सन् 1947 का बँटवारा दरअसल नक्शे पर खिंची एक रेखा भर नहीं था, वह ऐसा घाव था जिसने पूरे उपमहाद्वीप की आत्मा को दो हिस्सों में बाँट दिया। किताबों में इसे इतिहास की घटना कहा गया, पर असली दर्द तो वहाँ था जहाँ लोग घर छोड़ रहे थे, आदतें बदल रही थीं, रिश्ते टूट रहे थे और भरोसा धीरे–धीरे दम तोड़ रहा था। हमारा साहित्य इस पीड़ा को कई आवाज़ों में दर्ज करता है कहीं कटे हुए मकानों और जली हुई बस्तियों की कहानी, कहीं खून, धुएँ और आतंक से भरी रातें।
इन्हीं सब के बीच साठ के दशक में राही मासूम रज़ा का टोपी शुक्ला आता है, जो यह दिखाता है कि बँटवारा सिर्फ सरहद पर नहीं होता, बहुत गहरी जगह पर होता है.... दिमाग के भीतर, दिल के भीतर, उन गलियों की हवा के भीतर जहाँ कभी अज़ान और घंटी साथ–साथ बजती थीं और किसी को फर्क महसूस नहीं होता था। रज़ा का यह उपन्यास उसी ख़ामोश बँटवारे की कहानी है, उस छोटे–से डर की, जो पहले शंका बनकर जन्म लेता है, फिर फुसफुसाहट बनता है, और देखते ही देखते कमरे से लेकर दिल तक हर चीज़ में दरार छोड़ जाता है।
रज़ा इस किताब में तलवारों की चमक, लाशों के अंबार या नारे की ऊँची आवाज़ नहीं लिखते; वे उस बेचैनी को लिखते हैं जो बाहर से कम, भीतर से ज़्यादा जलाती है। यही कारण है कि टोपी शुक्ला को महज़ उपन्यास कह देना जैसे उसकी धड़कनें कम कर देना है।
यह पुस्तक उस “हिंदुस्तानी” पहचान की आख़िरी साँसों का बयान है, जो धीरे–धीरे हिंदी–उर्दू के झगड़े, हिंदू–मुसलमान की शक भरी निगाहों और समाज के बढ़ते अविश्वास में कहीं खोती चली जाती है। जैसे कोई पुराना हवेलीनुमा घर, जो बरसों तक साथ खड़ा रहता है, पर एक दिन पता चलता है कि भीतर ही भीतर उसकी दीवारें बहुत पहले से चुपचाप दरक रही थीं; रज़ा बस इतना करते हैं कि हमें इन दरारों के पास ले जाकर धीरे से कह देते हैं –...देखो, टूटन यहीं से शुरू हुई थी।
उनके यहाँ कथा किसी सीधी रेखा पर नहीं चलती; वह वैसे ही बहती है जैसे यादें बहती हैं ....कभी आगे दौड़ जाती हैं, कभी अचानक बचपन के किसी मोड़ पर लौट आती हैं, कभी एक छोटी–सी घटना के सहारे बहुत लम्बा सफर तय कर लेती हैं। समय यहाँ सिर्फ दिन–तारीख नहीं, अपने आप में पात्र है ....कभी गवाही देता है, कभी प्रश्न करता है, कभी चुपचाप कोने में बैठकर सब देखता है।
बलभद्र नारायण शुक्ला उर्फ़ टोपी इस उपन्यास का चेहरा है, पर केवल पात्र नहीं, एक पूरे दौर का प्रतीक है। उसका “टोपी” बन जाना किसी मज़ाक का हिस्सा नहीं, एक पूरी पीढ़ी की बेचैनी का सार है जो अपने आप को बस “भारतीय” कहकर जीना चाहती थी, पर हर मोड़ पर उससे पूछा जाता था पहले बता, तू है कौन। कॉलेज के छोटे से विद्रोह से उसकी कथा शुरू होती है, जब मंच पर चढ़ने से पहले सिर पर टोपी पहनने की आज्ञा दी जाती है और वह यह कहकर मानने से इंकार कर देता है कि वह किसी भी नियम को सिर्फ इसलिए नहीं मानेगा कि सब मानते हैं। यही समाज पहले उसके इसी विरोध से उसे “टोपी” नाम देता है, और बाद में वही समाज उसके हर कदम, हर रिश्ते, हर निर्णय पर अपने हिसाब से मुहर लगाने लगता है।
टोपी की त्रासदी यह है कि वह किसी टोपी, किसी झंडे, किसी नाम से बैर नहीं रखता, बस अपनी आत्मा को इन सब से बँधने नहीं देता। वह उन खाँचों से बचना चाहता है जिनमें समाज उसे ठूँस देना चाहता है, और यही उसकी सबसे गहरी सज़ा बन जाती है।
बचपन से ही वह अपने ही घर में रंग–भेद और ऊँच–नीच की चुभन झेलता है; सांवले रंग के कारण दादी के स्नेह से दूर, वह अपने ही घर में पराया बना दिया जाता है, जबकि इफ़्फ़न की दादी की रसोई और गोद में उसे पहली बार वह अपनापन मिलता है जो खून के रिश्तों से नहीं, व्यवहार से जन्म लेता है।
इफ़्फ़न और उसकी दादी इस कथा के भीतर जैसे एक उजला कोना हैं। एक तरफ ब्राह्मण घर का लड़का टोपी, दूसरी तरफ सैयद घर का लड़का इफ़्फ़न; दोनों की मित्रता इस विश्वास पर ठप्पा लगा देती है कि धर्म के नाम पर खींची गई रेखाएँ मनुष्य की गहरी आत्मीयता के सामने कितनी छोटी पड़ जाती हैं।
इफ़्फ़न की दादी, अपनी पूरबिया बोली, रसोई की महक और गोद की गरमी के साथ, उन सब भाषाई और धार्मिक दीवारों को पार कर जाती हैं जिन्हें राजनीति ने बड़ी मेहनत से खड़ा किया है। टोपी के लिए वे केवल किसी और की बुज़ुर्ग नहीं, अपने ही बचपन की छाया हैं; जब वह कहता है, “तेरी दादी की जगह मेरी दादी क्यों नहीं मर गई?” तो यह कोई मासूम भावुकता भर नहीं, उस संस्कृति के विरुद्ध एक मौन प्रश्न है जो रंग, जाति और शुद्धता के नाम पर अपने ही बच्चों के बीच फासले बना देती है। इफ़्फ़न के तबादले और दादी की मृत्यु के बाद टोपी के जीवन से वह आख़िरी आश्रय भी छिन जाता है जहाँ वह अपनेपन की साँस ले पाता था, और उसके बाद जो असफलताएँ, अकेलापन और टूटन आती है, वे उसकी बुद्धि की कमी नहीं, भीतर से टूटे हुए मन की सच्ची रिपोर्ट हैं।
उपन्यास का एक बड़ा हिस्सा भाषा की राजनीति और अकादमिक पाखंड पर भी रोशनी डालता है। रज़ा दिखाते हैं कि कैसे एक ही बोलचाल वाली ज़ुबान को सत्ता ने दो खेमों में बाँट दिया संस्कृत से लदी हुई हिंदी को एक धर्म से जोड़ दिया गया, और फ़ारसी–अरबी मिली हुई उर्दू को दूसरे धर्म से। सुभद्रा देवी अपने आप को हिंदी की रखवाली करने वाली समझती हैं, उर्दू सुनते ही तिक्त हो जाती हैं, जबकि उनकी अपनी बोली उसी मिलीजुली हिंदवी का रूप है जिसे वे पहचानने से इंकार कर देती हैं। दूसरी ओर टोपी उर्दू के कठोर शब्दों को जान बूझकर उलट–पुलट कर बोलता है, मानो पूछ रहा हो भाषा दिल से बनती है या नियमों की तख्ती से।
इसी तरह विश्वविद्यालय का संसार भी बाहर से प्रगतिशील और भीतर से संकीर्ण दिखता है; जो अध्यापक मंचों पर खड़े होकर धर्मनिरपेक्षता के गीत गाते हैं, वही अपनी निजी ज़िंदगी में पूर्वाग्रहों से भरे बैठे हैं। टोपी को वहाँ भी इंसान नहीं, एक उदाहरण की तरह देखा जाता है, जिस पर विचारों के प्रयोग किए जा सकें।
इन सब के बीच राजनीति का खेल सबसे कटु रूप में सामने आता है। रज़ा का कहना है कि यदि स्वतंत्रता संग्राम की सारी कुर्बानियों का फल केवल घृणा बनकर रह जाए, तो यह इतिहास नहीं, सामूहिक अपराध है। नेताओं को मालूम है कि यदि दोनों समुदाय सच में सहज होकर बैठने लगें, तो उनके भाषणों की आग ठंडी पड़ जाएगी; इसलिए वे संदेह, अफवाह और अविश्वास को जीवित रखते हैं। वही स्थान, जहाँ कभी लोग धर्म से ऊपर उठकर बैठते थे ....मोहल्ले का चबूतरा, चौपाल, पार्क, विश्वविद्यालय का पेड़ धीरे–धीरे सिकुड़ने लगते हैं।
टोपी देखता है कि जिन जगहों पर पहले दोस्ती का फर्क नहीं पड़ता था, वहाँ अब “हम” और “वे” के अदृश्य बोर्ड लग गए हैं। यही सिकुड़ती हुई जगहें, यही लगातार बढ़ता अकेलापन अंततः उसे उस मोड़ तक पहुँचा देता है जहाँ जीना उसे असंभव लगने लगता है। उसकी आत्महत्या किसी कमजोर मन की कहानी नहीं, उस सभ्यता की हार है जो अपने सबसे ईमानदार, सबसे निष्कपट बच्चों को जीने के लिए जगह नहीं दे पाती।
अंत में टोपी शुक्ला किसी उत्तर पर नहीं रुकता...यह एक टीस बनकर पाठक के भीतर बस जाता है। किताब पढ़ने के बाद मन में बार–बार यही प्रश्न उठता है कि क्या हमने सच में स्वतंत्रता पाई थी, या केवल बाहरी शासक बदल गए और भीतर के डर, अविश्वास और दीवारें नए रूप में मजबूत हो गईं।
उपन्यास अधूरा है, ठीक वैसे ही जैसे टोपी का जीवन अधूरा रहा। पर शायद इसी अधूरेपन में इसकी असली शक्ति छिपी है। य�� बताता है कि “हिंदुस्तानी” होने का जो सपना कभी देखा गया था, वह अब भी आधा लिखा है; जब तक भाषा की लड़ाई, समुदायों के बीच अविश्वास से बनी दीवारें नहीं गिरतीं, तब तक हर पीढ़ी में कोई न कोई टोपी दोबारा जन्म लेगा और धीरे–धीरे टूटता चला जाएगा।
रज़ा का यह उपन्यास केवल कथा नहीं, पूरे भारतीय समाज का अन्तः दर्शन है, जो समय के साथ पुराना नहीं होता, बल्कि और ज़्यादा सच होता जाता है और हमें बार–बार यह याद दिलाता है कि यदि हम अपने समय को समझना चाहते हैं, तो टोपी की कहानी से मुँह नहीं मोड़ सकते।