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स्मृति की रेखाएँ

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स्मृति की रेखाएँ महादेवी मूलतः कवयित्री हैं, परंतु उन्होंने गद्य में भी श्रेष्ठ लेखन किया। विशेष बात यह है कि हिंदी साहित्य में उनके रेखाचित्र जिस शिखर पर खड़े हैं, उन्हें छूनेवाला आज तक कोई नहीं हुआ। एक महादेवी ही हैं, जिन्होंने गद्य में भी कविता के मर्म की अनुभूति कराई और ‘गद्यं कवितां निकषं वदन्ति’ को चरितार्थ किया। स्मृति की रेखाएँ में निरंतर जिज्ञासाशील महादेवी ने अपनी स्मृति के आधार पर अमिट रेखाओं द्वारा अत्यंत सहृदयतापूर्वक जीवन के विविध रूपों को चित्रित कर पात्रों को अमर कर दिया है। महादेवी ने अपने अधिकांश रेखाचित्रों में निम्नवर्गीय पात्रों की विशेषताओं, दुर्बलताओं और समस्याओं का चित्रण किया है। वृद्ध ‘भक्तिन’ की प्रगल्भता तथा स्वामि-भक्त ‘चीनी युवक’ की करुण मार्मिक जीवन-गाथा, पर्वत के कुली ‘जंगबहादुर’ की कर्मठता और फिर ‘मुन्नू’, ‘ठकुरी बाबा’, ‘बिबिया’ तथा ‘गुँगिया’ जैसे चरित्रों की मर्मस्पर्शी जीवन-झाँकियाँ पाठक को अभिभूत कर देने में सक्षम हैं।

118 pages, Paperback

Published January 1, 2008

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About the author

Mahadevi Verma

49 books83 followers
Mahadevi Verma (26 March 1907 – 11 September 1987), also spelled Mahadevi Varma in her English collections, was best known as an outstanding Hindi poet, and was a freedom fighter, woman's activist and educationist from India. She is widely regarded as the "modern Meera".[1] She was a major poet of the Chhayavaad generation, a period of romanticism in Modern Hindi poetry ranging from 1914–1938.[2] With the passage of time, her limited but outstanding prose has been recognised as unique in Hindi literature. She was a prominent poet in Hindi Kavi sammelans (Gatherings of poets).

She was the Principal, and then the Vice-Chancellor of Prayag Mahila Vidyapeeth, a woman's residential college in Allahabad. She was awarded India's highest literary award, for lifetime achievement, the Sahitya Akademi Fellowship in 1979, followed by the Jnanpith Award in 1982.[3] She was the recipient of the Padma Bhushan in 1956[4] and the Padma Vibhushan in 1988, India's third and second highest civilian awards respectively.


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महादेवी वर्मा (२६ मार्च १९०७ — ११ सितंबर १९८७) हिन्दी की सर्वाधिक प्रतिभावान कवयित्रियों में से हैं। वे हिन्दी साहित्य में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों[क] में से एक मानी जाती हैं।[1] आधुनिक हिन्दी की सबसे सशक्त कवयित्रियों में से एक होने के कारण उन्हें आधुनिक मीरा के नाम से भी जाना जाता है।[2] कवि निराला ने उन्हें “हिन्दी के विशाल मन्दिर की सरस्वती” भी कहा है।[ख] महादेवी ने स्वतंत्रता के पहले का भारत भी देखा और उसके बाद का भी। वे उन कवियों में से एक हैं जिन्होंने व्यापक समाज में काम करते हुए भारत के भीतर विद्यमान हाहाकार, रुदन को देखा, परखा और करुण होकर अन्धकार को दूर करने वाली दृष्टि देने की कोशिश की।[3] न केवल उनका काव्य बल्कि उनके सामाजसुधार के कार्य और महिलाओं के प्रति चेतना भावना भी इस दृष्टि से प्रभावित रहे। उन्होंने मन की पीड़ा को इतने स्नेह और शृंगार से सजाया कि दीपशिखा में वह जन-जन की पीड़ा के रूप में स्थापित हुई और उसने केवल पाठकों को ही नहीं समीक्षकों को भी गहराई तक प्रभावित किया।[ग]

उन्होंने खड़ी बोली हिन्दी की कविता में उस कोमल शब्दावली का विकास किया जो अभी तक केवल बृजभाषा में ही संभव मानी जाती थी। इसके लिए उन्होंने अपने समय के अनुकूल संस्कृत और बांग्ला के कोमल शब्दों को चुनकर हिन्दी का जामा पहनाया। संगीत की जानकार होने के कारण उनके गीतों का नाद-सौंदर्य और पैनी उक्तियों की व्यंजना शैली अन्यत्र दुर्लभ है। उन्होंने अध्यापन से अपने कार्यजीवन की शुरूआत की और अंतिम समय तक वे प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्रधानाचार्या बनी रहीं। उनका बाल-विवाह हुआ परंतु उन्होंने अविवाहित की भांति जीवन-यापन किया। प्रतिभावान कवयित्री और गद्य लेखिका महादेवी वर्मा साहित्य और संगीत में निपुण होने के साथ-साथ[4] कुशल चित्रकार और सृजनात्मक अनुवादक भी थीं। उन्हें हिन्दी साहित्य के सभी महत्त्वपूर्ण पुरस्कार प्राप्त करने का गौरव प्राप्त है। भारत के साहित्य आकाश में महादेवी वर्मा का नाम ध्रुव तारे की भांति प्रकाशमान है। गत शताब्दी की सर्वाधिक लोकप्रिय महिला साहित्यकार के रूप में वे जीवन भर पूजनीय बनी रहीं।[5] वर्ष २००७ उनकी जन्म शताब्दी के रूप में मनाया गया।

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Displaying 1 - 6 of 6 reviews
Profile Image for Abhijit Rai.
9 reviews
February 2, 2020
महादेवी वर्मा जी अपने आस पास के लोग, उनकी रीतिनीति और बोल चाल को ऐसे प्रस्तुत करतीं हैं कि उनके पात्र परिचित ही जान पड़ते है।

दरिद्र की व्यथा और उसे दिन प्रतिदिन के संघर्षों का चित्रण जैसे महादेवीजी करती है, वैसा चित्रण आज के समय में शायद ही कोई कर पाए।

पुस्तक में महादेवीजी अपने आस पास के लोग, यात्रा में परिचित लोगों की कथा ही सुना रही है, पर ये पत्र हमसे अपरिचित नहीं हैं। हम इन्हें प्रतिदिन देखते हैं, अंतर इतना है कि इस लेखिका की तरह उनपर ध्यान नहीं देते। उनको नहीं समझते।

इस पुस्तक को समाज का दर्पण कहना अनुचित नहीं होगा। समाज में बसे रूढ़ियों और विडंबनाओं का एक सटीक चित्रण हैं के कहानियां।

अवश्य पढ़ें।
Profile Image for Abhishek.
68 reviews2 followers
October 4, 2019
महादेवी जी के लेखन में ऐसा सम्मोहन है कि वे स्वयं के बखान के साथ ही साथ कब मार्मिक बातें लिख जाती हैं पता भी नहीं चलता. मन में बस एक टीस रह जाती है और आप ये भूल जाते हैं कि 7 पन्ने की कहानी में 4 पन्ने तो उन्होंने केवल स्वयं के बारे में लिखा.
10 reviews6 followers
November 18, 2015
This book is a beautifully written memoir by undoubtably one of the best modern Hindi authors. It recollects Mahadevi Varma's experiences with people from the downtrodden sections of the contemporaneous Indian society. The language and expressions are exceptional and a soothing rhythm permeates through the text. To read this book, one needs to have a considerable Hindi vocabulary as the language used in it is quite ornamental and literary. There are 7 parts of the book, each dedicated to one of the quirky personalities which leave a great impact on the author. These characters include a crude but devoted lady who worked as her household help, a Chinese hawker who, in no time, forms a warm friendly relationship with her, her watchman, etc.

Beautiful and soothing, a great book by one of my favourite poets.
Profile Image for Abhishek Singh.
17 reviews1 follower
May 25, 2021
महादेवी जी की जितनी प्रशंशा की जाये उतनी काम है। वे जितना बारीक चित्रण करती है किरदारों का उससे यह मालुम पड़ता है की आप स्वयं उनकी दुनिया के एक पात्र है और उनके साथ ही जीवन आचरण कर रहे है। फिर चाहें वो भक्तिन हो या चीनी फेरी वाला, चाहें जंगिआ हो या गूंगिया, हर किरदार की कहानी इतनी मार्मिक है की आँखों को नाम कर ही देती है। इन सबमे सबसे प्रिय चुनना अत्यंत कठिन है पर अगर ज़ोर दिया जाए तो मै भक्तिन को चुनूंगा क्योंकि उसे महादेवी जी के साथ बिताने को सबसे ज्यादा वक़्त मिला और स्वछंदता भी
8 reviews
August 11, 2021
What can I say about this book, It should be translated in other languages too. The way she penned the character, they would not even think of themselves.
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