इस किताब को मैंने
बचा बचा के पढ़ा
जैसे हर दिन एक कविता
किसी दिन कोई नई नहीं—
पिछले दिन की ही कविता, दोबारा
तिबारा, चौबारा
चौबारे पे
फूलों के बगल में
कमरे में, रसोई में,
चाय पे, खाने के साथ, मौन में।
हर जगह हर स्थिति में
हर कविता एक बढ़ता बच्चा है
जितनी बार पढ़ोगे उतने साल बढ़ जाएगा।
दादा जी से क़िस्से सुनने जैसी
आसपास होते पर रोने जैसी
कभी अपने अंदर के रंग पे ख़ुश होने जैसी
यह कविताएं
मेरे साथ मेरी रही ज़िन्दगी
रहेंगी...