इकतीस साल की क्लियो बर्लिन में बच्चों की किताबों की इलस्ट्रेटर है। डेट पर वह चाय लाते मँगाती है, जबकि उसका मन क्रीम वाली हॉट चॉकलेट का होता है। उसे मशरूम से नफ़रत है, फिर भी मुस्कुराकर खा लेती है। मन में बस एक ही मंत्र चलता है: यह तो सब करते हैं।
फ़रवरी में फ़ोटोग्राफ़र लुकास वैलेंटाइन डे का वादा करता है और फिर ग़ायब हो जाता है। उसी रात क्लियो अपनी निजी काली स्केचबुक में उसे एक भूत के रूप में बनाती है। इसके बाद हर महीने एक नया आदमी आता है और पन्ने पर एक नया जानवर बनता है: कोई कभी ठहरता नहीं, कोई बड़ी सफ़ाई से झूठ बोलता है, कोई ईमानदार होता है, पर उसके पास रुकने की वजह नहीं होती।
उधर उसकी सबसे अच्छी दोस्त प्रिया अपनी शादी की तैयारियों के बोझ तले ख़ुद लड़खड़ाने लगती है। माँ हर साल फ़ोन पर वही सवाल पूछती है: "क्रिसमस पर किसी को साथ ला रही हो?"
बारह महीनों में बारह आदमी आते हैं। लेकिन क्लियो जितना दूसरों को पन्नों पर उतारती है, उतना ही एक सवाल उसकी ओर लौट आता है: जब कोई देख नहीं रहा होता, तब वह सचमुच कौन है?
डेटिंग, दोस्ती और ख़ुद से मिलने पर एक मज़ेदार, चुभता और ईमानदार उपन्यास।