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अतिरिक्त नहीं

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"आज़ादी के बाद हिन्दी कविता को जिन कवियों ने अपनी राह चलते एक ख़ास शैली में समृद्ध करने का काम किया, उनमें एक नाम विनोद कुमार शुक्ल का है। अपने कथ्य लिए जैसी भाषा, शिल्प और दृष्टि ईजाद की है इस कवि ने, वह अन्यत्र दुर्लभ है। अतिरिक्त नहीं विनोद कुमार शुक्ल का इस जगत् से जो कुछ भी सम्बद्ध, उसकी कविताओं का संग्रह है, उसके अतिरिक्त नहीं। इसलिए इसमें जो लोक है, वह इस तरह जिया हुआ कि व्यक्त में अव्यक्त कुछ नहीं रह जाता, कुछ अगर रह भी जाता है तो वह वेदना के तल पर हमारे भीतर बहुत देर तक ठहरा रहता है- 'हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था / व्यक्ति को मैं नहीं जानता था / हताशा को जानता था'; या इस तरह कि 'तन्दूर में बनती हुई रोटी / सबके हिस्से की बनती हुई रोटी नहीं है।'

120 pages, Hardcover

Published June 22, 1905

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About the author

Vinod Kumar Shukla

64 books171 followers
Vinod Kumar Shukla (born 1 January 1937) is a modern Hindi writer known for his surreal style that often borders on magic-realism and sometimes move beyond it. His works include the novels Naukar ki Kameez and Deewar Mein Ek Khirkee Rahati Thi (A Window lived in a Wall), which won the Sahitya Akademi Award for the best Hindi work in 1999.

His first collection of poems Lagbhag Jai Hind was published in 1971. Vah Aadmi Chala Gaya Naya Garam Coat Pehankar Vichar Ki Tarah was his second collection of poems, published in 1981 by Sambhavna Prakashan. Naukar Ki Kameez (The Servant's Shirt) was his first novel, brought out in 1979 by the same publisher. Per Par Kamra (Room on the Tree), a collection of short stories, was brought out in 1988, and another collection of poems in 1992, Sab Kuch Hona Bacha Rahega.

Vinod Kumar Shukla was a guest littérateur at the Nirala Srijanpeeth in AGRA from 1994 to 1996 during which he wrote two novels Khilega To Dekhenge and the refreshing Deewar Mein Ek Khirkee Rahati Thi. The latter has been translated into English by Prof. Satti Khanna of Duke University as A Window Lived in a Wall.

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Displaying 1 - 10 of 10 reviews
Profile Image for Shashank Mishra.
27 reviews4 followers
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September 26, 2020
इस कविता संग्रह की शुरुआत होती है "हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था".. ये वो कविता है जो अपनी अर्थवत्ता में हिंदी की सबसे श्रेष्ठ कविताओं में गिनी जानी चाहिये.. कई साल पहले अभिनेता मानव कौल से ये कविता सुनी थी, उसके बाद न जाने कितनी बार सुनी, पढ़ी और न जाने कितने लोगों को सुनाई.. ये कविता कहीं बहुत गहराई में पैठ बनाती है और आप इससे सीधे जुड़ते हैं.. इस संग्रह की शुरूआत इस कविता से पाकर मेरा पाठक मन रोमांचित हो उठता है.. लेकिन....

जब किताब पूरी करता हूँ तो बहुत सी कविताएं नहीं समझ में आती हैं.. बचपन में जब भक्तिकाल, रीतिकाल या शुरुआती आधुनिक युग की कविताएं पढ़ते थे तो कई बार कठिन शब्दों या अवधी, ब्रज के प्रयोग के कारण बात नहीं समझ में आती थी.. कई बार प्रतीकों तक न पहुंच पाने के कारण.. फिर मास्टर साहब समझाते होंगे या गाइड में पढ़कर हम 'समझ' लेते थे... परंतु ये जो आज की कविता है, वह भी प्रतीकों या पृष्ठभूमि के कारण न समझ पाऊं तो लगता है कि हिंदी पढ़ना बहुत कुछ बाकी है अभी.. और पढ़ेंगे, फिर दोहराएंगे किताब; तब शायद और कविताएं समझ में आएं....

शुक्ल जी की अच्छी प्रशंसक मंडली है- इनके उपन्यासों की, इनकी कविताओं की और उस जादुई यथार्थवाद की.. मुझे कभी तो वो जादू मंत्रमुग्ध कर देता है, कभी यथार्थ अपनी पूरी भयावहता से नजर आता है.. लेकिन अक्सर ये टुकड़ों में होता है, अंशतः होता है.. पूरा कैनवास पकड़ने में मैं इनके उपन्यासों में भी असफल रहा और इस किताब में भी... शायद और कविताएं पढ़ने की जरूरत है.. पढ़ने से भी ज्यादा कवि के स्वयं के कवितापाठ सुनने की जरूरत है ताकि संदर्भ स्पष्ट हों या रचनाकार की दृष्टि तक मेरी दृष्टि पहुंच पाए...
(अपनी बात ज्यादा हो गयी.. लेकिन कैसे कहूँ कि रचयिता ने इतना मुश्किल लिखा कि पाठक तक पूरी बात पहुंची ही नहीं..)
Profile Image for Nuri.
64 reviews43 followers
January 10, 2020
तुम खड़ी क्यों हो

‘तुम खड़ी क्यों हो
बैठ जाओ।’

‘नहीं अब मैं चलूँगी।’
यह सुनते ही
जाने को कब से उद्धत यह पहाड़ है
जिसकी चोटी पर एक घर मंदिर है
और एक देवी स्त्री।
वह जा रही मूर्ति थी।

वह पत्थर की तरह कठोर नहीं थी।

उसके चले जाने के समय से
जाने को उद्धत यह पहाड़
किसी एक दिन से
उसके आने की प्रतीक्षा में
उद्धत पहाड़ है।

यहाँ तक आने की दूरी को

यहाँ तक आने की दूरी को
पारकर नहीं, समेट आया
छोड़कर नहीं, साथ लिये
लौटकर जाने, पीछे कुछ छूटा नहीं
एक कदम के लायक भी नहीं
वहाँ मेरा अनदेखा कुछ नहीं बचा
और यहाँ दर्शनार्थियों की भीड़ में शामिल।
इस भीड़ में उसके दिख जाने में रहना चाहता हूँ
उसके दिखने में अपने दिखने से आत्मसात।

मैं अलख देखना चाहता हूँ
उसके होने में अपने को भस्म कर डालने का
माथे पर प्रेम का भभूत लगाए

कि नहीं होने को
कि नहीं होने को
टकटकी बाँधकर देखता हूँ
आकाश में
चंद्रमा देखने के लिए
चंद्रमा के नहीं होने को।

कब से नहीं होने को
कब से टकटकी बाँधकर।

चले जाने के इस शून्य से
कभी लौटकर आ जाने के
तब तक के उस शून्य को।

साथ न होने के इस सत्य से
साथ हो जाने की उस कल्पना तक
उसके दिख जाने के खोये को
टकटकी बाँधकर ढूँढ़ता हूँ।

कि मेरे इस एकटक के पिंजड़े में
उसका नहीं दिखना
पंख फड़फड़ाता है
और पिंजड़े से निकलकर

उड़ता हुआ
उसी तरफ जाता है
जिस तरफ उसका दिखना उड़ता हुआ
ओझल होता है।

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
व्यक्ति को मैं नहीं जानता था
हताशा को जानता था
इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया
मैंने हाथ बढ़ाया
मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ
मुझे वह नहीं जानता था
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था
हम दोनों साथ चले
दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे
साथ चलने को जानते थे।
Profile Image for Shraddha Upadhyay.
13 reviews3 followers
October 13, 2020
मैं नहीं जानती कि कविता-संग्रह को कैसे पढ़ा जाता है। क्या पेज दर पेज हर कविता को शब्द-शब्द पढ़ना कविता को पढ़ लेना होता है? मैं यही करने की कोशिश कर रही हूँ। विनोद कुमार शुक्ल यूँ भी हमारी भाषा और व्याकरण की समझ को उलट-पुलट कर देते हैं, कविताओं को कितनी भी बार पढ़ो उनकी नवीनता ख़त्म होना शुरू नहीं होती। प्रवास, आदिवासी, खण्डहर, भूख जैसे कई विषयों पर वो एक बिलकुल नई संवेदनशीलता उढ़ेल देते हैं। आदिवासी होने पर उनका चिंतन, आदिवासी की संज्ञा को क्रिया के रूप में प्रयोग करना बहुत-बहुत दिलचस्प है। मैं इस किताब को अभी सालों और पढ़ सकती हूँ। भाषा के उनके प्रयोगों को देखते हुए मुझे हिंदी जानने का संतोष होता है कि किसी तरह मैं इस प्रयोग में शामिल हो पा रही हूँ। इतनी कविताएँ और अतिरिक्त एक शब्द (या शायद धवनि) भी नहीं।
Profile Image for Pallavi Shukla.
192 reviews3 followers
May 23, 2025

यह क़िताब मेरे लिए थोड़ी कठिन थी लेकिन मुझे पसंद आई। विनोद कुमार शुक्ल जी की कविताओं में जो कुछ भी है, वह उनके अनुभवों और भावनाओं का संग्रह है। उनकी कविताओं में जो लोक है, वह इस तरह जिया हुआ है कि जो कुछ भी व्यक्त नहीं किया गया है, वह वेदना के रूप में हैं।

विनोद कुमार शुक्ल जी कविता में शब्दों के साथ प्रयोग करने वाले नहीं हैं, बल्कि वे कविता के माध्यम से हमें सचेत करने वाले कवि हैं। वे घटनाओं को बहुत करीब से देखते हैं और अनुभव करते हैं, तभी वे उन्हें शब्दों में व्यक्त कर पाते हैं।

विनोद कुमार शुक्ल के इस संग्रह को अगर एक लाइन में परिभाषित करें, तो यह एक ऐसे कवि का संग्रह है जो अपने यथार्थ से निरंतर टकराता रहता है और यह चाहता है कि हम मनुष्य के रूप में अपनी गरिमा बनाए रखें, न केवल अपने लिए बल्कि पूरे जगत के लिए भी।
पढ़ने योग्य हैं यह क़िताब!❤️
Profile Image for Vipin Kumar.
35 reviews2 followers
Read
May 7, 2022
विनोद कुमार शुक्ल की कविताएं

अद्भुत अद्वितीय अवर्णनीय! इन कविताओं में कल्पनाशीलता की उच्च श्रेणी के साथ आपके आसपास की चीजों को अलग तरह से देखने का दृष्टिकोण है
Profile Image for Swapnil Arora.
40 reviews2 followers
October 20, 2024
"अतिरिक्त नहीं" विमोद कुमार शुक्ल जी द्वारा रचित एक बेहद सुंदर काव्य संग्रह है, जो दिल की गहराइयों को छूता है। इसे अवश्य पढ़ें।
Profile Image for Avikshit.
11 reviews8 followers
Read
March 22, 2025
अंधकार के अंतर्मन में
घुलती बू़ँद भर कविता है
और टिप टिप का प्रकाश

प्रकाश किसी दिशा से प्रकाशित नहीं उठता है
अंधेरे से उठता है
अंतर्मन के अंधेरे से
चमकता है अंतर्मन, यदा कदा.
Profile Image for Ashutosh Parauha.
23 reviews23 followers
June 14, 2019

"हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
व्यक्ति को मैं नहीं जानता था
हताशा को जानता था
इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया
मैंने हाथ बढ़ाया
मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ
मुझे वह नहीं जानता था
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था
हम दोनों साथ चले
दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे
साथ चलने को जानते थे।"


विनोद कुमार शुक्ल का अंदाज़ बिलकुल नया है ।इस संग्रह में कुछ कवितायेँ ऐसी थी जो मुझे मंत्रमुग्ध कर गयी । लेकिन कुछ ऐसी भी थीं जो थोड़ी ज्यादा ही abstract हैं और कई बार पढ़ने के बाद भी उनका अर्थ निकलना मुश्किल है । या शायद यह भी हो सकता है मेरा ज्ञान अभी इतना नहीं है अभी जो विनोद जी की को समझ सके।
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