एक विद्वान सज्जन पंडित घर की छोटी बच्ची अपने बाल्यकाल में ही ऐसे माहौल में फँस जाती है जहाँ वो संभ्रांत महिला-पुरुषों को हर उचित-अनुचित तरीके से देह की भूख मिटाते हुए देखती है। बालमन में जगी उत्कण्ठा और परिस्थितियां उसे भी एक कामातुर युवती में परिवर्तित कर देती है .... और फिर इसी भूख से आतुर होकर अपने वृद्ध धनाढ्य पति को छोड़कर एक मेहतर के साथ भाग जाती है।
कहानी बायोग्राफी शैली में लिखी गई है --- लेखक इस पात्र से तब मिलता है जब वे अपने उम्र के आठवें दसक में होती हैं। वे लेखक को अपनी डायरी देती है जिसमे अपने जीवन की घटनाओं को टूटे-फूटे क्रम में वे लिखी होती हैं। डायरी में वर्णित कड़ियों को जोड़कर और पात्र से साक्षात्कार कर कहानी को मुकम्मल किया जाता है।
लेखक एक जगह कहानी की मुख्य पात्र निर्गुनियांजी को संबोधित कर कहते हैं,
"मैंने भी अपनी ज़िन्दगी में तरह-तरह के पापड़ बेले हैं, फिर भी यह मानता हूँ कि आपकी जीवनकथा ने मुझे हिमालय के गौरीशंकर शिखर से लेकर समुद्रतल की धरती तक के दर्शन करा दिए। अद्भुत लगता है मुझे आपके मुख से संस्कृत के श्लोक, सूर, तुलसी, नानक आदि संतों की पंक्तियां और उसके साथ-ही-साथ बेखटक, बेझिझक मुँह से निकलने वाली अश्लील गलियां ..."
लेखक की ये पंक्तियां इस पात्र को पूर्णरूप से चित्रित करने में समर्थ है --- ब्राह्मणी से मेहतर बनने की प्रक्रिया, उनके जीवनशैली और खान-पान को आत्मसात करना, एक कामातुर युवती का अपने मन पर नियंत्रण कर एक पतिव्रता सा जीवन जीने की जद्दोजहद और फिर जिस समाज में जुड़ गईं उसके उत्थान के लिए संघर्ष।
उपन्यास का शीर्षक सूरदास की पंक्तियों से लिया गया है जिसे मुख्य पात्र और एकाध अन्य पात्र भी कई बार परिस्थितियों से परेशान होकर दुहराते हैं
"अब मैं नाच्यौ बहुत गुपाल।
काम-क्रोध कौ पहिरि चोलना, कंठ बिषय की माल"
(हे गोपाल! अब मैं बहुत नाच चुका। काम और क्रोध का जामा पहनकर, चिन्तन की माला गले में डालकर)
कहानी का समयकाल बीसवीं सदी के तीसरे-चौथे दसक का है जब गाँधी जी के नेतृत्व में आंदोलन चल रहा है और कहानी लिखने का समयकाल स्वतंत्र भारत में लगे इमरजेंसी के समय का है। अतः इन दोनों समयकालों के सामाजिक और राजनितिक परिस्थितियों का भी चित्रण है। लेखक ने मेहतर समाज पर गहन अध्ययन किया है, अतः मेहतर समाज के इर्द-गिर्द बुनी इस उपन्यास द्वारा पाठक उनके सामाजिक, धार्मिक और इतिहासिक तथ्यों से भी रु-ब-रु होते हैं।
उपन्यास के समापन की ओर बढ़ते हुए लेखक इस पात्र से पूछते हैं, "आप श्रेष्ठतम वर्ण से वर्ण-जाति-विहीन समाज तक के जीवन को देख चुकी हैं। बताइये, कौन वर्ण श्रेष्ठ है?"
इस प्रश्न के जवाब में वे कहती हैं,
"आज़ादी-सुतंत्रता का वरण ही उत्तम है। मैंने तो नसीब की मार से मेहतरानी बनके ये सीखा बाबूजी कि दुनिया में दो पुराने-से-पुराने गुलाम हैं -- एक भंगी और दूसरी औरत। जब तक ये गुलाम हैं आपकी आज़ादी रुपये में पूरे सौ के सौ नये पैसे भर झूठी है।"