वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित प्रसिद्ध लेखक प्रभात रंजन लघु प्रेम की बड़ी कहानियाँ ‘कोठगोई : चतुर्भुज स्थान के किस्से’ पर प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक इम्तियाज़ अली का कहना है – “बोरिंग चीज़ें नहीं चलती, जिनमें रस होता है वही चलती हैं, वही देर तक मौजूद रहती हैं। कोठों की किस्सागोई मुल्क के बदलते वक़्त का दिलचस्प और यादगार मकाम है। किस्से गुमनाम गायिकाओं के हैं। जिनको समाज ने बदनाम कहा। लेकिन उनकी श्रेष्ठ कला को लोग भूलते जा रहे हैं। उन बदनाम कही जाने वाली गायिकाओं की विरासत को एक सलाम है ‘कोठगोई’। प्रभात रंजन की कोठगोई इस संस्कृति से प्रेरित किस्सों का एक मज़ेदार संग्रह है।”
शिक्षा : पीएचडी (उत्तर आधुनिकतावाद और मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास, उदय प्रकाश की कहानियों में राजनीतिक-सामाजिक परिप्रेक्ष्य)।
प्रकाशित कृतियाँ : दो कहानी संग्रह—'जानकी पुल’ और 'बोलेरो क्लास’,'नीम का पेड़’ (राही मासूम रज़ा लिखित धारावाहिक का उपन्यास के रूप में रूपान्तरण), 'स्वच्छन्द’ (सुमित्रानंदन पन्त की कविताओं के संचयन का अशोक वाजपेयी और अपूर्वानंद के साथ संपादन), 'टेलीविजन लेखन’ (असगर वजाहत के साथ सह-लेखन), 'एंकर रिपोर्टर’ (पुण्य प्रसून वाजपेयी के साथ सह-लेखन), 'जादुई यथार्थ का जादूगर मार्केज़’ (गाब्रियल गार्सिया मार्केस के जीवन और लेखन पर एकाग्र हिंदी में पहली पुस्तक), 'कोठागोई’—(मुज़फ्फरपुर की तवायफ संस्कृति पर एकाग्र पुस्तक विशेष चर्चित)।
अनुवाद : अनुवाद की लगभग 25 पुस्तकें प्रकाशित, जिनमें देवदत्त पट्टनायक की पुस्तक 'राम की गाथा’, मोहसिन हामिद का उपन्यास 'जल चुके परवाने कई’, खुशवंत सिंह की किताब 'खुशवंतनामा’, दिलीप कुमार की आत्मकथा 'वजूद और परछाईं’, सत्य नडेला की पुस्तक 'हिट रिफ्रेश’ और आर. रघुराम राजन की पुस्तक 'आई डू व्हाट आई डू’ आदि प्रमुख।
सम्पादन : महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्व-विद्यालय की पत्रिका 'बहुवचन’ का सम्पादन, उसी विश्वविद्यालय की अंग्रेजी पत्रिका 'हिंदी’ में सहायक सम्पादक, 'आलोचना’ में संयुक्त सम्पादक, प्रसिद्ध समाचारपत्र 'जनसत्ता’ में सहायक सम्पादक।
पुरस्कार/ सम्मान : 'जानकी पुल’ कहानी के लिए सहारा समय कथा सम्मान, 'जानकी पुल कहानी संग्रह’ के लिए प्रेमचंद कथा सम्मान, कृष्ण बलदेव फेलोशिप, एबीपी न्यूज सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर सम्मान, 'कोठागोई’ पुस्तक के लिए जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में द्वारका प्रसाद अग्रवाल युवा लेखक पुरस्कार।
Jankipul.com नामक प्रसिद्ध वेबसाइट के मॉडरेटर।
सम्प्रति : दिल्ली विश्वविद्यालय के ज़ाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज (सांध्य) में अध्यापन।
Librarian Note: There is more than one author in the Goodreads database with this name.
प्रभात रंजन जी की लिखी “कोठागोई” एक बेमिसाल किताब है. कोठागोई पढ़कर हिंदी साहित्य के भविष्य की और से निश्चिन्त हुआ जा सकता है. प्रभात रंजन जी के काम को उनके ब्लॉग “जानकिपुल” के जरिये थोडा बहुत जानता था पर असली लेखक का परिचय कोठागोई के माध्यम से हुआ. कोठागोई मुजफ्फरपुर के चतुर्भुज संसथान के किस्सों का संकलन है या यूँ कहना उचित होगा की जीवन की दास्ताँ है जो कई दशकों में पसरी पड़ी है उन्नीसवी सदी के उत्तरार्ध से हाल के वक्तो तक. कहानी क्या है वक़्त की बेरहम मार से जूझते हुए समाज के एक ऐसे तबके का हाल-इ-बयान जिसे हम अब भी नीची नज़रों से देखते है. गायिक गायिकाओं की, सुनाने-सुनाने वालों की, रसवंतो की – दरअसल उन सभी की जिनका जीवन चतुर्भुज संस्थान ने कहीं न कहीं कभी न कभी छुआ है. सभी रस मिलेंगे जीवन के इस किताब में जो सीधी सरल लेखनी से और भी स्वादिष्ट लगती है. और हाँ, लेखक के अंदाज़ ने रुमानिकरण भी किया है अपनी विशिष्ट शैली से. जल्दी से पढ़ ले.
जैसे जीवन साधारण होते हुए भी विलक्षण है, सरल होते हुए भी रोमांचक है वैसे ही यह किताब है. ऐसा भी नहीं कि सनसनी फैला दे और ऐसी भी नहीं कि जानकारी के बोझ तले दबा दे.
प्रभात रंजन जी वर्तमान हिंदी जगत का एक जाना-माना नाम हैं। अभी ख़ुद को इस लायक तो नहीं मानती हूँ कि उनके लिखे की समीक्षा कर सकूँ लेकिन उनकी लिखी यह किताब पढ़ने के बाद जो अनुभव किया वह ही लिख रही हूँ।
ज़्यादा पुरानी बात नहीं है जब तक मैं मुजफ्फरनगर और मुज़फ़्फ़रपुर में घोर कन्फ्यूज़ रहती थी। फिर जब मुजफ्फरनगर में दंगे हुए तबसे पहचान बनाने में आसानी हुई। ख़ैर यहाँ यह बेमतलब बात सिर्फ इसलिए बता रही हूँ कि यह किताब मुज़फ़्फ़रपुर पर केंद्रित है और एक समय में जिस शहर को पहचानने में ही मुझे कठिनाई होती थी इस किताब को पढ़ने के बाद उसकी गीत-संगीत पृष्ठभूमि से ख़ूब परिचय हो गया है, इतना कि एक बार वह स्थान देख आने को जी चाहता है।
जब किसी वैश्या को देखती हूँ तो मन में सबसे पहला ख़याल यही आता है कि वह पैदाइशी तो ऐसी न होगी, जाने किस-किस सितम को ढोकर यहाँ तक पहुँची होगी। गीत-संगीत की एक सुंदर छवि से कैसे विकृत होकर चतुर्भुज स्थान आज वैश्यालय माना जाने लगा उसकी कहानी है, यह किताब भी उसकी कहानी है।
कथेतर होकर ही किसागगोई के अंदाज़ में लिखकर प्रभात जी ने इसकी रोचकता बनाए रखी वरना जिन्हें उस स्थान से परिचय नहीं वे ख़ुद से इसको जोड़ ही ना पाते।
मध्यप्रदेश के ग्रामीण इलाकों में बुंदेली, बघेली लोक गीतों को सुनते हुए बचपन बीता। संगीत का ज़्यादा ज्ञान नहीं लेकिन पिता की बेहद रुचि के कारण रेडियो पर लोकगीतों को सुनती रही। आँचलिक गीतों का लुप्त हो जाना एक व्यथा है परंतु विश्व स्तर पर ब्रजबाला देवी, पन्ना बाई जैसे नामों के साथ संगीत की ध्वजा फ़हराने वाले, बड़े-बड़े गीतकारों के गलों को सुर देने वाले किसी स्थान की दुर्दशा यदि हो जाए तो मन में यही एक कसक उठती है कि काश हम भी उस समय में पैदा हुए होते। यही कसक इस किताब के पन्नों को पलटते हुए बढ़ती जाती है जब गौहरखान अपनी कहानी सुनाते हैं।
किस्सा चाहे सीमा के इस पार का हो या उस पार का, कैसे जमीदारों के यहाँ महफ़िलें सजती थीं और कितनी तन्मयता से उस संगीत को कद्रदान मिलते थे यह आप सचित्र किताब में देखेंगे। कैसे वह संगीत नाच और फिर बंदूकों की हवाई फायरिंग के जश्नों के साथ फूहड़ता में बदल गया यह पढ़ते हुए एक बारगी मुझे "झल्ला मेरा आशिक़ वल्लाह" ध्यान हो आया था।
उस स्थान पर संगीत आज भी जीवित है और यह पढ़ने के बाद यदि कभी उस जगह जा पाई तो उसे भी देख पाने में सक्षम होउंगी जो अब वहां नहीं है। प्रभात जी को बधाई इतनी सुंदर प्रस्तुति के लिए। आपके लेखन और व्यक्तित्व दोनों से सीखने मिलता है। 😊
एक छोटी सी शिकायत पढ़ते हुए हुई कि, 'कहते हैं' का अतिरेकता में प्रयोग लगा जो कई-कई जगह इरिटेट करता है और तारतम्यता को तोड़ता है, साथ ही किताब में टाइपिंग मिस्टेक्स रह गई हैं, प्रकाशक को दोनों ही पर ध्यान देना चाहिए।