Phone and Android devices.

203 pages, Kindle Edition

First published January 31, 2006

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About the author

Mridula Garg

62 books19 followers
Mridula Garg is an Indian writer who writes in Hindi and English languages. She has published over 30 books in Hindi – novels, short story collections, plays and collections of essays – including several translated into English. She is a recipient of the Sahitya Akademi Award.

She published her debut novel, Uske Hisse Ki Dhoop, in 1975. She was arrested for obscenity after her novel Chittacobra was published in 1979, in a case that extended for two years but did not result in prison. Several of her works have feminist themes, and she told The Hindu in 2010, "My writing is not feminist. One of the metaphors of womanhood is guilt, be it in sexual matters, in working woman or non-working. My women felt no guilt ever. It ruffled feathers. We have the cerebral part and the womb, which encompasses and empowers you but at the same time also tightens you. My kind of feminism is that each woman can be different."

She has been a columnist, writing on environment, women issues, child servitude and literature. She wrote a fortnightly column, Parivar in Ravivar magazine from Kolkata for five years between 1985-1990 and another column Kataksh (Satire) in India Today (Hindi) for 7 years, between 2003 and 2010. Her novels and stories have been translated into a number of Indian and foreign languages like German, Czech, Japanese and English.

She was a research associate at the Center for South Asian Studies in the University of California-Berkeley, USA in April 1990. She has been invited to speak on Hindi literature and criticism, and discrimination against women, at universities and conferences in erstwhile Yugoslavia (1988), the USA (1990 and 1991), and was a delegate to Interlit-3, Germany(1993). She was invited to and Japan (2003), Italy (2011), Denmark and Russia (2012). She traveled widely and lectured and read from her works there.

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Profile Image for Goldi Tewari.
Author 1 book3 followers
February 20, 2025
मृदुला गर्ग की ‘कुछ अटके, कुछ भटके’ पढ़कर सीखा कि घुमक्कड़ी का असली अर्थ क्या होता है। मैं स्वयं भी उन कई स्थानों का दौरा कर चुकी हूँ, जिनका उल्लेख मृदुला जी ने किया है। पर जिस नजरिये से मृदुला जी किसी जगह को देखतीं है वो बहुत ही रोचक और शिक्षाप्रद है। जितनी बेबाकी से मृदुला जी एक नए स्थान में घूमती है, उतने ही साहस से उन स्थानों और अपने अनुभवों के बारे में लिखतीं भी है।
जगहों के साथ इस किताब में प्रकृति के वर्णन भी अद्वितीय है। मैं बचपन से शाल्मली/सेमल के पेड़ को देखती आ रही हूँ। उत्तराखंड के पर्व फूलदेई के अवसर पर हम बच्चों की थाली में और मौसमी फूलों के साथ सेमल के फूल हमेशा सजते थे। मृदुला जी ने फिर से बचपन की याद दिला दी। मृदुला जी की रचनाएँ पढ़कर मन में यह एहसास होता है कि "ओह, ऐसे भी घूमा जा सकता है!" और “ओह, ऐसे भी प्रकृति के बारे में सोचा जा सकता है!”
इस यात्रा वृतांत संग्रह की हर कहानी एकदम उम्दा, चित्रात्मक है और अंतिम पंक्ति का अंतिम शब्द, ‘पटाक्षेप’, तो बहुत ही शक्तिशाली है।

इस किताब की मेरी सबसे पसंदीदा पंक्तियाँ हैं:
दुनियाँ में दो तरह के इंसान होते है। एक वे, जो घर बैठे सैर कर लेते है। दूसरे वे, जो दूर-दराज़ वादियों में जाकर भी घर बैठे रहते है या कहें वे घर को कंधों पर लादकर बाहर निकलते है। बदक़िस्मती से हमारे देश में दूसरी क़िस्म के लोग ज़्यादा है।

सफ़रनामे में कितना यथार्थ है, कितनी कल्पना, इस पर बहस बेमानी है। आख़िर कल्पना भी वही मुसाफ़िर करता है न, जो भोग-भुगत रहा होता है। तो पैरो चला और दिमाग़ जिया सफ़र मिल कर ही असल सफ़री यादगार बनता है।

पर भइयन, इसकी कोई गारंटी नहीं है कि घरघुस्सुओं को स्वर्ग मिलेगा ही मिलेगा।

यात्राएं भी, पाप की तरह, अलग क़िस्मों की होती है। मोटी-मोटी दो किस्में। प्रयोजन युक्त और प्रयोजन मुक्त।

अहिंसा परमोधर्म! धर्म परमोस्त्र! चीन से चल कर बौद्ध धर्म जापान पहुंचा और उनकी लिपियों के हत्थे चढ़, ध्यान, जेन बन गया। यानि, आज जो घुट्टी, जापान दुनिया को पीला रहा है, कभी हमीं ने उन्हें पिलाई थी।

हम जब सफ़र पर निकलते है, जिंदगी का हो या दर-बदर का, रस्ते का हर पड़ाव, मुक़ाम तक पहुँचने का कदम-भर होता है। जब यह जंगलगाथा लिखनी शुरू की तो यही सोचा कि असल मुकाम काज़ीरंगा है। रंग-रंग के जंगल, उस तक पहुँचने के पार्श्व-गान। पर लिखने बैठी नहीं कि याददाश्त के बंद कपाट खुल गए और हर जंगल अलग-अलग रंग की यादों से गुलज़ार हो गया। अपना-अपना हक़ मांगने लगा, दिया मैंने।
अपनी फितरत कुछ ऐसी है कि हर घूमना, भटकना बन जाता है।

मेरा मानना है कि कला और सौंदर्य का रसपान एक सीमा तक ही किया जाता है। उसके बाद रसविहीन देखादेखी बची रहती है। उस बिंदु पर वह रात पहुँचती, उससे पहले मैं उठ गयी। कहीं वह प्यारा-नियारा सहज आयोजन भी, गणतंत्र दिवस का लोकनृत्य पाठ्यक्रम न बन जाए।

एक विशेषज्ञ ने कहा था, नदी के तटवर्ती मैदानी इलाक़ों के नृत्य, उत्तेजक, उद्दाम हाव-भाव वाले होते है, क्योंकि पांव टेल जमीन समतल, खुली और चौड़ी होती है। पहाड़ी इलाक़ो में जमीन की चढ़ाई-उतराई पांवो की ठिठकन पर रोक लगाती है, इसलिए नृत्य में लास्य और अभिनव ज़्यादा रहता है।

पर मैं यही मानना पसंद करती हूँ कि असल चीज़, सफ़र है, मंज़िल नहीं। भटकना है, पहुंचना नहीं। कल्पना है, आँखों देखा ब्यौरा नहीं।

जो भूतो न भविष्यति।

जब तक हमारा लिखा दूर देश का सफर न कर आए, आज की पीढ़ी के भेजे में नहीं घुसता।

मजा देखिये कि भारतीय से अमरीकन बनने को लालायित, हमारे हमवतन, हमबोरों के सरताज होते है। अमरीका जाने की उनकी तैयारी का जायज़ा लीजिये। अमरीका में बसे रिश्तेदारों, रिश्तेदारों के पड़ोसियों और पड़ोसियों के रिश्तेदारों के नाम-पते ढूंढ-ढूंढ कर इकठ्ठा किये जाते है। आस-पड़ोस में रहते जिनके घर जाकर कभी झांके नहीं, अमरीका में हर शाम, उनके नाम करने की ठानते है। उनके क्या, पूरी-छोले और रोटी-भजिया खाने के नाम। हिंदुस्तानी चाहे जितना अमरीका का मुरीद बन जाए या बना दिखलाये, ज़बान उसकी हिंदुस्तानी रहती है। बोलने वाली नहीं, चखने वाली। बोलो टूटी-फूटी अंग्रेजी, सारी अमरीकन, खाओ हिंदुस्तानी पकवान और डॉलर कमा-कमा कर कोटर भरो। जवान तो जवान, जवान बच्चों के बुढ़ाते माँ-बाप भी यही सपना देखते है कि सपूत या सुपुत्री अमरीका जा बसे। वहां बस कर, फटाफट दो-एक पैदाइशी अमरीकी बच्चे पैदा करें। जिससे बूढ़ा-बूढ़ी भी, अचार-मठरी-लड्डू से भरे मर्तबान साथ ले, दाईगिरी करने, उस ठनठन डॉलर देश घूमने जा सकें। घूमने कम, हमबोरों के साथ मिल-बैठ खाने-पीने, खाए-पिए पर बहस करने और घर कलह पर बतियाने, ज्यादा।

तो क्या आज के विज्ञापन युग में सपने भी विज्ञापन देकर आने लगे है।

पर वहाँ का आलस और सुकून भरा माहौल कुछ ऐसा था कि जो होगा होगा मान, सो रहना बहुत आसान था। जो होना है, होगा ही। जो होगा ही, उससे डर कर, पल-पल कौन मरे? जा कर सो रहे और सपने देखे।

दिल्ली की फितरत है दिखावा। कुछ-न कुछ पाखंड तो दुनिया हमेशा से करती आयी है पर दिल्ली वाले इस खेल में पूर्ण पारंगत है। वे जीवनमूल्य की तरह उसे परिभाषित करते है, संस्कार की तरह पूजते है। हर कोई अपने को समाजसेवी , दार्शनिक और साधक दिखाता है।
उखड़ कर आये लोग जब नई जमीन पर बसते है तो उनका काम सुस्त चाल से नहीं चलता। जो सुरक्षा और सम्मान अपनी धरती पर सोये-सोये मिल जाता है, वह पराई जमीन पर जबरदस्त मेहनत-मशक्क़त और जद्दोज़हद के बाद मिल पाता है। इसलिए शरणार्थियों की मानसिकता हमेशा आक्रामक और बाज़ार से सांठ-गांठ करने वाली रहती है। जड़ों से कटने पर परिवार के अलावा अपने होते है, सिर्फ द्रव्य और वस्तु। सो उन्ही का संचय करने में जुट जाते है। यहीं दिल्ली वाले मात खा गए। न वे आने वालों पर अपनी कछुआ चाल थोप सके, न उनकी हमलावरी रफ़्तार को आत्मसात कर सके। गति के सांस्कृतिक हमले में वे परास्त तो हुए, पर हार कर भी नई चाल के न बन पाए। न नए को गले लगाया, पुराने को कलेजे से लगाए रख सके। इस तरह नए और पुराने के बीच बंटकर अधपगले हो रहे। यूं दिल्लीवाले दिल से गए दिल्ली में और आने वाले, बिना दिल लगाए, कमाई के सहारे दिल्ली वाले बनते गए।

ख़रीददारी और बाज़ार दिल्लीवालों के ख़ुदा और सनम बन चुके है। दिल्ली में दिनोंदिन बढ़ता एक मध्यवर्ग रहता है, जो जड़ों से उखड़ा, आत्मविश्वास से ख़ाली, साजोसामान की चकाचौँध में ग़ाफ़िल है। ऊपरी तौर पर बाज़ार पर काबिज़ अपने पैसे को सफ़लता का प्रतीक मानता है और उसमें लीं रहने की कोशिश करता है। निन्यानवे प्रतिशत रहता भी है पर एक प्रतिशत के हाथों मारा जाता है।

हमारे देश में दुचित्तापन और दिखावा इस कदर हावी है कि रुपये-पैसे की बातें ओछी मानी जाती है। इसलिए छात्र भी अपनी बेबसी को महिमामंडित करते है। यह नहीं कहते हमें रोज़गार नहीं मिलता, कहते है हमारी संस्कृति का हास हो रहा है। उसकी शुचिता नष्ट हो रही है। उसे बचाने के लिए विदेशियों को निकाल बाहर करना होगा। हमेशा से यही होता आया है। लड़ाई रोटी की होती है पर ऊंचे ख़यालात का जामा पहना कर लड़ी संस्कृति के नाम पर की जाती है। बेकारी, भूख, रोज़ी-रोटी में वह कोशिश कहां, जो राष्ट्रीयता, परंपरा, सांस्कृतिक धरोहर, इतिहास आदि में है।

जिन्हें छल-कपट की आदत नहीं होती, वे प्रपंच का सा��ना प्रपंच या कूटनीति से न करके सीधा वार करते है। ईमानदार, स्पष्ट, खुली हिंसा। हम उसे आतंकवाद कहते है। क्योंकि हम समझ नहीं पाते कि जब हम, धीमे-धीमे सुलगते, इतने बरसों तक, वाद-विवाद में उलझे रहे तो वे क्यों अचानक विस्फोट कर गए।
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