फणीश्वरनाथ रेणु के कथा साहित्य को आंचलिक कहा गया है किन्तु उनकी कहानियाँ (तथा उपन्यास भी) जहाँ एक ओर ग्राम्य-जीवन की आंचलिकता को ही नहीं उसकी सम्पूर्ण आन्तरिकता को व्यक्त करती हैं, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण तथा शहरी जीवन के अन्त:सम्बन्धों की वास्तविकता का भी उद््घाटन करती हैं। रेणु की कहानियों में अत्यन्त ‘निजी’ को व्यापक सामाजिक यथार्थ से जोड़ पाने की अद्भुत क्षमता है और ऐसा वे अपूर्व काव्यात्मक रचाव के साथ कर पाते हैं। इस प्रक्रिया में उनकी कहानियाँ संगीत की सरहदों को छूने लगती हैं। उनके सहज प्रतीत होनेवाले कथा-शिल्प से अनायास ‘ऑडियो-विजुअल’ प्रभाव उत्पन्न होने लगता है। उनकी टेकनीक एक सुॢरयलिस्टिक पैटर्न निर्मित करती है जिसमें एक ‘प्रिज़्म’ की तरह छनकर रंगारंग विचारों तथा भावनाओं की घुलनशीलता शामिल हो जाती है। उनकी कहानियाँ हमारी सम्पूर्ण संवेदनाओं को एक साथ तृप्त करती हैं। अगर उनमें गहरी लयबद्ध ऐन्द्रिकता है तो बिना बौद्धिकता का छद्म धारण किये ही ‘वस्तु सत्य’ के मर्म तक पहुँच जानेवाली विश्लेषणपरकता भी है। आजादी के बाद के राजनैतिक परिवर्तनों का दस्तावेजी बयान प्रस्तुत करनेवाली कहानियों में यह तथ्य खूब उभरकर आता है—‘जलवा’ तथा ‘आत्म-साक्षी’ जैसी कहानियों में तटस्थ राजनैतिक बोध की निर्ममता के साथ उस क्रूर ‘टे्रजडी’ का एहसास भी है जिसमें कोमल मानवीय सच्चाइयों के कर्दयता से कुचले जाने का इतिहास अंकित है।
Phanishwar Nath 'Renu' (4 March 1921 – 11 April 1977) was one of the most successful and influential writers of modern Hindi literature in the post-Premchand era. He is the author of Maila Anchal, which after Premchand's Godaan, is regarded as the most significant Hindi novel.
हिन्दी कथा-साहित्य को सांगीतिक भाषा से समृद्ध करनेवाले फणीश्वरनाथ रेणु का जन्म बिहार के पूर्णिया जिले के औराही हिंगना गाँव में 4 मार्च, 1921 को हुआ। लेखन और जीवन, दोनों में दमन और शोषण के विरुद्ध आजीवन संघर्ष के प्रतिबद्ध रेणु ने राजनीति में भी सक्रिय हिस्सेदारी की। 1942 के भारतीय स्वाधीनता-संग्राम में एक प्रमुख सेनानी की हैसियत से शामिल रहे। 1950 में नेपाली जनता को राणाशाही के दमन और अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए वहाँ की सशस्त्र क्रान्ति और राजनीति में सक्रिय योगदान। 1952-53 में दीर्घकालीन रोगग्रस्तता के बाद राजनीति की अपेक्षा साहित्य-सृजन की ओर अधिकाधिक झुकाव। 1954 में बहुचर्चित उपन्यास मैला आँचल का प्रकाशन। कथा-साहित्य के अतिरिक्त संस्मरण, रेखाचित्र और रिपोर्ताज़ आदि विधाओं में भी लिखा। व्यक्ति और कृतिकार, दोनों ही रूपों में अप्रतिम। जीवन की सांध्य वेला में राजनीतिक आन्दोलन से पुनः गहरा जुड़ाव। जे.पी. के साथ पुलिस दमन के शिकार हुए और जेल गए। सत्ता के दमनचक्र के विरोध में पद्मश्री लौटा दी।
मैला आँचल के अतिरिक्त आपके प्रमुख उपन्यास हैं: परती परिकथा और दीर्घतपा; ठुमरी, अगिनखोर, आदिम रात्रि की महक, एक श्रावणी दोपहरी की धूप तथा सम्पूर्ण कहानियाँ में कहानियाँ संकलित हैं। संस्मरणात्मक पुस्तकें हैं: ऋणजल धनजल, वन तुलसी की गन्ध, श्रुत-अश्रुत पूर्व। नेपाली क्रान्ति-कथा चर्चित रिपोर्ताज है।,
भारत यायावर द्वारा सम्पादित रेणु रचनावली में फणीश्वरनाथ रेणु का सम्पूर्ण रचना-कर्म पाँच खंडों में प्रस्तुत किया गया है।
पुस्तक : आदिम रात्रि की महक रचनाकार : फणीश्वरनाथ रेणु
रामवचन राय रेणु जी के बारे में कहते हैं कि " रेणु के कथाकार के लिए महत्वपूर्ण बात है कि कभी उसने अपने लिए कोई नारा, वक्तव्य या घोषणा पत्र तैयार नहीं किया, जैसा कि अक्सर किसी आंदोलन के प्रवर्तक किया करते हैं। नयी कहानी के आंदोलन में भी मोहन राकेश, राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर एक के बाद एक वक्तव्य दिए जा रहे थे, नयी कहानी का घोषणा पत्र छपता था। पर रेणु चुप थे। चुपचाप कहानी लिखते रहे। यहाँ तक कि अपनी आलोचनाओं का उत्तर भी उन्होने कहानी लिखकर ही दिया। यह उनके संतुलित रचनात्मक व्यक्तित्व का ही बोधक है। रेणु हमेशा आम आदमी के लिए ही लिखते रहे। ये रचनात्मक ईमानदारी ही किसी लेखक की श्रेष्ठता का आधार है और रेणु निश्चय ही इस कतार में आगे थे। "
रेणु ने जितनी कहानी कही उससे कहीं ज़्यादा कहानी उनके भीतर ही रही। उनकी पहली कहानी "बटबाबा" जो 1945 में कोलकत्ता के दैनिक विश्वमित्र में छपी थी किसी भी संग्रह में उपलब्ध नहीं है। रामवचन कहते हैं कि इस बात की भनक इस से भी लगती है कि उन्होंने बड़ी कहानी को व्यक्त करने के लिए उपन्यास का ढाँचा चुना और मैला आँचल (1954) एवम परिकथा (1957) की रचना की। ठुमरी कहानी संग्रह का प्रकाशन तो बाद में 1959 में हुआ जब रेणु एक स्वर से हिन्दी के पांक्तेय उपन्यासकार स्वीकृत हो चुके थे।
आदिम रात्रि की महक 4 कहानियाँ है १ तँबे एकला चलो रे २ अतिथि सत्कार ३ ना जाने केही वेष में ४ एक आदिम रात्रि की महक
तँबे एकला चलो रे मानवीय संवेदना के विस्तार की अद्वितीय मिसाल है। यहाँ लेखक उपभोक्तावादी समाज पर तंज कसता है। रेणु जी का कलाकार मन उभोक्तावादी समाज को नहीं स्वीकारता है। रविद्रनाथ ठाकुर की एक कविता पंक्ति का कथा शीर्षक देकर रेणु जी ये कहना चाहते हैं कि मनुष्य को कभी मानवता नहीं भूलनी चाहिए और उपयोगिता-अनुपयोगिता की अवधारणा सापेक्षिक है। एक ही वस्तु किसी के लिए अनुपयोगी है तो किसी के लिए उपयोगी।
कहानी में भैंस का बच्चा ( पाड़ा ) को केंद्र पर रख कर ये बात हमें समझाई गयी है। जो शुरू में तो परिवार वालों को अनुपयोगी लगता है, जिसके लिए दूध का इंतेज़ाम नहीं किया जाता, रहने को सही स्थान नहीं दिया जाता और परिवार के सभी सदस्य उसके मृत्यु की राह देखने लगते हैं। लेखक को ये बात बिल्कुल पसंद नहीं आती है और उसे कीचड़ से निकाल कर अपने पास बांध लेता है। उसे ख़ुद की दशा पर तरस आता है कि वो बेचारे बीमार हैं, किसी तरह से उपयोगी नहीं हैं लेकिन किसन महाराज ( पाड़ा ) को बेज कर कुछ रुपये कमाए जा सकते हैं इनके परिवार द्वारा। परन्तु वो उससे बहुत प्रेम करता है और उसकी बहुत देखभाल करता है। धीरे-धीरे वो भी स्वस्थ होने लगता है। एक दिन उसकी अनुपस्थिति में परिवार के लोग नब्बे रुपए में पाड़ा का सौदा कर देते हैं किंतु वापस लौटने पर वो उसे एक सौ दस रुपये में ख़रीद कर सार्वजनिक घोषित करके खुला छोड़ देता है। इसके उपरांत पाड़ा लोगों की सहायता करता है और बदले में लोग उसे देवी शक्ति मानने लगते हैं। पर मनुष्य की आसुरी शक्तियों के आगे वो पराजित हो जाता है। गाँव के ग़रीब बटाई दारों की फसल काटने के लिए जमींदार अपने लठैतों के साथ खेत पर आते हैं। बटाईदार गाँव में जाककर न्याय की गुहार करता है परन्तु कोई आदमी मदद में नहीं आता है। उनकी मदद में जाता है पाड़ा - किसन महाराज। इस संघर्ष में जमींदार का छोटा भाई देवशंकर सिंह उसे गोली मार देता है। और अत्याचार के ख़िलाफ़ लड़ते हुए पाड़ा अपना दम तोड़ देता है।
कहानी का अंत आपको झकझोर देता है जब लेखक पुलिस द्वारा लगाए गये आरोप का जवाब देता है ।
पुलिस द्वारा रिपोर्ट में कहा गया कि गरमागरम भाषण दिए गए जिसके जवाब में लेखक ने कहा कि "भाषण किसी पेशेवर नेता ने नहीं दिया था। गाँव के एक भावुक विद्यार्थी ने अपनी टूटी - फूटी भाषा में तुतलाकर कुछ कहा था ज़रूर। उसने कहा ' , 'जबआदमी के दुख को आदमी ने नहीं समझा, किसन महराज ने पशु होकर भीआदमी का काम किया! आदमी का काम नहीं, देवता का। उसने अपनीजान देकर साबित कर दिया कि हम जानवर से भी गये-बीते हैं...।'
लेखक ने उपेक्षित पशु के माध्यम से मानव समाज की संवदेनहीनता और स्वार्थपरता का सजीव चित्र प्रस्तुत किया है। कुछ ऐसा ही प्रेमचंद की कहानी पूस की रात में देखने को मिलता है जहाँ हल्कू नाम का किरदार झबरा कुत्ते के साथ वार्तालाप करता नज़र आता है।
दूसरी कहानी : अतिथि सत्कार
ये एक व्यंग्यात्मक कथा है जहाँ फणीश्वरनाथ रेणु जी अपने निजी अनुभव को अभिव्यक्त करते हैं। इस कहानी के माध्यम से उन्होंने ऐसे पेशेवर आयोजकों पर निशाना साधा है जिनका ख़र्चा पानी लोगों को मूर्ख बना कर चलता है। लेखक ने अत्यंत व्यंग्यात्मक ढंग से आयोजनों और समारोहों के नाम पर चलने वाले धंधों की पोल खोली है। किस तरह उन्हें तोतापुर गाँव में मुख्य अथिति के लिए आमंत्रित किया जाता है, वहाँ जाने के लिए उन्हें सेमलबन स्टेशन पर उतरना पड़ता है जहाँ गाड़ी से न उतर पाने के कारण लाउड स्पीकर वाला भोंपा की निगरानी का काम उन्हें सौप देता है। कुछ समय पश्चात गाड़ी में कुछ लोग आते हैं और लाठी लेके उन्हें मारने को आतुर रहते हैं क्योंकि उनकी समझ में उन्होंने ये भोंपू चुराया होता है। जिस इंसान ने उन्हें निमंत्रण दिया होता है वो भी उनसे मुँह फेर लेता है। जान बचाने हेतु उन्हें दंड के रूप में 20 रुपये देने होते हैं। उनका जूता छीन लिया जाता है। वो झोले से हाथ धो बैठते हैं तब जाके उन्हें अथिति सत्कार का मतलब समझ आता है। इस कहानी के संवाद अत्यन्त प्रभावशाली और रोचक हैं।
तीसरी कहानी : ना जाने केही वेष में
रेणु जी की यह कहानी समाज में प्रचलित रूढ़ियों और अंधविश्वासों पर कठोर व्यंग है। एक दिन लेखक अख़बार में प्रकाशित अपना राशि फल देखता है जिसमें की यात्रा योग, अमृत फल, धनागम, राज सम्मान, मित्र लाभ इत्यादि बातें उसके पक्ष में लिक्खी होती हैं। ये सोच कर वो यात्रा पर निकल पड़ता है कि उसके पैसे डबल हो जायेंगे, उसे लगता है सभी अपरिचित लोगों से उसकी मित्रता हो जायेगी केन्तु ट्रैन में डेढ़ घण्टे का समय बिताने के बाद भी उसके हक में कुछ होता नज़र नहीं आता है। पर कटिहार स्टेशन पर एक अपरिचित इंसान लेखक के गले पड़ता है। उसके बाद लेखक की क्या दुर्दशा होती है ये आप को कहानी पढ़ कर ही पता लग जायेगी।
चौथी कहानी : एक आदिम रात्रि की महक
ये कहानी फणीश्वरनाथ रेणु जी की एक प्रतिनिधि कथा रचना है जिसके आधार पर संग्रह का नामकरण हुआ है। इस कहानी के द्वारा वो दर्शाना चाहते हैं कि प्रेम चेतना इंसानों की मूल गंध है, वही आदिम रात्रि की महक है। प्रेम की अनुभूति सबके भीतर समान रूप से होती है, भले ही इसकी अभिव्यक्ति के रूप भीन्न हों।
इस कहानी का नायक करमा एक अनाथ है। रेलवे के मुलाजिम गोपाल बाबू को आसाम से लौटती हुई गाड़ी में वह लावारिस शिशु के रूप में मिला था। उन्होंने उसे अपने साथ रखा। वो सदा उनके साथ रहा और उनके मृत्यु के पश्चात भी बाबुओं की सेवा में लगा रहा। ऐसे ही एक नये बाबू के साथ करमा एक नये स्टेशन पर आया केन्तु उसे नये क्वार्टर में चूना और वार्निश के गंध के कारण नींद नहीं आयी। बाबू भी रात काटने के लिए उससे बात चीत करने लगा। नए बाबू के साथ उसका मन नहीं लगता था। इस कारण जब भी अवसर मिलता वो पुराने बाबूओं के साथ बिताये गए दिनों को याद कर उन दिनों की कहानियाँ सुनाता। करमा पुरानी स्मृतियों में खो जाता जहाँ जहाँ काम किया है। वारिसगंज स्टेशन के पास मगहिया डोमों के तम्बू गड़े थे। एक डोमिन युवती करमा को अच्छी लगती थी। एक दिन गाँव घूमने के ख़्याल से करमा निकलता है। वो कुछ मछलियों का शिकार करता है। रास्ते में उसे वही व्यक्ति मिलता है जो स्टेशन पर बुकिंग के लिए एक बार आया होता है। उसे वो अपने घर ले आजाता है। वहाँ उसे सरसतिया नाम की युवती से लगाव हो जाता है। एक दिन बाबू का दबादला हो जाता है। वो जाने को तैयार होते हैं। गाड़ी में बैठ वो भी निकलने को तैयार होता है परंतु उसी समय उसके दिलो दिमाग़ में सरसतिया का चेहरा आ जाता है। वहीं स्टेशन पर बैठा कुत्ता भी करमा को देख कर भौकने लगता है। अचानक करमा एक आदिम गंध से आकर्षित होके बाबू से कहता है कि वो नहीं जाएगा। इस कहानी में रेणु जी ने एक बंजारे के मन मे उत्तपन होते प्रेम की स्मृतियों से पाठकों का परिचय कराया है।