Jump to ratings and reviews
Rate this book

बेबाक / Bebaak

Rate this book
बेबाक आज की लड़कियों की कहानी है। गांव, कस्बों और शहरों की ये लड़कियां अपने-अपने हिस्से के छोटे-बड़े संघर्ष कर रही हैं। ये संघर्ष बाहर से ज़्यादा इनके अपने अंदर चल रहा है। ये लड़कियां सिर्फ ताज़ी हवा में सांस लेना चाहती हैं, ना दिखने वाले बंधनों को काटना चाहती हैं, इनके अंदर प्रेम के भेष में लिपटी वर्जनाओं से निकलने की बेचैनी है। ये लड़कियां जानती हैं कि वो परफेक्ट नहीं हैं, फिर भी खुद को दूसरा मौका देती हैं, इसीलिए ये लड़कियां बेबाक हैं। इन कहानियों में कोई नायिका नहीं है, कोई खलनायक नहीं है, ना दुनिया को बदल डालने वाली कोई क्रांति...सिर्फ ताज़ी हवा में सांस लेने की एक ख्वाहिश है, ना दिखने वाले बंधनों को काटने की छटपटाहट है, प्रेम के भेष में लिपटी वर्जनाओं से निकलने की बेचैनी है। अपने जीवन के साधारणत्व में कुछ असाधारण खोज रही लड़कियों की कहानी है "बेबाक"

192 pages, Hardcover

First published September 12, 2015

12 people are currently reading
103 people want to read

About the author

Kanchan Pant

1 book1 follower

Ratings & Reviews

What do you think?
Rate this book

Friends & Following

Create a free account to discover what your friends think of this book!

Community Reviews

5 stars
12 (80%)
4 stars
2 (13%)
3 stars
1 (6%)
2 stars
0 (0%)
1 star
0 (0%)
Displaying 1 of 1 review
Profile Image for Ankita Chauhan.
178 reviews66 followers
July 18, 2020
Full Review : https://soundingwords.blogspot.com/20...

यूँ तो ग्यारह कहानियों का एक छोटा सा संग्रह है बेबाक जिसे एक दिन में पढ़ लिया मैंने। जहाँ भारी भरकम शब्द उबाऊ लगते है बेबाक का लेखन इस् सरलता से किया गया है कि लगता है एक नदी सी बह रही है और हम उसके पानी में पाँव डाले देख रहे हैं कहानी के पात्रों को आकार लेते हुए, या जैसे घास का हरा मैदान, खामोशी और कंचन जी की कहानियाँ कभी दिल को गुदगुदाती हुई कभी रुलाती हुई पर तय है अंत में कुछ ऐसा परोस देंगी आपकी हथेली पर कि लगेगा कितनी सारी लाइफ वेस्ट कर दी, अब वाकई जीना है” ये कोई सेल्फ-हेल्प टाइप बुक नहीं है बस आपको शायद याद दिला दे आपके जीवन का कोई Phase.. जब हज़ार नाकामयाबी के बावजूद आप जिंदग़ी काटते नहीं थे, जीते थे।

कहानी का हर पात्र अपनें में बिखरा हुआ फिर भी कितना पूर्ण, कितना जीवित। दरअसल कचंन जी की लेखनी की और उनके नज़रिये की तारीफ करनी होगी, हम खुद को खड़ा पाते हैं उनके लिखे लफ्ज़ों के बीच। लगता है लेखक ने हमारी ज़िंदगी से वो सच चुरा कर यहां लिख दिया जिसे खुद से कहने से भी डरते थे हम।

वैसे तो सारी कहानियों अपना अलग अंदाज लिए हुएँ है तुलना करना शायद गलत हो फिर भी मुझे, ‘धनपुतलियाँ, तितलियाँ, ट्रेन का हमसफर, हैप्पी बर्थ डे मिसेज त्रिपाठी, सफेद पंखों वाला सारस, एक थी प्रतीक्षा’ दिल के करीब लगी, रुला दिया मुझे, होठों पर एक मुस्कान के साथ। किताब पढ़ ली गई है पर लगता है शायद ही कभी पूरी पढ़ पाउँगी।

Displaying 1 of 1 review

Can't find what you're looking for?

Get help and learn more about the design.