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एक नौकरानी की डॉयरी

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वयोवृद्ध कथाकार कृष्ण बलदेव वैद्य ने अपने उपन्यास 'एक नौकरानी की डॉयरी' में समाज के इसी उपेक्षित वर्ग के मन को एक युवा होती नौकरानी शन्नो की दृष्टि से टटोलने की कोशिश की है। राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित दो सौ तीस पृष्ठों वाला उपन्यास हमारे घर के कामों में हाथ बँटाने वाली महिलाओं और किशोरियों की रोजमर्रा की ज़िदगी और उनके कष्टों को ना केवल करीब से देखने की कोशिश करता है बल्कि साथ ही साथ हमारे पढ़े लिखे कुलीन समाज के मानसिक पूर्वाग्रहों की परत दर परत भी खोलता जाता है।

230 pages, Paperback

First published January 1, 2007

6 people want to read

About the author

Krishna Baldev Vaid

56 books16 followers

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Profile Image for Manish Kumar.
53 reviews31 followers
June 8, 2022
आज भी दो गृहणियाँ मिलती हैं तो उनकी बातें घूम फिर कर अपने यहाँ काम करने वालियों पर आ ही जाती हैं। हर मालकिन के पास नौकरानियों द्वारा पैदा किए दर्द भरे किस्से हैं। पर नौकरानियाँ अपने मालिक मालकिन को किन नज़रों में देखती हैं ये भी आपने कभी सोचा है? कृष्ण बलदेव वैद्य पुस्तक के शुरुआती पन्नों में ही उनकी सोच को इन शब्दों में व्यक्त करते हैं..


"माँ कहती है मालिक लोग बहुत कमीने होते हैं। उनका कोई भरोसा नहीं उन्हें हम लोगों से कोई हमदर्दी नहीं, उनकी बातों में कभी मत आना।

दरअसल इस किताब में कृष्ण बलदेव वैद्य ने शन्नो से उसकी डॉयरी में वो सब लिखवाया है जो आए दिन हम अपने घरों में देखते हैं। काम कराने वालों की प्राथमिकता होती है कि वो हर रोज़ समय पर आएँ, काम पर ध्यान दें , सफाई से काम करें, जबान ना लड़ाएँ और चुपचाप अपना काम कर चली जाएँ। पर कितनों को इस बात की फिक्र होती है कि वो घर से पिट कर आयी हैं, तबियत नासाज़ है, मालिकों की वहशियाना नज़रों से परेशान है या आज उनका काम करने का मन ही नहीं है। सबसे बड़ी बात ये कि उनके अंदर भी एक आत्मसम्मान की भावना है जिसे हम जानते तो हैं पर उसे तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ते।

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http://ek-shaam-mere-naam.blogspot.in...
Profile Image for Arun Singh.
252 reviews13 followers
July 7, 2024
लिखने से क्या बदलता है? भीतर के पत्थर कुछ तो बदलते होंगे। उसका सबसे अच्छा उदाहरण है ये किताब। लिखना कितना जरूरी हो सकता है? शानो नाम की लड़की है जो अभी अभी अठारह की हुई है। नौकरानी। लेकिन वो अलग है। वो लिखना शुरू करती है। जो भी रोज होता है। दिन भर बीतता है। रोज़मर्रा की चीजों से कैसे वो भीतर का सब कुछ लिखना शुरू कर देत है और उसके आस पास बदलने लगता है। लिखने से क्या फाइदा होता है वो रोज अपने से पूछती है... क्या हम सब अपने से थोड़ी बातचीत करना शुरू कर दें तो बहुत कुछ सुलझ सकता है... ऐसा भरोसा होता जाता है।
मैं चाहता हूँ तुम इसे पढ़ो। कृष्ण बलदेव वैद बहुत कोमलता से लिखते हैं। जैसे कि अपने बारे में लिख रहे हों। उनके अंदर स्त्री का भाव बहुत अच्छा है। उसमें कोई लाग लपेट नहीं। मर्दों को देखने की कोई अभिमान नहीं। उनकी भाषा बहुत कोमलता से भीतर जाती है। हिन्दी में बहुत कम लोगों की भाषा ने ऐसा असर किया है। उसका रस भीतर टपकता जाता है।
शानो में तुम खुद को बहुत आसानी से पा लोगी। उसकी उलझनें, उसकी उधेड्बुन... उसका खुद को लेकर अभिमान तुम्हें अपने अंदर की स्त्री को छूने में मदद करेगा। इसलिए लगता है हर मर्द को भी ये पढ़नी चाहिए। बहुत आसानी से ये बातें बोझिल हो सकती थी। लेकिन नहीं हैं। उनमें एक हंसने का गुण है। एक मिठास है जो कभी जी को पूरा नहीं करती। शानो के साथ में कब मेरे खुद के भीतर के सवाल सामने आने लगे पता ही नहीं चला। जबकि मैं देखूँ तो मेरे और उसके रहन सहन में बहुत अंतर है।
एक समय पर शानो को लगता है कि असल में उसने अपने मन से ज्यादा दूसरों के मन का हाल लिखा है। ये लिखे में संभव है। उसे किसी किताब को लिखने का दंभ नहीं। उसे diary लिखने का भी दंभ नहीं। वो खुद के मन को खोलकर देखना चाहती है। और उसके लिए सबसे अच्छा तरीका है – लेखन। लेखन पर विश्वास दिलाता उपन्यास।
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