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ద్వారక అస్తమయం

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Dwarka Ka Suryasta (Hindi) Hardcover - 2005 by Dinkar Joshi (Author)

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Dinkar Joshi

60 books92 followers

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Community Reviews

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Displaying 1 - 9 of 9 reviews
Profile Image for Indra  Vijay Singh.
148 reviews7 followers
August 9, 2021
यह पुस्तक द्वारका के अंत का है। कृष्ण के अंत समय का चिंतन पर आधारित यह उपन्यास बहुत ही अच्छी भाषा शैली में लिखी गई है।
Profile Image for Jay.
25 reviews
June 28, 2020
The book is primarily about Krishna’s semi-fiction journey of 36 years from the time Mahabharata war got over till the end of his era with his Yadava family; initially cursed by Gandhari and eventually Maharshi Kashyap.

This was my first read of Dinakar Joshi’s work and it was absolutely commendable , especially when it comes to portrayal of the situation using his magical writings, or pouring his heart in it when writing about the destruction of Yadava families through the self conflicts.

One can easily resemble the last couple of chapters of this book with the Mahabharata war.

It’s a tragical story of Yadava’s internal self conflicts and bringing the unfathomable end of their own golden period.

Definitely recommended for those interested in history and mythology!
98 reviews
November 7, 2021
Very interesting book which gives insight about the thoughts which Krishna might or might not had but really, they were there in reality and remained unanswered. The book revolves around the concept of BBB, betrayal by beneficiary, which is very true and it shows that this concept was always there whatever the Yuga was.
People always like to get the most out of any situation without doing much of effort generally and when they get it through somebody or by someone, the same person become useless to them. This book very beautifully depicts this scenario.

Profile Image for Lokesh Gautam.
23 reviews
July 3, 2021
Must read

बहुत ही बढ़िया किताब... जैसा कि नाम से ज़ाहिर है द्वारिका और श्रीकृष्ण के अंतिम समय को लेकर लिखी गयी ये किताब सच में ही द्वारिका का सूर्यास्त है। पढ़ते हुए कई बार ऐसा लगा जैसें ये सब मेरे ही सामने घटित हो रहा हो। महाभारत युद्ध के बाद यादवों का व्यवहार और कृष्ण के मनोभावों को समझने का बहुत ही खूबसूरत प्रयास है ये किताब।
Profile Image for dunkdaft.
434 reviews34 followers
October 20, 2023
Though the language is beautiful, the book which tells the story of the unknown last years of Dwarka, often gets into flashbacks and tells once again the initial story of Shri Krishna. However it is crisply written and i didn't mind reading them. I would have loved it more if the takeaway was more informative. Yes, the scene of 'Yadavasthali' is exquisitely written, but that's it. I would prefer Yugandhar over this.
3 reviews
January 7, 2023
महाभारत के बाद और यादवों के पतन पर बहुत कम पढ़ने को मिलता है । इस घटनाक्रम से यह साफ़ है कि कर्म का फल किसी को नहीं छोड़ता फिर चाहे भगवान ही क्यों न हो।
रोचक, मार्मिक और मानव की कमज़ोरियों को दर्शाती हुई कृति ।
Profile Image for Reading Diet.
27 reviews
December 31, 2023
महाभारत युद्ध के ३६ साल बाद यदुवंश का विनाश हुवा। इस पुस्तक में मुख्यतः भगवान श्री कृष्ण के उन ३६ वर्षों का जीवन है। इस समयकाल में श्री कृष्ण क़रीब-क़रीब सारा वक़्त द्वारिका में ही रहे। युद्ध के बाद वे अपने प्रिय सखा अर्जुन से मिलने कभी हस्तिनापुर भी नही गये। लंबी आयु के आख़िरी वर्षों में एक पारिवारिक बुजुर्ग जैसे निवृति वाला जीवन व्यतीत करते है ऐसा ही श्री कृष्ण का जीवन रहा होगा एसा इस पुस्तक से प्रतीत होता हैं।

श्री कृष्ण जिन्हें हम निडरता, बहादुरी और एक महान व्यक्तित्व के लिए जानते है उनके हृदय में भी कितनी व्यथा और दर्द हो सकता है यह दिनकर जी ने बहुत अच्छी तरह समझाया है। एक संवाद में देवी रुक्मिणी श्री कृष्ण से कहते है की मुजे माता देवकी से ईर्ष्या होती है की वो कितनी भाग्यशाली है जिसने श्री कृष्ण जैसे पुत्र को जन्म दिया। तब श्री कृष्ण उनसे कहते है की इस पूरे संसार में माता देवकी और कृष्ण से अभागा और कोई नहीं है। इस संवाद को लेखक ने जो शब्द दिये है वो आपकी आँखें नम कर सकता है।

आपको श्री कृष्ण के मानवीय स्वरूप का दर्शन करना हैं तो यह पुस्तक ज़रूर पढ़नी चाहिए। एक इंसान जैसे अपने जीवन के उतरार्द्ध काल में अपने भूतकाल से व्यथित होता है ठीक वैसा ही श्री कृष्ण के साथ भी होता हैं। एक सामान्य मानवी जैसी उनकी वेदना है, दुख है, पीड़ा है जिसमे दैवी शक्ति का कोई ज़िक्र नहीं है।

स्यामांतकमणि वाला प्रशंग पहली बार मैंने विस्तृत में पढ़ा। यह जानकर मन व्यथित हो जाता हैं की श्री कृष्ण पर उन्हीं के परिवार के यादवों ने चोरी का इल्ज़ाम लगाया था। इस युग पुरुष को पता नहीं इस संसार ने क्या क्या वेदनाएँ दी है और कितना प्रताड़ित किया है यह मेरी समझ से परे है। इन सब के बावजूद भी हर बार हर परिस्थिति से वह पहले से ज़्यादा बेहतर बनके निकल आते है। हम सब के लिए यह सबसे बड़ी सिख है।

एसा बहुत ही कम पुस्तक में मिलता है की पूरी पुस्तक में हर एक कड़ी जुड़ी हुई लगे, कहीं पर भी कथा दूसरे मॉड पे जा रही है या श्रेणी टूट रही हैं एसा न लगे। एक अंश का अंत दूसरे अंश की शुरुआत बनता जाता है और यह पूरी पुस्तक के सभी प्रकरण को एक धागे में पिरोए रखता है।

बीचमे कई जगह कहानी मुजे थोड़ी लंबी खिची लगी जब श्री कृष्ण गोकुल छोड़ के अक्रूर जी के साथ मथुरा जाते हैं, कंस का वध होता हैं, माता देवकी और पिता वासुदेव को कारावास से मुक्ति मिलती हैं और उग्रसेन का राज्याभिषेक होता हैं। यह सब पढ़ना ज़्यादा रोचक नहीं लगा।

पुस्तक के अंतिम चरण में उद्धव जी और श्री कृष्ण जब आख़िरी बार द्वारिका में मिलते हैं वह संवाद बड़ा ही भावुक हैं। जिसे पढ़कर लगभग मेरी आँखो में आँसू आ गये। उद्धव जी श्री कृष्ण से उनकी चरण पादुका माँगते हैं ताकि अपने शेष जीवन में भी उन्हें श्री कृष्ण का संस्पर्श मिलता रहे।

पुस्तक के अंत में आप इस महान युगपुरुष के विलय की घटना पढ़ते हैं जिनकी शुरुआत मथुरा की काल कोठरी से शुरू होकर प्रभास नामक स्थल पर समाप्त होती हैं और इसी के साथ एक युग का भी अस्त हो जाता हैं।

मैंने पहले भी लिखा था और आज भी लिख रहा हूँ। मेरे नज़रिए से श्री कृष्ण विलय की घटना इस समग्र श्रृष्टि में अब तक की सब से दुःखद, दर्द भरी एवं करुण घटना है। मुज़से यह कभी नहीं पढ़ा जाता। मेरा ह्रदय इस वास्तविकता को स्वीकार ने में असमर्थ हैं। समस्त द्वापरयुग का इतिहास अंकित कर चुके हो एसे आर्यावर्त के युग पुरुष का यह करुण, दर्द भरा विलय मुज़से नहीं स्वीकारा जाता।

अपनी अंतिम क्षणों में श्री कृष्ण का आत्म संवाद है जो की समग्र मानवजाति के लिए सबसे बड़ा ज्ञान कह सकते है। श्री कृष्ण सोचते हैं की जिसे आर्यवर्त का प्रथम पुरुष होने का बहुमान म���ला, युधिष्ठिर के राजशूय यज्ञ पर जिसे प्रातः पूजा के लिए स्वीकारा गया एसा प्रथम पुरुष! पर महाकाल के लिए एसे महापुरुष नगण्य के बराबर है। काल के लिये सब एक समान है। काल की गति सबके लिए एक समान चलती हैं।

जय श्री कृष्ण। 🙏🏻❤️🙏🏻
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