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120 pages, Hardcover
Published June 22, 1905
तुम खड़ी क्यों हो
‘तुम खड़ी क्यों हो
बैठ जाओ।’
‘नहीं अब मैं चलूँगी।’
यह सुनते ही
जाने को कब से उद्धत यह पहाड़ है
जिसकी चोटी पर एक घर मंदिर है
और एक देवी स्त्री।
वह जा रही मूर्ति थी।
वह पत्थर की तरह कठोर नहीं थी।
उसके चले जाने के समय से
जाने को उद्धत यह पहाड़
किसी एक दिन से
उसके आने की प्रतीक्षा में
उद्धत पहाड़ है।
यहाँ तक आने की दूरी को
यहाँ तक आने की दूरी को
पारकर नहीं, समेट आया
छोड़कर नहीं, साथ लिये
लौटकर जाने, पीछे कुछ छूटा नहीं
एक कदम के लायक भी नहीं
वहाँ मेरा अनदेखा कुछ नहीं बचा
और यहाँ दर्शनार्थियों की भीड़ में शामिल।
इस भीड़ में उसके दिख जाने में रहना चाहता हूँ
उसके दिखने में अपने दिखने से आत्मसात।
मैं अलख देखना चाहता हूँ
उसके होने में अपने को भस्म कर डालने का
माथे पर प्रेम का भभूत लगाए
कि नहीं होने को
कि नहीं होने को
टकटकी बाँधकर देखता हूँ
आकाश में
चंद्रमा देखने के लिए
चंद्रमा के नहीं होने को।
कब से नहीं होने को
कब से टकटकी बाँधकर।
चले जाने के इस शून्य से
कभी लौटकर आ जाने के
तब तक के उस शून्य को।
साथ न होने के इस सत्य से
साथ हो जाने की उस कल्पना तक
उसके दिख जाने के खोये को
टकटकी बाँधकर ढूँढ़ता हूँ।
कि मेरे इस एकटक के पिंजड़े में
उसका नहीं दिखना
पंख फड़फड़ाता है
और पिंजड़े से निकलकर
उड़ता हुआ
उसी तरफ जाता है
जिस तरफ उसका दिखना उड़ता हुआ
ओझल होता है।
हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
व्यक्ति को मैं नहीं जानता था
हताशा को जानता था
इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया
मैंने हाथ बढ़ाया
मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ
मुझे वह नहीं जानता था
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था
हम दोनों साथ चले
दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे
साथ चलने को जानते थे।