नास्तिक की प्रार्थना मानव कौल का कविता-संग्रह है। कविताओं की ओर लौटने, अपने भीतर के घर में वापस आने और बरसों से बची हुई बात को कह पाने की बेचैनी से जन्मी किताब। मानव कौल ने अपनी रचनात्मक यात्रा की शुरुआत कविताओं से की थी। फिर नाटक, कहानियाँ और उपन्यास लिखते-लिखते वे अपनी ही भाषा से जैसे कुछ दूर चले गए। भीतर एक भूख बनी रही, घर लौटने की, अपनी पहली आवाज़ तक पहुँचने की। उनके लिए यह घर कविताएँ थीं।
एक उपन्यास पर काम करते हुए जब उसका अंत एक कविता में खुला, तब उन्हें लगा कि वे फिर अपने घर के आसपास हैं, उसकी गलियों, आँगन और गंध के पास। उसी क्षण से कविताएँ लौटने लगीं। यह संग्रह उसी लौटने की यात्रा है।
‘नास्तिक की प्रार्थना’ उन कविताओं की किताब है, जो ‘कुछ कहना छूट गया है’ की टीस और भूख से निकली हैं। इसमें आत्मीयता है, बेचैनी है, स्मृति है और वह स्वाद है, जो लंबे समय बाद घर के खाने में मिलता है।
यह संग्रह पाठक को भी अपने भीतर के किसी पुराने, भूले हुए घर तक ले जा सकता है।
कश्मीर के बारामूला में पैदा हुए मानव कौल, होशंगाबाद (म.प्र.) में परवरिश के रास्ते पिछले 20 सालों से मुंबई में फ़िल्मी दुनिया, अभिनय, नाट्य-निर्देशन और लेखन का अभिन्न हिस्सा बने हुए हैं। अपने हर नए नाटक से हिंदी रंगमंच की दुनिया को चौंकाने वाले मानव ने अपने ख़ास गद्य के लिए साहित्य-पाठकों के बीच भी उतनी ही विशेष जगह बनाई है। इनकी पिछली दोनों किताबें ‘ठीक तुम्हारे पीछे’ और ‘प्रेम कबूतर’ दैनिक जागरण नीलसन बेस्टसेलर में शामिल हो चुकी हैं।
Young authors को पढ़ने का यह फायदा जरूर है कि उनसे आप जल्दी connect हो जाते हो। वैसे ही मैं मानव की इस किताब की कुछ कविताओं से अच्छा connect हुआ। जैसे दूसरी दुनिया, सच और झूठ, विरोधाभास, ठगा जाना, ख़राब कविता, जोखिम का चिल्लर, अधूरी कहानी!