शब्दों की इतनी कमी शायद ही पहले कभी महसूस की हो। मै इस किताब को पढ़ने से पहले एक अलग इंसान था और इसके बाद कुछ अलग 🤧 ( damn हिंदी भाषा कितनी इंटेंस है)
फ़राज़ साहब की शायरी में सबसे खूबसूरत बात है उनका नाजुक लहजा।
जैसे ये कुछ शेर:
"उसकी वो जाने उसे पास ए वफ़ा था कि न था
तुम फ़राज़ अपनी तरफ से तो निभाते जाते"
"आंखें हैं कि खाली नहीं रहती है लहू से
और ज़ख्म ए जुदाई है के भर भी नहीं जाता
पागल हुए जाते हो फ़राज़ उससे मिले क्या
इतनी सी खुशी से कोई मर भी नहीं जाता"
Quote करने की जहां तक बात है तो लगभग हर ग़ज़ल यहां लिखी जा सकती है ये कहते हुए कि "इसने मेरा दिल छू लिया" जितनी तारीफ हो कम ही होगी।