लेखक संपूर्ण जीवन को अपनी रचना का विषय बनाता है, रचता है। ऐसे लेखक को फिर अपनी रचना का विषय बनाना एक विषेष प्रकार के अनुभव और संवेदनशीलता की अपेक्षा रखता है। श्रीमती कान्ता भारती ने अपने इस उपन्यास 'रेत की मछली' में' लेखकीय जीवन और उसके निकट परिवेश को मानवीय संदर्भो में रचने का प्रयास किया है। विदेशी साहित्यों मे इस प्रकार की कई औपन्यासिक कृतियाँ प्रसिद्ध हुई है; हिन्दी में यह अनुभव-क्षेत्र अभी नया है, और विशेष संभावनाओ से युक्त है। कान्ता की यह कथा-कृति अपने ब्यौरों में कही निर्मम है तो कहीं सहानुभूतिपूर्ण भी, और इस माने में जीवन के सही अनुपात, को साधती है। पाठक यहाँ रचना की पृष्ठभूमि को रचना के रूप में पाकर एक नये अनुभव-संसार में प्रवेश करता है, जहाँ उसके लिए बहुत-सी उपलब्धियाँ संभव हैं।
शिक्षा : प्रयाग विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में एम.ए., हिंदी से एम.ए. और कविवर सुमित्रानंदन पंत पर शोध कार्य कर पी-एच.डी. की उपाधि की।
गतिविधियाँ : देश विभाजन के बाद 1947 में परिवार के साथ इलाहबाद आयीं। यहाँ ‘कविवर सुमित्रानंदन पंत, इलाचंद्र जोशी, महादेवी वर्मा और प्रयाग के साहित्यकारों का सानिध्य मिला और साहित्यिक गतिविधियों से सक्रियता से जुडी।
आकाशवाणी और दूरदर्शन के महत्त्वपूर्ण पदो पर रहीं, और कई चर्चित धारावाहिक फिल्मों का निर्माण और लेखन किया। मीडिया विशेषज्ञ के रूप में कई देशों की यात्रा की।
इस किताब को पढ़ने के बाद सबसे पहला भाव जो मन में आया, वह था ग़ुस्सा उन लोगों के प्रति जिन्होंने इसे उबाऊ कहकर ख़ारिज कर दिया। मुझे समझ नहीं आता, कैसे कोई व्यक्ति किसी स्त्री की पीड़ा और उसके भीतर के संघर्ष में भी ‘रोमांच’ या ‘मनोरंजन’ ढूंढ़ सकता है?
मुझे यह नहीं मालूम कि रेत की मछली और गुनाहों का देवता कितनी हद तक सेमीऑटोबॉयोग्राफिकल हैं, लेकिन इतना ज़रूर समझ आया कि गुनाहों का देवता किताब मेरी आत्मा को क्यों नहीं छू सकी।
उसमें आदर्श थे, एक सतही नायकत्व था पर उसके पीछे कोई तीव्र, सचमुच का दर्द नहीं था। हाँ, धर्मवीर भारती की भाषा निस्संदेह सधी हुई और परिष्कृत है, लेकिन जो चुभन, जो अंदर तक उतर जाने वाली संवेदना कान्ता भारती की लेखनी में है? वह वहाँ नहीं मिलती।
कान्ता भारती की सबसे प्रभावशाली विशेषता यह है कि वे हर दृश्य को एक तरह की काव्यात्मक गहराई में ढाल देती हैं। उनके वाक्यों में ऐसा दर्द है जो शब्दों से ज़्यादा अनुभव में उतरता है। और जब पाठक यह जानता है कि यह कथा केवल कल्पना नहीं, एक स्त्री के जीवित अनुभवों का दस्तावेज़ है? तो वह भीतर तक हिल जाता है।
एक स्थान पर वे लिखती हैं — “शोभन फ़ादर पॉल के पास नितांत शिष्टता के साथ इस तरह खड़े थे जैसे गुनाहों की एक बहुत बड़ी बस्ती में एकमात्र देवता खड़ा हो।” यह पंक्ति पढ़ते ही मन जैसे रुक सा गया, और भीतर एक लंबी निःश्वास उतर आई।
मेरे लिए यह असंभव है कि कोई मुझे यह समझा सके कि गुनाहों का देवता, रेत की मछली से श्रेष्ठ है। चाहे कितने भी दलीलें/तर्क क्यों न दिए जाएँ, मैं उस मत को स्वीकार करने की स्थिति में नहीं रहूँगी।
आप ये किताब इसलिए मत पढ़िए कि एक और कहानी पढ़ने का मन हो गया है, बल्कि इसलिए पढ़िए कि एक पढ़ी हुई कहानी (गुनाहों के देवता) के दूसरे पक्ष को समझ सकें।
आरंभ में ही यह स्पष्ट हो जाता है कि इस कहानी का नायक ही खलनायक है — और इसकी नायिका? उस पात्र को नायिका कहना शायद उचित नहीं होगा। कितनी बार लगा कि कहूँ — किताबी नायिका ऐसी नहीं होती। वह पलटकर जवाब देती है, स्वतंत्र होती है, उसके कंधों पर आधुनिक युग की मशाल लेकर आगे बढ़ने की जिम्मेदारी होती है।
लेकिन इस कहानी की नायिका का हावभाव असल जीवन की आम स्त्री से कितना मेल खाता है!
अगर यह कहानी सिर्फ एक कहानी है, तो यह दुःखद है — बेहद कष्टकारक और अगर इसमें रत्ती भर भी सच्चाई है, तो यह पितृसत्ता द्वारा स्त्री समाज के प्रति किया गया एक गंभीर अपराध है।
कांता भारती की यह रचना धर्मवीर भारती के असली व्यक्तित्व को बयान करती है. I have hated Shobhan throughout the book, the character based on Dharmveer Bharti and the atrocities he committed on his first wife (the author). This novel needs more attention and praise than Gunahon ka Devta for all the right reasons.
मुझे पता नहीं की इस कहानी के कितने छोर काल्पनिक हैं और कितने नही, लेकिन जिस हद्द तक मुझे शोभन और मीनल के प्रति घिन्न और घृणा की अनुभूति हुई है उसे मैं चाह कर भी कभी शब्दों में व्यक्त तो नहीं ही कर पाऊँगी।
मुझे गुस्सा भी है इस बात का कि यह किताब इतनी प्रचलित क्यों नहीं है जितनी होनी चाहिए। प्यार भरी सीधी साधी कहानियाँ सभी को पसंद आती है, जिनमें यह तय होता है कि अंत में किसी ना किसी तरीके से मन को तृप्ति मिलेगी।
मगर इस कहानी का अंत भले कुछ और भी होता तो भी इसको पढ़ना उतना ही महत्वपूर्ण होता जितना अभी है। जिस तरह से कांता भर्ती जी ने इस कहानी की हर कड़ी को लिखा है वह किसी भी इंसान को झँझोड़कर रख सकता है, मुझे पता नहीं मैं खुदको इन सब से कैसे अलग कर पाऊँगी।
यूँ तो मेरे भीतर हमेशा से एक ग़ुस्सा सा रहा है, किन चीज़ों के लिए? पितृसत्ता और इन सभी संस्कारों और नियमों के लिए जो सिर्फ़ और सिर्फ़ औरतों के ऊपर लागू होती हैं, कोई मामूली गुस्सा नहीं है ये। यह गुस्सा मेरी ही तरह सभी औरतों के अंदर भी हैं, कु�� दबा दी गई, कुछ चुप करवा दी गई यह बोलकर की हमारे संस्कारों वाली औरतें किसीके ख़िलाफ़ नहीं बोलतीं। मैं समझती हूँ धिक्कार है ऐसे संस्कारों पर जो एक मनुष्य को उसके अधिकारों से अधीन करता है।
लिखने का तो मैं ख़ुद एक उपन्यास लिख डालू, लेकिन मन इतना भारी है की जो कुछ भी लिखा जा रहा है वो लिख रही हूँ। ये सब लिखने से पहले मैं कुछ दिन रुकना नहीं चाहती थी, रुककर देखने से कभी कुछ बदला ही कहाँ है?
बहुत दिनों से ये एक किताब सोशल मीडिया में बहुत प्रचलित हो रही है... अब पढ़ ली... . "रेत की मछली" पढ़ना एक तरह में अपने अंदर कुछ टूटने को महसूस करने जैसा था। शुरुआत में कहानी से सहानुभूति होती है, लेकिन जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, एक अजीब सा गुस्सा और बेचैनी मन में बैठने लगती है। पढ़ते-पढ़ते लगा जैसे आदर्श, विश्वास और रिश्तों की जो तस्वीर दिमाग में थी, वो धीरे-धीरे गिर रही हो। . कहानी की शुरुआत में जहाँ नायिका के लिए सहानुभूति महसूस होती है, वहीं आगे बढ़ते हुए कुछ घटनाएँ असलियत से दूर लगने लगती हैं। नायिका की लगातार चुप्पी कहीं न कहीं मन में गुस्सा भी भरती है। ऐसा लगता है जैसे यह सिर्फ एक साहित्यिक रचना नहीं, बल्कि अंदर की जमा हुई पीड़ा और गुस्से का विस्फोट है। मन में सवाल उठता है कि कोई स्त्री इतनी तकलीफ़ सहकर, दूसरी औरत की मौजूदगी को भी स्वीकार कैसे कर सकती है और फिर बस एक किताब लिखकर चुप क्यों रह जाती है? क्या चुप रहना भी संस्कार है? . फिर सोचती हूँ कि सच में कोई न कोई मजबूरी रहती होगी महिलाओं की भी जब वे ऐसे अबला बन कर चुप्पी साध लेती हैं। और फिर जब एक प्रतिष्ठित लेखक ऐसे कर्मों में लिप्त है तो समाज की लाज, परंपरा और स्त्रीत्व की रक्षा करती एक पत्नी जिसका जीवन घर की चार दिवारी में क़ैद है, वो कर भी क्या सकती थी? एक पक्ष ये भी है कि इस किताब को 1975 में रिपोर्ट किया गया था, यानि कि घटनाएं उससे भी कई पहले हो चुकी होंगी। क्या उस समय का भारतीय समाज भी इन घोषणाओं के लिए तैयार था? . कई बार लगा कि ये किताब सिर्फ एक कहानी नहीं, किसी के दिल का बोझ है, गुस्सा, पीड़ा, और टूटे भरोसे का एक सलीका-सा दस्तावेज़। धर्मवीर भारती एक बेहतरीन लेखक थे, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन जब आप किसी लेखक को उसके शब्दों से प्यार करते हैं, और फिर उसकी ज़िंदगी का ये चेहरा सामने आता है, तो एक हल्का-सा झटका ज़रूर लगता है। . और वो कंटीली बेल शुरुआत से ही उखाड़ कर फेंक क्यों नहीं दी? अपनी जड़ें मज़बूत करने का मौका कैसे दे दिया?🌻🌥️📚 . - आयशा
Ret Ki Machhli, written by Kanta Bharti, is a stark, psychologically intense novel that delves into the inner life of a woman trapped in the arid expectations of a patriarchal society. The title, which translates to “A Fish in the Sand,” becomes an aching metaphor — portraying a soul meant for emotional fluidity and freedom, stranded in a life that offers no nourishment, no escape.
The protagonist — a woman unnamed, voiceless in many ways — becomes the embodiment of psychological suffocation, bound not by visible chains but by the invisible norms of gender, duty, and silence. Her life unfolds in the domestic space, a space traditionally assigned to women, but Bharti reveals how this space becomes a psychic desert, eroding identity, desire, and the self.
Through deeply introspective narration, Bharti explores themes of emotional alienation, repressed sexuality, social invisibility, and mental stagnation. The woman’s internal world, rich with unspoken fears, quiet anger, and longing for connection, stands in sharp contrast to her outer life — mechanical, thankless, and unchanging. Her silence is not passivity; it is resistance, grief, and slow-burning awareness.
What makes this novel powerful from a psychological standpoint is its raw portrayal of the fragmentation of the self. The protagonist is not mentally “ill” in a clinical sense, but she is gradually disassociating from the version of herself that society demands. Her mind becomes a battleground between survival and authenticity.
Bharti writes with minimalism and restraint — making the novel feel like an echo, a whispered scream. Ret Ki Machhli doesn’t offer resolution, and that is its truth. It portrays the lived experience of countless women whose identities are buried under roles, whose feelings are never validated, and whose silences are misunderstood as acceptance.
Ultimately, this is not just a feminist novel — it is a psychological indictment of how societies quietly erase women by denying them emotional space. Kanta Bharti’s work remains a haunting reminder that not all prisons have bars — some are made of sand, and some, of silence.
दुख की उत्तरोत्तर व्याख्या करती ये किताब चरम पर जा पहुंचती है। प्रत्येक पृष्ठ के साथ दुख का एक स्तर बढ़ाती। मन अगर संयमित ना हो तो अवसाद में डाल सकने की क्षमता है इसमें। लेखकों के भोंडेपन को उजागर करती है, उनका मुखौटा नोचती है और इस हद तक ले जाती है कि घृणा हो जाए। वैचारिक थोथलेपन को उद्घाटित करती है और मानवीय पाशविकता की यथार्थता को मनुष्य का एकमात्र सत्य बताती है। किताब में लिखा अगर एकांश भी भारती जी के सम्बंध में सत्य है तो आपको भारती के सम्पूर्ण साहित्य पर उबकाई आ जाएगी। गुनाहों के देवता के अगर उपासक हैं तो दूर रहें। ये किताब आपके लिए ईशनिंदा के बराबर है।
This is a disturbing story about the breaking up of a marriage, that's told with vividly upsetting and graphic details. Although the central character aka. the narrator describing the occurrences gives you a feeling that a lot could have been done, and the ultimate destruction happened also because of her cowardice.
हुए कुछ रोज किसी मित्र ने एक फेसबुक लिंक भेजी। किसने भेजी ये तक याद नहीं। खोली तो एक लम्बा आलेख था – ‘गुनाहों का देवता’, धर्मवीर भारती के कालजयी उपन्यास की धज्जियाँ उड़ाता हुआ, चन्दर और उसके चरित्र की धज्जियाँ उड़ाता हुआ, चन्दर और सुधा की अमर प्रेमकथा की धज्जियाँ उड़ाता हुआ। आलेख में ‘गुनाहों का देवता’ के इतर एक अन्य उपन्यास का ज़िक्र था, जिसके साथ ‘गुनाहों का देवता’ की तुलना की गई थी। इस दूसरे उपन्यास को ‘गुनाहों के देवता’ के पाठकों के लिए पढ़ना यदि अनिवार्य नहीं तो अति आवश्यक तो जरूर कहा गया था। ये उपन्यास था – ‘रेत को मछली’।
रेत की मछली एक घिनोना उपन्यास है। इसे पढ़ते समय कितनी चीजों के लिए घिन आती है कहना मुश्किल है। ‘रेत की मछली’ धर्मवीर भारती की प्रथम पत्नी श्रीमती कान्ता भारती द्वारा रचित है। ‘गुनाहों का देवता’ के छब्बीस साल बाद सन् पचहत्तर में ‘रेत की मछली’ आया।
ये उपन्यास धीरे-धीरे आगे बढ़ता हुआ भयावह होता चला जाता है। उपन्यास में नायक है, नायिका है; उनके मध्य का स्नेह है, जिसे वो आजीवन पल्लवित करने की इच्छा रख रहे हैं; सामाजिक दुविधाएं हैं, जिसे नायिका का पिता विजातीय विवाह में अपनी असहमति के रूप में प्रकट कर रहा है। येन केन प्रकारेण विवाह सम्पन्न होता है। नायिका अपने पति और उसकी माँ के साथ उज्ज्वल और सुखद भविष्य की कल्पना के साथ ससुराल आती है। क्यारियाँ खोद कर सुंदर और सुगन्धित पुष्पों की पौदों को रोपती है। उन पुष्प वल्लरियों के मध्य एक जंगली बेल भी उग आती है, उगती चली जाती है, इतनी उग जाती है कि सारी वाटिका के फूलों को खा जाती है। ये बिम्ब भयानक था। ये जंगली लता नायक की मुँह बोली बहन है। वो जिससे नायक ने कभी राखी बंधाई। कहानी बढ़ती है और ऐसा मालूम होता है जैसे कोई विषैला जीव चमड़ी के नीचे रेंग रहा हो। आपको लगता है क्यों पढ़ रहे हो आप ये सब? किस लिए? कहानी कितनी तेजी में विषैली होती चली जाती है आपको मालूम तक नहीं चलता। नायक अपनी मुँह बोली बहन को भोगता है। न केवल भोगता है बल्कि उसके लिए बेहूदगी से भरी तर्कसंगतियाँ भी रखता है। कथानायक अपनी बीमार पत्नी की उपस्थिति में उसी कमरे में उस दूसरी स्त्री को भोगता है जिसे वो समाज में बहन कर रहा है। और वीभत्सता के अगले चरण पर बढ़कर वह अपनी पत्नी को इसमें सहर्ष सम्मिलित होने का आग्रह भी करता है। नायिका की उत्सवधर्मिता दिन प्रतिदिन मरती जा रही है। दिन प्रतिदिन वह मानसिक बीमारी और अवसाद के अंधकार में घिरती जा रही है। उसका हृदय कष्ट के, वेदना के उस रसातल में डूबता जा रहा है जहाँ से उसका लौटना असम्भव है। कथा यहीं अपनी नृशंसता पर नहीं रुकती। नायक आगे अपनी कथित बहन के साथ कई बार अपनी पत्नी की उपस्थिति में सहवास करता है और उसे ये देखने पर विवश करता है, वह अपनी पत्नी का यातना से लिप्त चेहरा देखकर मुस्कुराता है। उस मुस्कान की उपस्थिति को पढ़कर आपके समस्त स्नायुतंत्र में एक सिरहन दौड़ जाती है। नायक के लिए पत्नी और उसकी आने वाली सन्तान उस परस्त्री के सम्मुख गौण हो जाते हैं। नायक अपनी पत्नी को पीटता है, और यह क्रम निरतंरता की ओर चला जा रहा है। इससे भी संतुष्ट न होकर वह अपनी पत्नी को ये लिखने पर विवश करता है कि वो दुष्चरित्रा है, उसके अन्यत्र सम्बंध हैं। कथा में ये सब तब चलता है जब कथा का नायक विश्विद्यालय में प्राध्यापक है, समाज में बुध्दिजीवी के रूप में प्रतिष्ठित है, बहुचर्चित साहित्य का रचयिता है और समाज के प्रति बौद्धिक उत्तदायित्व पर बहस करने वाली गोष्ठियों का अध्यक्ष है।
करीबन सवा सौ पन्ने की ये किताब पढ़ते समय आप इसे बीस बार पटकते हैं। आखिरी के बीस पन्ने पढ़ते समय लगता है अभी एक कुल्हाड़ी आपके सर पर गिरेगी और सर फट जाएगा। इस कथा के नायक को नायक कहा जाना भी न्यायोचित है या नहीं ये तक विवाद मालूम होता है।
इसकी तुलना ‘गुनाहों का देवता’ से की गई है। मैं इससे बचना चाहता हूँ। आरोप है कि ‘गुनाहों का देवता’ पितृसत्ता की ध्वजवाहक है। चन्दर अपने आसपास उपस्थित प्रत्येक स्त्री को बस कामोत्तेजक तनाव देना चाहता है और वही करता है। क्लिष्ट शब्दों में भारी प्रतीत होने वाली चिकनी चुपड़ी बातें करता है। मैं इसमें विश्वास नहीं करना चाहता। मैं आगे बढ़कर विरोध भी करता हूँ। चन्दर को जब तक स्वयं मालूम चलता है कि वो किसी के प���रेम में तब तक वो महानता प्राप्त करने के लालच में त्याग नाम के उपकरण का उपकरण का प्रयोग कर उसे किसी ओर को स्वयं सौंप चुका है। कथा के अंत तक कोई सर्वाधिक त्रस्त मालूम होता है तो वो चन्दर ही है। आरोप ये भी है कि चन्दर को धर्मवीर भारती ने खुद के आधार पर रचा है वहीं ‘रेत की मछली’ उनकी भार्या कान्ता भारती ने अपने निजी वैवाहिक जीवन के ऊपर लिखा है। कथानायक का जन्मदिन क्रिसमस के दिन पड़ता है। गौरतलब है कि धर्मवीर भारती का जन्म भी इसी रोज है। यदि ऐसा है तो ये सचमुच भयानक है।
‘गुनाहों का देवता’ एक सच में कालजयी उपन्यास है। भाषागत उत्कृष्टता से कथा का प्रवाह सबकुछ उत्तम है। उसके चरित्र सुधा और चन्दर हिन्दी भाषियों के लिए परिचित हैं और जब तक हिन्दी भाषा और इसका साहित्य प्रासंगिक रहेगा तब तक ये चरित्र भी परिचित रहेंगे। ‘रेत की मछली’ भाषागत दृष्टि से ‘गुनाहों का देवता’ के सम्मुख कुछ नहीं है। परन्तु यदि ये उपन्यास दस फीसदी भी सत्यता पर आधारित है तो एक बात के निर्णय पर हमें खींच ले जा सकता है कि मानव मूल रूप से दोगलेपन से ग्रसित है। ये डॉक्टर भारती की समस्त विरासत पर एक जोरदार चांटा है।
‘रेत की मछली’ को किसी पूर्वप्रकाशित और बाहुचर्चित उपन्यास की व्याख्या मात्र से यदि मुक्त रखा जाए तो अपने आप में ये एक सीधा परंतु तीक्ष्ण उपन्यास है। सीधे संवाद, सरल बहाव, स्पष्ट कथानक। बिम्ब है तो बस एक, वो जंगली बेल जो सारी फुलवारी खा गई। हर बार उसके उल्लेख से आपका हृदय ऐंठने लगता है। ‘रेत की मछली’ एक ऐसा उपन्यास है जिसे आप किसी तरह निगल तो सकते हैं पर पचा नहीं सकते। ऐसे उपन्यास को पढ़ते और उनके ऊपर टिप्पणी करते समय, लिखते समय बस यही दिमाग में आता है कि क्या इसे किसी को पढ़ने के लिए भी कहा जा सकता है?!
This entire review has been hidden because of spoilers.
this author has a very interesting way with words, unfortunately she uses them to hurt me. quite literally an emotional & a complex read when i tell you, and on a side note [this is not an actual review, but just my 2 cents, as im busy w exam prep rn] while i was reading Gunaho ka Devta, i always sensed there was sumn fishy abt how Dharmveer bharti portrayed himself as chander (never liked that bast@rd), and now after finishing Ret Ki Machli, im 110% sure RKM is counter narrative to GKD, and every idea that book perpetuates, dharamvir bharti is not what he has shown to the entire world, and it breaks my heart how the ‘open ended tragedy’ of the protagonist directly corresponds/coincides w kanta bharti’s real life, ppl who think highly of GKD, they really need to read RKM to know the other side of the story.
If this book contains even 1% truth of what Kanta Bharti had to go through in her life while living with Dharamveer Bharti, I don’t think I can ever see him as a good human being or an accomplished writer, for that matter.
Gunahon Ke Devta is ruined for me. Forever. This book boils your blood, leaves you stunned, and makes you feel hollow by the end.
At first, it feels like a scandalous book, but once you begin to see what she has to go through, you understand the pain being portrayed.
By the end, you see the reality of the two-faced man and you’re just… ugh.
कुंतल जी का कैसा दुर्भाग्य, जिस व्यक्ति के लिए उन्होंने समाज से, स्वयं के परिवार से विद्रोह किया उसी व्यक्ति ने उन्हें इतनी कठोर यातनाएं दी। परन्तु उनकी जिजीविषा को नमन है, जो इतना कुछ सहने के बाद भी उठ खड़ी हुई अपने पैरों पर। कांता जी का लेखन बिना किसी रहस्यमई भाषा के स्पष्ट, साफ़ एवं सीधा है। अगर आपने धर्मवीर भारती जी की कृति गुनाहों के देवता को बड़े चाव से पढ़ा है, तो रेत की मछली अवश्य पढ़िए। आप पाएंगे, कि रेत की मछली पढ़ने के बाद कुछ तो अंदर टूट चुका है।
What Manto wrote as stories, Kuntal lived it !!! What morality is ! And for whom it is ? And can we ,again a question asked many a time , separate the art from the artist ? It seems now all the recent readings I did are making sense now and pointing towards the same question about morality ! Sann a play by Piyush Mishra , the vegetarian, manto ki kahaniyan aur ret ki machli !
Last year I read a novel by Dharamveer Bharti and I remember being so furious at the male protagonist. There’s a scene where he slaps the woman he claims to love — and I had to literally close the book and walk away. I kept thinking, how is this love? How are we still romanticizing men who hurt women and call it passion?
And then yesterday, in stolen office hours (yes, I risked it 😭), I finished "Ret Ki Machali" by Kanta Bharti — and I have not been the same since.
If the "Gunahon ka Devta" book made me angry, this one left me speechless.
Knowing that both these stories are said to be drawn from the authors’ real lives — even if the names are changed — makes it hit even harder. Because this isn’t just fiction. This is lived suffocation.
In "Ret Ki Machali", Sobhan — Kuntal’s husband — is having an extramarital affair with Meenal, a girl he shamelessly introduces as “like his sister.” The audacity. But it gets worse. He forces Kuntal to stay in the same room while he is intimate with Meenal. I felt physically uncomfortable reading those pages. The humiliation. The psychological cruelty. And then the assault.
How does someone survive that?
Kuntal’s life felt like being buried alive in sand — fitting for a title that translates to “fish of the sand.” A creature that cannot breathe, cannot move, cannot escape. Every page felt heavy. There was no dramatic rebellion, no cinematic revenge — just a slow, suffocating existence inside a marriage that had rotted from the inside.
I wasn’t crying. I wasn’t even angry this time. I just felt hollow.
Books like this don’t entertain you. They expose things. They force you to sit with discomfort. They make you question how many Kuntals exist around us — smiling in family photos, carrying trays of tea, swallowing their pain because society told them endurance is virtue.
This wasn’t an easy read. It wasn’t even a “likable” read.
But it was powerful.
And I think some stories are not meant to be enjoyed — they’re meant to be witnessed.
मैंने हाल ही में रेत की मछली पढ़ी, लेकिन ईमानदारी से कहूँ तो यह समझ पाना मेरे लिए कठिन रहा कि इस पुस्तक की इतनी अधिक प्रशंसा क्यों की जाती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि साहित्यिक और भाषागत स्तर पर यह एक सशक्त कृति है—भाषा पर लेखक की पकड़, प्रतीकों का प्रयोग और भावनात्मक बनावट प्रशंसनीय है। किंतु जब कथानक और चरित्र-विश्वसनीयता की बात आती है, तो यह पुस्तक मुझे अत्यंत फीकी और असंतुलित लगी। कुंतल का चरित्र सबसे अधिक खटकता है। जो स्त्री विवाह से पहले अपने माता-पिता से विद्रोह करने का साहस रखती है, वही विवाह के बाद अपने पति के सामने पूरी तरह मौन और आत्मसमर्पित हो जाती है, अपने साथ हो रहे किसी भी अन्याय के प्रति आवाज नहीं उठाती है, यहाँ तक की सामाजिक दुर्व्यवहार को भी सहज रूप से स्वीकार करती है—यह परिवर्तन न केवल अविश्वसनीय लगता है, बल्कि लगातार पाठक को विचलित भी करता है। पढ़ते समय मेरे मन में बार-बार यह प्रश्न उठता रहा कि कोई व्यक्ति इतनी दीन-हीन और निष्क्रिय अवस्था को कैसे स्वीकार कर सकता है। शायद इसी कारण मैं इस पुस्तक के कथानक से जुड़ नहीं पाया और धीरे-धीरे ऊबने लगा। इसके अतिरिक्त, पुस्तक में चित्रित भाई-बहन का संबंध भी मुझे 1962 के सामाजिक यथार्थ से मेल खाता हुआ प्रतीत नहीं हुआ। वह संबंध न तो सामाजिक संरचना के अनुरूप लगता है और न ही उस समय की मानसिकता के। यह प्रस्तुति अधिक कल्पनात्मक और कम यथार्थपरक जान पड़ती है। यदि यह कृति कांता भारती द्वारा धर्मवीर भारती के संदर्भ में लिखी गई मानी जाए, तो यह असंगति और भी स्पष्ट हो जाती है। वास्तविक कांता भारती का व्यक्तित्व इतना असहाय और विवश प्रतीत नहीं होता जितना कि उपन्यास की कुंतल। यहाँ चरित्र और वास्तविकता के बीच का फासला पाठक को स्वीकार करने में कठिनाई होती है। कुल मिलाकर, रेत की मछली मेरे लिए एक ऐसी पुस्तक रही जिसकी ख्याति उसके कथ्य से कहीं अधिक भारी है। भाषा और शैली के स्तर पर यह कृति भले ही महत्वपूर्ण हो, लेकिन कथानक, चरित्रों की विश्वसनीयता और सामाजिक संदर्भों की दृष्टि से यह मुझे संतुष्ट नहीं कर सकी।
The writer of the book has moulded the character of Shobhan on Dharmaveer Bharti who as reported by her ex wife and author of this book once called himself as Indian Sartre. He should have added that he rivalled him as much in sexual partners as in literary popularity.
रेत की मछली पढ़ते हुए मन बार-बार दो भावों के बीच झूलता है—दुख और ग़ुस्सा। यह ऐसी किताब है जो आपको सहज नहीं रहने देती। इसकी भाषा बहुत ज़्यादा साहित्यिक या सजावटी नहीं है, बल्कि किसी स्त्री की निजी डायरी-नुमा स्वीकारोक्ति जैसी सीधी, बेझिझक और कई जगह असहज कर देने वाली है। इस अर्थ में यह किताब कई जगह Anne Frank’s Diary की याद दिलाती है—जहाँ लेखन की सबसे बड़ी ताक़त उसकी साहित्यिक कारीगरी नहीं, बल्कि उसकी निर्मम ईमानदारी है। यहाँ भी शब्द इसलिए असर करते हैं क्योंकि वे गढ़े हुए नहीं, जिए हुए लगते हैं। और इसी ईमानदारी के साथ यह किताब एक और असहज सवाल खड़ा करती है—क्या हम किसी रचना से उसके रचनाकार को अलग कर सकते हैं? जब पीड़ा को शब्द देने वाला ही उसी पीड़ा का कारण हो, तो उस रचना को किस निगाह से पढ़ा जाए? रेत की मछली इस टकराव को किसी सिद्धांत की तरह नहीं, बल्कि जिए हुए अनुभव की तरह सामने रखती है, और पाठक को मजबूर करती है कि वह “रचना बनाम रचनाकार” की बहस को किसी सुरक्षित दूरी से नहीं, बल्कि नैतिक असहजता के भीतर खड़े होकर देखे।
एक सामान्य रूप से सजग पाठक के लिए यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है कि उँगली किस दिशा में उठाई जा रही है। संकेत इतने साफ़ हैं कि कहानी किसी कल्पना से ज़्यादा एक बयान की तरह सामने आती है। यही इस किताब की सबसे बड़ी शक्ति है—और एक तरह से उसकी सीमा भी, ताक़त इसलिए कि अनुभव की सच्चाई बिना किसी पर्दे के पाठक तक पहुँचती है, और कमजोरी इसलिए कि चूँकि पूरी कथा एक ही दृष्टिकोण से कही गई है, इसलिए पात्र अक्सर या तो पूरी तरह काले दिखते हैं या पूरी तरह सफ़ेद—बीच के धूसर रंग और जीवन की जटिलताएँ बहुत कम जगह पाती हैं।
कथा में कई जगह ऐसा लगता है जैसे जीवन की कुछ घटनाएँ बहुत तेज़ी से फ्रेम बदलती हुई आगे बढ़ जाती हों—मानो पाठक को साँस लेने का मौका दिए बिना कहानी एक पड़ाव से सीधे दूसरे पड़ाव पर पहुँचा दिया गया हो। कुछ प्रसंग ऐसे हैं जहाँ लेखिका अगर थोड़ा रुककर उस समय की सामाजिक परिस्थितियों, मानसिक दबावों और पात्रों के भीतर चल रही टूटन को और विस्तार से उकेरतीं, तो वे दृश्य कहीं ज़्यादा गहरे और ज़्यादा देर तक चुभने वाले बन सकते थे। अभी कई मोड़ ऐसे लगते हैं जो भावनात्मक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होने के बावजूद पूरी तरह खुल नहीं पाते—वे छूते तो हैं, लेकिन भीतर तक उतरने से पहले ही कथा आ��े बढ़ जाती है।
ईमानदारी से कहूँ तो कुछ ज़्यादा स्पष्ट और तीखे दृश्य पढ़ते हुए मेरे मन में भी एक अजीब-सी शंका उठी—क्या यह सब सचमुच वैसा ही हुआ होगा? कहीं न कहीं एक अविश्वसनीयता-सी महसूस हुई। और शायद यह मेरी अपनी सीमा है—एक पुरुष दृष्टि से देखने की आदत, और उस स्त्री-पीड़ा की गहराई को पूरी तरह न समझ पाने की असमर्थता। संभव है जो मुझे अतिरंजना लगे, वह किसी और के लिए बिल्कुल जिया हुआ यथार्थ हो।
मैं यह भी जानता हूँ कि मैं इस किताब को उसकी साहित्यिक गुणवत्ता से ज़्यादा उसकी ‘सच्चाई’ के तराज़ू पर तौल रहा हूँ। लेकिन रेत की मछली शायद चाहती भी यही है कि उसे सिर्फ़ एक रचना की तरह नहीं, एक गवाही की तरह पढ़ा जाए। और यह गवाही गुनाहों का देवता और धर्मवीर भारती के संदर्भ के बिना अधूरी है। सच कहूँ तो, जिसने गुनाहों का देवता पढ़ी है, उसके लिए रेत की मछली लगभग अनिवार्य पाठ होनी चाहिए—क्योंकि यह उसी दुनिया को एक बिल्कुल दूसरी, और कहीं ज़्यादा असहज, खिड़की से दिखाती है।
आख़िर में, इस किताब की सबसे बड़ी ताक़त वही है जो यह पाठक के भीतर पैदा करती है—गुस्सा, उदासी, बेचैनी, और एक लम्बी चुप्पी। और शायद इसी बेचैनी के साथ यह सवाल भी छोड़ जाती है—क्या हम किसी महान रचना से प्रेम करते हुए उसके रचनाकार के नैतिक पक्ष से मुँह मोड़ सकते हैं? रेत की मछली आपको इस सवाल से बचकर निकलने नहीं देती। रेत की मछली कोई “आराम से पढ़ी जाने वाली” किताब नहीं है। यह एक ज़रूरी, चुभती हुई, और परेशान करने वाली पुस्तक है—ख़ासकर उनके लिए, जो गुनाहों का देवता की दुनिया को अब सिर्फ़ एक ही नज़रिए से नहीं देखना चाहते।
"Separate the art from the artist" is one of the most popular ideas in the world of art. It means an artist's personal life should be separated from their work and we shouldn't judge the art through the artist. But after reading Ret Ki Machhli, I find that idea much harder to accept.
I've admired Dharamveer Bharati for a long time. From Gunahon Ka Devta to Andha Yug and Suraj Ka Satvan Ghoda, his writing has had a huge impact on me. In Gunahon Ka Devta, Chandar is presented as an almost ideal man principled, intelligent, and emotionally complex. Everything seems to make sense until you hear the other side of the story.
If Gunahon Ka Devta is Bharati's version, then Ret Ki Machhli feels like Kanta Bharati's. Every story has two sides. Dharamveer saw himself as Chandar Kanta writes as Kuntal and presents Bharati as Shobhan. Suddenly the same events look very different. What once felt like idealism can now be seen as self justification, and what was left unsaid becomes the most important part of the conversation.
More than taking sides, the book leaves me standing at a crossroads. Even after knowing all this, you can't unsee Dharamveer Bharati's literary greatness. But can you still read his work in exactly the same way as before? I don't think so. Great art survives criticism, but it doesn't remain untouched by it.
And even if we leave biography aside and read Ret Ki Machhli as fiction, the experiences of Kuntal are difficult to ignore. It wasn't a simple love story or even a normal arranged marriage. The psychological burden of being trapped in a relationship that hurts you, even when the door is open to leave, becomes the book's most disturbing and powerful aspect.
What struck me most is that Kuntal is not fighting against a villain. She is fighting against an image an image of an intellectual, a respected writer, and an "ideal" man. That makes her suffering even more tragic. The book constantly asks whether a person's public greatness can hide private failures, and whether admiration for art sometimes blinds us to the reality of the artist behind it.
Now I'd like to talk about the writing itself. I know Ret Ki Machhli is mostly discussed for its painful subject matter and its connection to Dharamveer Bharati, but I think Kanta Bharati's writing deserves far more credit than it gets.
One thing that impressed me is how much trust she puts in the reader. A lot of Indian literature has a habit of explaining every emotion, every symbol, and every idea as if the reader won't understand otherwise. Ret Ki Machhli doesn't do that. Kanta leaves space for interpretation. She writes through images, metaphors, fragments of memory, and emotional impressions rather than constantly spelling things out.
The writing often feels surreal, poetic, and even experimental. It breaks conventional narrative rules without drawing attention to itself. There are moments where reality, memory, and emotion blend together in a way that feels genuinely artistic rather than merely decorative.
What I appreciated most is that the book feels written by someone deeply engaged with art, literature, and culture not someone trying to sound intellectual, but someone whose sensitivity naturally comes through the prose. Even when I disagreed with parts of the book, I was constantly impressed by how intelligently it was written.
I just finished reading Ret ki Machli, and I’ve been sitting with a lot of mixed thoughts – especially because many people say you’ll find answers to Gunaho ke Devta in this book. Personally, my experience was a bit different.
Starting with Ret ki Machli, I sometimes found the narration slightly confusing. The story moves back and forth between past and present without always making the shift obvious, and a few times it took me a page or two to understand where we were in the timeline. There were also characters who appeared briefly and then disappeared just as quickly. For example, the chapter with the neighbours Raman and his Bhabhi – especially the disturbing parts about his violence and him following her to the university – felt like it might become important to the main plot. But after that, they were hardly mentioned again, which left me wondering why that thread was introduced at all.
That said, the story itself is engaging. But as for the idea that Ret ki Machli gives answers to Gunaho ke Devta, I didn’t really feel that in a direct way. Even while reading Gunaho ke Devta, I was never fully convinced that Chander truly loved Sudha. If he did, it’s hard for me to understand why he hurt her the way he did. In fact, both Chander and Shobhan came across to me as characters driven more by desire and lust than by the kind of pure, ideal love the story seems to suggest.
When I compare the two novels, Ret ki Machli feels much more real and emotionally grounded. Gunaho ke Devta reads like a deeply emotional but still idealized story – and you can strongly feel that it’s written from a man’s perspective. Sudha is portrayed almost like a divine, self-sacrificing figure, and we don’t get to see much of her inner emotional struggle. In contrast, in Ret ki Machli, Kuntal’s pain feels raw and immediate. Her loneliness, hurt, and emotional suffocation come through so strongly that it genuinely stays with you.
I also read a bit about the authors’ real lives, and it made the two books feel even more interesting to look at together. From what I gathered, Dharamvir Bharti had been a student of Kanta Bharti’s father, and their love and later marriage – that’s the plot of Gunaho ke Devta. Later, during Kanta Bharti’s pregnancy, one of Dharamvir Bharti’s students, Pushpa, helped take care of her – and eventually he developed a relationship with Pushpa and married her – that’s the plot of Ret ki Machli. Because of this, I ended up feeling that the two novels don’t exactly answer each other, but rather feel like two very different perspectives – one shaped by romantic idealism, and the other by lived experience and emotional truth.
न जाने कितनी तारीफों और चर्चाओं ने ये किताब पढ़ने पर मजबूर तो किया पर इसे पढ़ने को तैयार नहीं किया। इतने सालों में शायद ही किसी उपन्यास ने मन में इतनी उथल पुथल मचाई हो। उपन्यास यूं तो काल्पनिक ही होता है पर ‘रेत की मछली’ एक–एक शब्द से वास्तविकता झलकती है जैसे लेखिका ने अपना सर्वस्व लिख दिया है। इतनी कातरता और इतनी सच्चाई की कई घटनाओं को पढ़ते हुए आंसू बरबस ही आ गए और उपन्यास समाप्त करते करते जैसे अंतर्मन भी आंखों के साथ भीग गया। कहानी का नायक ‘शोभन’ एक साहित्यकार है, कहते हैं कि एक भावुक व्यक्ति ही अच्छा साहित्यकार बनता है पर जब व्यक्तिगत जीवन की आती है तो वही संवेदनशील व्यक्ति कैसे इस क़दर पशु बन जाता है कि हिंसा पर उतर आए? और नायिका ‘कुंतल’, प्रेम में हारी हुई स्त्री जिसे टूटन की सीमा तक प्रेम में मिली हुई सारी यातना स्वीकार्य है और अंत में ये यातना शारीरिक हिंसा तक भी पहुंच जाती है। ये हिंसा जितना शरीर को चोट नहीं देती उससे कहीं ज्यादा मन को तोड़ देती है, ये वार व्यक्तित्व पर होता है। कुंतल तो इस सीमा तक सहनशील है कि वो इस अवसाद में जाकर भी प्रेम का बंधन तोड़ नहीं पाती। क्या प्रेम किसी को इतना मजबूर कर सकता है? क्या व्यक्ति अपने सामने अब कुछ होते हुए भी उसे सिर्फ इसलिए अनदेखा कर देता है कि वो पूर्व के सुखद क्षणों के मोह में अब तक है? पूरे उपन्यास में एक प्रतीक बार बार आता है, लहलहाते गुलाबों के बीच एक जहरीली कंटीली लता जो धीरे–धीरे सारे पौधों को समाप्त कर देती है। ये लता है ‘मीनल’ जो शोभन और कुंतल के बीच आकर उनके रिश्ते को खोखला कर कुंतल से सब कुछ छीन ले जाती है। पर कोई भी तीसरा व्यक्ति एक विवाह में तब तक अपनी जगह नहीं बना सकता जब तक उसे विवाह में बंधे दो व्यक्तियों में से किसी एक का साथ न मिले। उसे शोभन से वही साथ मिला। और शोभन ने उसके लिए कुंतल को चरित्रहीन तक घोषित कर दिया। एक बार गया व्यक्ति वापस वैसा ही नहीं आता, फिर भी क्यों उस व्यक्ति और प्रेम के विचारों को हम अपने इतने निकट रखते हैं कि वो हमें बार बार तकलीफ पहुंचा सके। क्या सब कुछ छोड़ना इतना मुश्किल होता है? हर एक पुस्तक आपको थोड़ा बदलती है पर इस उपन्यास ने शायद मन में कुछ तोड़ दिया है, उसे वापस जोड़ पाना शायद अब संभव नहीं है।
This entire review has been hidden because of spoilers.
रेत की मछली। यह किताब एक उपन्यास मात्र नहीं है। यह एक साहित्यिक प्रयोग सा है जिसमें कल्पना से अधिक सच दिखाई पड़ता है। हर किस्से में, हर प्रसंग में एक सच्चाई दिखाई देती है।
जब ये किताब मैंने उठाई तब तक धर्मवीर भारती की दो किताबें गुनाहों का देवता(उपन्यास) और सूरज का सातवां घोड़ा(कहानी संग्रह) पढ़ चुका था, तो एक साहित्यकार के तौर पर धर्मवीर भारती काफ़ी अच्छे लगे थे। साथ ही, रेत की मछली के बारे में जो सुना था उसके बाद इसे पढ़ने की पहली शर्त जो खुद से रखी वो यह कि साहित्यकार/लेखक की कला और लेखक का चरित्र बिलकुल अलग मान कर पढूंगा बिना किसी पूर्वाग्रह के या बिना किसी नारीवाद के। चूंकि साथ ही यह कि दूसरे पक्ष की तरफ से कुछ सफ़ाई मौजूद नहीं है तो उनके बारे में पुख्ता राय बनाना सही नहीं होगी।
रेत की मछली – पहले तो ये शीर्षक, पता नहीं कितना सोच कर लिखा गया, पर कहानी के हर हिस्से में एकदम सटीक मालूम पड़ता है। पूरी कहानी है एक मछली जिसे जल से निकाल कर रेत पर डाल दिया गया हो।
एक उपन्यास के तौर पर रेत की मछली उतनी ज्यादा आकर्षक नहीं लगेगी क्योंकि इसमें वो उतार चढ़ाव नहीं हैं, कोई सुखद अंत नहीं है। पर जब आपको ये पता हो कि ये एक कहानी नहीं बल्कि एक खुद के लिए लिखी डायरी सी है तो आपके लिए पूरी किताब का अर्थ बदल जाएगा। किताब के मुख्य किरदार हैं कुंतल(कांता भारती, धर्मवीर भारती की पहली पत्नी) और शोभन(धर्मवीर भारती)। यह पूरी किताब आपके लिए चुप्पी से भरी होगी। मन में गुस्सा होगा, दोनों मुख्य किरदारों के लिए, एक पर सहने के लिए, एक पर करने के लिए। कुंतल अपने परिवार के खिलाफ जाकर शोभन से विवाह करती है और फिर हर प्रसंग के साथ परत दर परत उनके रिश्ते की सिलाई उखड़ती जाती है। शोभन का चरित्र पन्ने दर पन्ने खुलता जाता है और भाव विह्वल कुंतल की सहन शक्ति क्षीण होती जाती है। इस किताब के अंत तक आपको यह महसूस होगा कि ये घटनाएं कितनी मानसिक तौर पर कितनी ज्यादा कष्टप्रद रही होंगी कि 1975 जब यह किताब प्रकाशित हुई तो असल घटनाओं से समयांतर लगभग 10-15 वर्ष का हो चुका था। अगर ये मान भी लिया जाए कि ये बस एकतरफा ब्यौरा है तब भी जो कुछ बीता वह भी अमानवीय प्रतीत होगा और अंत में आप किताब के उपशीर्षक से सहमत होंगे – "जहां दर्ज हैं देवता के गुनाह"।
रेत की मछली" पढ़ना केवल एक पुस्तक का पाठ नहीं, बल्कि एक स्त्री के भीतर की चुप्पी, घुटन और अंततः फूट पड़ने वाली आवाज़ को सुनना है। यह किसी कथा का नहीं, एक जिए गए जीवन के ज़ख़्मों का दस्तावेज़ है।
कहानी एक ऐसी लड़की की है जो प्रेम के लिए अपने परिवार की मर्ज़ी के खिलाफ जाकर शादी करती है, लेकिन यह प्रेम जल्द ही धोखे, उपेक्षा और हिंसा की अंधी गलियों में खो जाता है। धीरे-धीरे पाठक की सहानुभूति गुस्से में बदलने लगती है—न सिर्फ़ नायक की क्रूरता पर, बल्कि नायिका की लगातार चुप्पी पर भी। बार-बार मन में सवाल उठता है: आखिर क्यों? क्यों वह औरत सब सहती रही? शायद यह उस दौर की विवशता थी। 1970 के दशक में एक औरत का अपने वैवाहिक जीवन पर लिखना ही एक साहसिक कदम था। और जब उसका पति समाज में एक प्रतिष्ठित लेखक की हैसियत रखता हो, तो इस ‘सच’ को लिखना अपने आप में विद्रोह जैसा है। कांता भारती ने केवल पुरुष की बेवफाई एवं क्रूरता को नहीं दिखाया, बल्कि उस पितृसत्तात्मक ढांचे को उकेरा है जिसमें स्त्रियाँ ही स्त्रियों की दुश्मन बनती हैं, और माँ जैसी सशक्त छवि भी चुपचाप तमाशा देखती रह जाती है।
पढ़ते हुए जब इस पंक्ति पर पहुंची "शोभन फ़ादर पॉल के पास नितांत शिष्टता के साथ इस तरह खड़े थे जैसे गुनाहों की एक बहुत बड़ी बस्ती में एकमात्र देवता खड़ा हो।” तो मन कुछ देर के लिए थम गया। गहरी सांस लेकर किताब बंद की, और कुछ देर टहलने के बाद ही किताब को दुबारा पढ़ने का मन हुआ।
इस किताब ने "गुनाहों का देवता" की आदर्शवादी छवि को पूरी तरह तोड़ दिया। कई बार लेखक की निजी ज़िंदगी को उसके लेखन से अलग करना संभव नहीं हो पाता। "रेत की मछली" पढ़ने के बाद "गुनाहों का देवता" एक आत्म-औचित्य की कोशिश जैसा प्रतीत होता है—जैसे चंदर के ज़रिए लेखक अपने सभी पापों को क्षमा कराना चाहते हों, अपने आपको निर्दोष साबित करना चाहते हों। "गुनाहों का देवता" अब भी एक उत्कृष्ट रचना है, इसमें कोई संदेह नहीं, लेकिन "रेत की मछली" पढ़ने के बाद उसकी प्रामाणिकता वैसी ही महसूस होती है, जैसे किसी सुंदर संदूक को खोलने पर उसमें केवल मकड़ी के जाले और सन्नाटा मिले।