इस पुस्तक में परसाई जी के अलग अलग समय के निबंधों का संग्रह है , लेकिन इसमें राजनीतिक विषयों को कम शामिल किया गया है,ज्यादातर निबंध सामाज मे आम लोगों से जुडे गैर राजनीतिक विषयों पर है,जहां -"जैसे उनके दिन फिरे" ,"भेडे और भेडिया" जैसे निबंध नेताओं के चुनावों पर दोधारी कटाक्ष करती है,वहीं "चार बेटे","सुदामा के चावल","अपने अपने इष्टदेव"," मौलाना का लड़का-पादरी की लड़की","मेनका का तपोभंग " जैसे लेख धार्मिक कथाओं के माध्यम से नैतिकता पर चोंट करती हैं,ये निबंध व्यक्तिगत तौर मुझे खरे लगे क्योंकि धार्मिक विषयों पर व्यंग्य और कटाक्ष करना तभी संभव है,जब आपके अंदर ईमानदारी हो और आपके मजबूत तर्क सटीक जगह पर वार करें,लेकिन परसाई जी का निसाना हमेशा की तरह यहां पर भी अचूक है,आप सभी निबंध पढते वक्त आनंदित होंगें और आत्मचिंतन के लिऐ प्रेरित भी।