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साहिर लुधियनवी"
ये जो किताब है "साहिर लुधियानवी" साहिर साहब के दिल के जज़्बातो को ग़ज़लो और नज़्मो के ज़रिये सामने रखती है। इस किताब में साहिर ने अपने दौर में तो अपने लफ़्ज़ों का जादू चलाया ही है पर आज के दौर में भी हम उनके खूबसूरत अल्फ़ाज़ों से नहीं बच सकते इस हक़ीक़त को बयां करने की गवाह है यह किताब
" प्यार पर बस तो नहीं है मेरा लेकिन फिर भी,
तू बता दे की तुझे प्यार करू या न करूँ ,
तूने खुद अपने तब्बसूम से जगाया है जिन्हें ,
उन तमन्नाओ का इज़हार करू या न करू|"
साहिर ने अपनी मोहब्बत के साथ साथ समाज के असली चेहरे को अपनी कलम के ज़रिये सामने लाया है।
"ये शाहराहों पे रंगीन साड़ियों की झलक,
ये झोपड़ों में गरीबों की बेकफन लाशें ।"
ये नज़्में मैंने इस किताब के "किसी को उदास देखकर" से ली है। मोहब्बत और समाज के आईन को साहिर ने बड़ी खूबसूरती से एक साथ लाया है।
मुझे साहिर का ये नज़मा बेहद खूबसूरत लगा-
" अश्कों में जो पाया है वो गीतों में दिया है,
इसपर भी सुना है की ज़माने को गिला है,
जो तार से निकली है वो धुन सबने सुनी है,
जो साज़ पे गुज़री है वो किस दिल को पता है
साहिर के दिल की मासूमियत ,मोहब्बत, खूबसूरती सब एक किताब में उतार दी उनकी कलम ने।
साहिर ने जब शायर की हैसियत से इस दुनिया में कदम रखा तब उसपर फैज़ और मजाज़ जैसे महान शायरों का खासा असर हुआ ।
लेकिन जब साहिर ने अपने निजी एहसासों को ग़ज़लो नज़्मों में पिरोया तो उनकी शेरोशायरी की दुनिया में अलग ही जगह बन गई । उनकी ज़िन्दगी की ज़िल्लतें , ग़म, खुशियाँ ,मुकाम और अधूरी चाहत हर चीज़ की तस्वीर है यह किताब ।
साहिर ने जितनी शिद्दत से अपनी मोहब्बत निभाई वही शिद्दत उनकी ग़ज़लो और नज़्मों में भी है अगर मोहब्बत का एहसास चाहिए तो उनके ग़ज़ल के चन्द नज़्में काफी है............
मुझे तुम्हारी जुदाई का कोई रंज नहीं,
मेरे खयालों की दुनिया में मेरे पास हो तुम,
ये तुमने ठीक कहा है तुम्हें मिला न करूँ,
मगर मुझे ये बताओ दो की क्यों उदास हो तुम,
ख़फा न होना मेरी ज़ुर्रतें-तखातब पर,
तुम्हें खबर है मेरी ज़िन्दगी की आस हो तुम ।
- प्राची