This is a poetic Hindi translation sans Sanskrit originals. The translation is done by Mool Chandra Pathak and is published by Prabhat Prakashan whose details are givenMool Chandra Pathakजन्म : 6 अक्तूबर, 1932 को जयपुर (राज.) में।शिक्षा : एम.ए. (संस्कृत व हिंदी), पी-एच.डी. (संस्कृत)।कृतित्व : ‘संस्कृत नाटक में अतिप्राकृत तत्त्व’ (शोध ग्रंथ), ‘सिकता का स्वप्न’ (काव्य-संग्रह), ‘राजरत्नाकर महाकाव्य’ हस्तलिखित प्रतियों के आधार पर संस्कृत मूलपाठ का संपादन एवं अनुवाद, ‘भगवद्गीता-काव्य’ (गीता का काव्यानुवाद), ‘भर्तृहरि का नीति शतक’, ‘भर्तृहरि का श्रृंगार शतक’, ‘भर्तृहरि का वैराग्य शतक’ (मुक्तछंदीय काव्यानुवाद), ‘रघुवंश महाकाव्य’ (काव्यानुवाद), ‘पर्यावरणशतकम्’ (संस्कृत काव्य)।सम्मान-पुरस्कार : मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार तथा राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली; राजस्थान सरकार तथा राजस्थान संस्कृत अकादमी, जयपुर द्वारा विद्वत्सम्मानThis product is from Prabhat Prakashan, one of the leading publishing houses in India. Prabhat Prakashan has a glorious history of fifty years of publishing quality books on almost all streams of literature, viz. children books, fiction, science, quiz, humanities, personality development, health, dictionaries, encyclopedias, etc. For the last fifteen years, Prabhat Prakashan has been continuously winning accolades for excellence in book publication.
कालिदास का काव्य अनुपम है। उनकी उपमाएँ अतुल्य हैं। एक-एक पंक्ति में जीवंतता झोंक दी है। कार्तिकेय-जन्म के सर्वविदित प्रसंग को उन्होंने अद्भुत रसमय काव्य का रूप दिया है।
सभी साहित्यानुरागियों के लिए यह काव्य पठनीय है।
मूल चंद्र पाठक जी ने अच्छा अनुवाद किया है, भाव को संरक्षित रखा है। और पद्य होने के कारण अल्पतम शब्दों के प्रयोग से गति भी अवरूद्ध नहीं हुई है। हालाँकि संस्कृत श्लोकों की अनुपस्थिति खलती है, किंतु अनुवादित कविता की मधुर लय उसका भान नहीं होने देती है।