कैसी आश्चर्यजनक वास्तविकता है कि केवल चंद नज्मों और चंद गजलों का शायर होने पर भी 'फैज़' की शायरी एक बकायदा स्कूल-ऑफ-थॉट का दर्जा रखती है और नई पीढ़ी का कोई उर्दू शायर अपनी छाती पर हाथ रखकर इस बात का दावा नहीं कर सकता कि वह किसी न किसी रूप में 'फैज़' से प्रभावित नहीं हुआ। रूप और रस, प्रेम और राजनीति, कला और विचार का जैसा सराहनीय समन्वय 'फैज़' अहमद फैज़ ने प्रस्तुत किया है और प्राचीन परम्पराओं पर नवीन परंपराओं का महल उसारा है, निस्संदेह वह उसी का हिस्सा है और आधुनिक उर्दू शायरी उनकी इस देन से और निखरी है।
1911 में सियालकोट में जन्मे इस शायर में बगावत और अंतरराष्ट्रीयता के भी स्वर हैं। उनकी शायरी में अफ्रीका और लेबनान, बेरूत के संघर्ष के लिए भी जगह है। इन्हीं कारणों से फैज़ को जो शोहरत मिली वह बढ़ती चली गई और वो पांचवे से नौवें दशक में अपने इंतेकाल तक उर्दू शायरी के आसमान में छाए रहे।
मता-ऐ-लौहो कलम छिन गई तो क्या गम है कि खून-ऐ-दिल में डूबो ली है उंगलियां मैंने...