प्रतिनिधि कविताएँ – हरिवंशरराय बच्चन जीवन और योवन, सत्य और स्वप्न तथा सौन्दर्य और प्रेम के अप्रतिम कवि हरिवशराय बच्चन के विशाल काव्य-कोष से चुनी हुई ये कविताएँ बहुत दूर तक आपके साथ जाने वाली है ! अपने जीवन का कोई-न-कोई रंग, कोई-न-कोई पहलू इनके शब्दबंधों में आप अवश्य तलाश लेंगे और कविता सहज ही आपकी निजी संवेदना का हिस्सा बन जाएगी ! बच्चन-काव्य की यह एक ऐसी विशेषता है, जिससे छायावादोत्तर हिंदी कविता को लोकग्राह्य बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ! दाय के रूप में प्राप्त छायावादी प्रयोगात्मक काव्य-शैली से अप्रभावित रहकर उन्होंने जीवन-सत्यों की अनुभुतिगम्य रचना की! काव्य-क्षेत्र में उनके पदार्पण और रचनात्मक विद्रोह को लक्ष्य करते हुए एक प्रक्यत समालोचक ने लिखा था कि “बच्चन सारा ढांचा बदलकर आए नई भाषा, नई अभिव्यंजना और नए किस्म की अनुभूति, उनका सब कुछ नया-ही-नया है !” निश्चय ही बच्चन-काव्य का यह नयापन इस शताब्दी के पांच दशकों में फैला हुआ है और इस काल में होने वाली तमाम सामाजिक उथल-पुथल को भी उन्होंने कविताओ में रेखांकित किया है, पर इस सबको अनुभूति की आँख और संवेदना की छुं से ही परखा जा सकता है ! तो आइए, इन कविताओं के माध्यम से हम अपने जीवन-यथार्थ और मनोमय भावलोक की यात्रा पर चलें !
Thought I'd read a couple of poems before sleeping. And here I am slurping it up in a single sitting at 4AM!
Soothing, inspiring, philosophy of life, reminiscence from an old man's view! These are gems and quite easy to understand and enjoy.
Edit: The poem - "Koshish Karne walo ki Kabhi Haar Nahi Hoti" is so very inspiring and my personal favorite among all. Have read it more than 100 times since school days.... and still had goosebumps while reading it. This poem is by Sohanlal Dwivedi Ji and wrongly attributed as by Bachchan Ji or Nirala Ji in many reputed print media including CBSE study books. Thanks to the comment by Rkkarnani for pointing this. End of Edit
Very happy to have read this... and will be reading more poems by him.
हरिवंश राय बच्चन के 'मधु काव्य' का साहित्य में लोकप्रिय स्थान रहा है. इसके इतर उनके अन्य काव्य-संग्रह में समाहित कविताओं को पढ़ना दिलचस्प रहा.
इनमें से कई कविताएं व्हाट्स-एप पर इन दिनों सुविचारों के तौर पर तैरती हुई गाहे-बगाहे मिल जाती है.
कवि की पहली पत्नी के मृत्यु के उपरांत और बाद के लेखन में भी अंतर दिखता है.
भाषा में प्रवाह है. जिसे गाया और गुनगुनाया जा सकता है. शब्दों का ताना-बाना देशज के साथ खाटी हिंदी के शब्दों में पिरोई गई है.
साथ ही एक लेखक के तौर पर समाज के मसलों और सवाल को भी बखूबी उठाया है.
लेकिन अफसोस इसके बिल्कुल इतर उनके पुत्र जिसका नाम किताब पर कॉपीराइट के तौर पर दिखा और उनकी बाद की नस्ल जिन्होंने इस कवि को सिर्फ अपने जीवन में दुहा ही. कुछ सीख नहीं ली. और वक़्त के अनुसार सत्ता के चरणों में अपने हित के लिए बिछ गए. बिना कोई सवाल किए. यह भी अजीब है. खैर.