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Laprek Trilogy #2
Ishq mein maati sona
“शहर के इश्क से इतर गाँव के इश्क को ‘शब्द के फ्रेम’ में ढालने में दिक्कतें आई ! दिल्ली के कॉफ़ी हाउस, रेस्तराँ, सिनेमा हॉल या फिर पार्कों से दूर गाँव की कहानी साफ़ अलग है ! गाँव में प्रेम तो है लेकिन उसके संग और भी बहुत कुछ हो रहा है ! उस तरह की उन्मुक्तता नहीं है जो दिल्ली में दिख जाती है ! यहाँ बंदिशें, नफरत, लड़ाई, जमीन को लेकर संघर्ष, राजनीति और कई तरह की रुकावटों के बीह्क पनपते प्रेम को हमने देखा और उसे बस लिख दिया ! “
88 pages, Paperback
First published December 5, 2015
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Community Reviews
Displaying 1 - 12 of 12 reviews
December 1, 2019
A bit more interesting than Ishq Koi News Nahi.
March 26, 2023
Very rarely does a book or stories from it let you travel places that you have never explored or meet people who are so different yet very similar to you.
'Ishq Mein Maati Sona' by Girindra Nath Jha is one such book that takes you from the hustle and bustle of Delhi and lands you in Purnia, Bihar and it's serenity and calmness.
The stories shared in this book are bite-sized and snackable and draw a lot from the first instalment of this trilogy 'Ishq Mein Sheher Hona' by Ravish Kumar. The way the author has described life in rural Bihar and the lives and culture of the people so vividly allows you to paint a beautiful mental picture with each story.
Overall, I really enjoyed reading this book and if you're looking to explore some stories in Hindi then this book is for you!
'Ishq Mein Maati Sona' by Girindra Nath Jha is one such book that takes you from the hustle and bustle of Delhi and lands you in Purnia, Bihar and it's serenity and calmness.
The stories shared in this book are bite-sized and snackable and draw a lot from the first instalment of this trilogy 'Ishq Mein Sheher Hona' by Ravish Kumar. The way the author has described life in rural Bihar and the lives and culture of the people so vividly allows you to paint a beautiful mental picture with each story.
Overall, I really enjoyed reading this book and if you're looking to explore some stories in Hindi then this book is for you!
February 2, 2018
Its tough to find a book which actually speaks your mind. The writer does an impressive work to keep continuing the legacy of Lapreks (romantic nano-fiction), though restricting himself to more limited themes than his predecessor Ravish. The village theme with farms is special in this edition intermingled with metropolitan theme, unlike Ravish who sticked only with the later with diversified sub-themes. UPSC junta can relate well to the Batra Cinema which figure prominently. Its a remarkable second edition to the Ishq series and surely I had the best time reading it.
March 7, 2020
दिल से पढ़ें तो दिल तक पहुंचेगी। बेहद खूबसूरत।
September 2, 2021
इश्क़ में होकर लप्रेक पढ़ना यदि चांद है तो इश्क को खोकर पढ़ना अमावस हो गया। सोचता हूं तुमको याद भी है क्या, लप्रेक का मतलब? खैर चंद सितारे लेखक के नाम कर, अब आज्ञा लेता हूं। विदा।
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January 3, 2026good
July 30, 2024
Exceptional, Delhi se Mohabbat ho gayi yeh book padhke. Imagining the girl I wanted to be with this book really feels like my own future story.
April 16, 2016
“लप्रेक” युवा प्रवासियों और महानगरीय स्वप्नरत युवाओं में लोकप्रिय साधारण साहित्य है जिसमे उबाऊ साहित्यिक हिंदी पंडिताऊपन नहीं बल्कि प्रेम का नया नजरिया है| लप्रेक श्रृंखला की दूसरी पुस्तक मेरे हाथ में है – “इश्क़ में माटी सोना”| यह रवीश कुमार के लप्रेक “इश्क़ में शहर होना” से भिन्न है और अलग पाठ का आग्रह रखती है| दोनों लप्रेक में विक्रम नायक अपने रेखाचित्रों के सशक्त परन्तु नवीन कथापाठ के साथ उपस्तिथ हैं|
गिरीन्द्रनाथ कॉफ़ी के झाग में जिन्दगी खोजने की कथा कहते हैं, गिरीन्द्रनाथ जिन्दगी की कथा को जोतते हुए कहते हैं| गिरीन्द्रनाथ कहीं भी रेणु नहीं हुए हैं मगर रेणु का रूपक उनके समानांतर चलता है| गिरीन्द्रनाथ रवीश भी नहीं हुए है मगर रवीश की शैली से अलग समानांतर चलते हैं| अगर आप रेणु और रवीश के लिए गिरीन्द्रनाथ को पढ़ते हैं तो आप ख़ुद से न्याय कर पाते| गिरीन्द्रनाथ चकना और दिल्ली के भरम जीते तोड़ते और जीते हैं|
गिरीन्द्रनाथ अपने लप्रेक में छूटे हुए गाँव चनका के साथ दिल्ली में जीते हुए अपनी प्रेम यात्रा में गाँव को दिल्ली के साथ जीने चले जाते हैं| गिरीन्द्रनाथ अपने अनुभव के प्रेम की गाथा कह रहे हैं, यह भोगा हुआ यथार्थ है| उनके यहाँ प्रेम संबल की तरह खड़ा है, उनका मेरुदंड है, साथ ही उलाहना और सहजीवन है| परन्तु गिरीन्द्रनाथ के लप्रेक में प्रेम ही नहीं है, प्रेम के बहाने बहुत कुछ है|
लप्रेक में विक्रम नायक सशक्त और समानांतर कथा कहते हैं| वह गिरीन्द्रनाथ के कथन से अधिक पाठ को समझते हैं और रचते हैं| विक्रम केवल पूरक नहीं हैं बल्कि अपनी समानांतर गाथा चित्रित करते हैं| आप गिरीन्द्रनाथ को पढ़ कर जानते हैं कि नायिका आधुनिक और स्वतंत्र है परन्तु आप विक्रम नायक के रेखाचित्रों के माध्यम से ही पुष्टि पाते हैं कि गिरीन्द्रनाथ की नायिका प्रायः भारतीय परिधान पहनती है| बहुत से विवरण हैं जहाँ विक्रम नायक लप्रेक के पूरक हैं परन्तु वह कई स्थान पर स्वयं के रचनाकार को उभरने देते हैं| विक्रम के चित्र अपनी स्वयं की कथा कहते जाते हैं – उनमें गंभीरता, व्यंग, कटाक्ष है|
पृष्ठ 3 पर विक्रम जब सपनों की पोटली से उड़ते हुए सपनों को किताब में सहेज कर रखते हैं तो वो पूरक हैं या समानांतर, कहना कठिन है| पृष्ठ 6, 12, 13, 49, 80 जैसे कई पृष्ठों पर विक्रम और गिरीन्द्र को साथ साथ और अलग अलग पढ़ा – समझा जा सकता है| कहीं कहीं विक्रम आगे बढ़कर तंज करते हैं, (जैसे पृष्ठ 21, 56, 70)| विक्रम लेखक को शब्द देते है (जैसे पृष्ठ 80, 81)|
कुल मिला कर यह पुस्तक गिरीन्द्रनाथ के लिए माटी बन जाने के प्रक्रिया है, वो माटी जो सोना उगलती है|
गिरीन्द्रनाथ कॉफ़ी के झाग में जिन्दगी खोजने की कथा कहते हैं, गिरीन्द्रनाथ जिन्दगी की कथा को जोतते हुए कहते हैं| गिरीन्द्रनाथ कहीं भी रेणु नहीं हुए हैं मगर रेणु का रूपक उनके समानांतर चलता है| गिरीन्द्रनाथ रवीश भी नहीं हुए है मगर रवीश की शैली से अलग समानांतर चलते हैं| अगर आप रेणु और रवीश के लिए गिरीन्द्रनाथ को पढ़ते हैं तो आप ख़ुद से न्याय कर पाते| गिरीन्द्रनाथ चकना और दिल्ली के भरम जीते तोड़ते और जीते हैं|
गिरीन्द्रनाथ अपने लप्रेक में छूटे हुए गाँव चनका के साथ दिल्ली में जीते हुए अपनी प्रेम यात्रा में गाँव को दिल्ली के साथ जीने चले जाते हैं| गिरीन्द्रनाथ अपने अनुभव के प्रेम की गाथा कह रहे हैं, यह भोगा हुआ यथार्थ है| उनके यहाँ प्रेम संबल की तरह खड़ा है, उनका मेरुदंड है, साथ ही उलाहना और सहजीवन है| परन्तु गिरीन्द्रनाथ के लप्रेक में प्रेम ही नहीं है, प्रेम के बहाने बहुत कुछ है|
लप्रेक में विक्रम नायक सशक्त और समानांतर कथा कहते हैं| वह गिरीन्द्रनाथ के कथन से अधिक पाठ को समझते हैं और रचते हैं| विक्रम केवल पूरक नहीं हैं बल्कि अपनी समानांतर गाथा चित्रित करते हैं| आप गिरीन्द्रनाथ को पढ़ कर जानते हैं कि नायिका आधुनिक और स्वतंत्र है परन्तु आप विक्रम नायक के रेखाचित्रों के माध्यम से ही पुष्टि पाते हैं कि गिरीन्द्रनाथ की नायिका प्रायः भारतीय परिधान पहनती है| बहुत से विवरण हैं जहाँ विक्रम नायक लप्रेक के पूरक हैं परन्तु वह कई स्थान पर स्वयं के रचनाकार को उभरने देते हैं| विक्रम के चित्र अपनी स्वयं की कथा कहते जाते हैं – उनमें गंभीरता, व्यंग, कटाक्ष है|
पृष्ठ 3 पर विक्रम जब सपनों की पोटली से उड़ते हुए सपनों को किताब में सहेज कर रखते हैं तो वो पूरक हैं या समानांतर, कहना कठिन है| पृष्ठ 6, 12, 13, 49, 80 जैसे कई पृष्ठों पर विक्रम और गिरीन्द्र को साथ साथ और अलग अलग पढ़ा – समझा जा सकता है| कहीं कहीं विक्रम आगे बढ़कर तंज करते हैं, (जैसे पृष्ठ 21, 56, 70)| विक्रम लेखक को शब्द देते है (जैसे पृष्ठ 80, 81)|
कुल मिला कर यह पुस्तक गिरीन्द्रनाथ के लिए माटी बन जाने के प्रक्रिया है, वो माटी जो सोना उगलती है|
September 2, 2016
लप्रेक यानि लघु प्रेम कथा, छोटी और मजेदार कहानी लिखने का एक नया अंदाज़। कुछ लप्रेक को पढ़कर मन खिल जाता है, जैसे नाचने का मन करे। लप्रेक मन को एकदम आनंदित और खुश कर देती है। कोई लप्रेक खूब हँसाता है तो कोई सोचने को मजबूर करता है। किसी को पढ़कर मुस्कान खुद व् खुद आ जाती है तो कभी गुस्सा।लप्रेक वाली बात जिसके भी मन की उपज है उसको दिल से धन्यवाद तो जरूर कहूंगा।
लप्रेक जगत की पहली किताब रवीश कुमार ने लिखी। रवीशजी जाने माने पत्रकार है। उन्होंने 'इश्क़ में शहर होना' में पूरी दिल्ली का दर्शन कराया। और उनका लिखा हर एक लप्रेक लाजवाब है। जो उस किताब को एक बार पढ़ ले। वो उसे फिर पढ़ता है और पहली बार की तरह ही मजे लेता, कहीं उससे भी ज्यादा। हर लप्रेक के अंत वाली पंक्ति में जो रविश जी ने लिखा है वो तो गज़ब का है।
मतलब उनकी ये किताब किसी मास्टरपीस से कम नहीं है।
लप्रेक की दूसरी किताब लिखी गई गिरिन्द्रझा के द्वारा। वो इसमें दिल्ली से लेकर गांव तक का सैर कराते हैं और उनका हर लप्रेक दमदार है। कुछ लप्रेक तो गिरीन्द्रजी ने रवीशजी से भी अच्छा लिखा है। पर कहीं कहीं ये थोड़ा बोर करती है। लेकिन ये भी एक प्रसंसनीय किताब है। इस किताब में लप्रेक का जो देहाती संस्करण देखने को मिलता है। वो कदम का पेड़, खेत और उन सब के बीच उपजी प्रेम कहानियां।
और लप्रेक की तीसरी किताब लिखी है, विनीत कुमार ने।
विनीत कुमार मिडिया-विश्लेषक के रूप में प्रसिद्ध हैं। विनीत कुमार भी दिल्ली की कहानी ही बताये हैं। विनितजी कहते हैं कि दिल्ली उनकी गर्लफ्रेंड जैसी है। और जैसा उन्होंने दिल्ली को देखा-जिया है उसी अनुसार लप्रेक लिखे हैं। या ऐसे कहें की 'इश्क़ कोई न्यूज़ नहीं' कुछ ख्वाहिशों का वर्चुअल संस्करण है। इन्होंने लप्रेक में नई चीजें लेने की कोशिश की है। और इन्टरनेट की भाषा का भी इस्तेमाल बड़ा गज़ब तरीके से किया है। इनका हर लप्रेक कुछ अलग और कुछ नई कहानी बताता है। 'इश्क़ कोई न्यूज़ नहीं' सबसे नया है तो कुछ नयापन दिखता है। कुछ लप्रेक तो दिल को छू जाती है। हाँ एक और बात ये है कि विनित कुमार, गिरिन्द्रझा और रविश कुमार का प्रयास वाकई सफल रहा है। और तीनों ने बहुत अच्छा लिखा है।
लप्रेक जगत की पहली किताब रवीश कुमार ने लिखी। रवीशजी जाने माने पत्रकार है। उन्होंने 'इश्क़ में शहर होना' में पूरी दिल्ली का दर्शन कराया। और उनका लिखा हर एक लप्रेक लाजवाब है। जो उस किताब को एक बार पढ़ ले। वो उसे फिर पढ़ता है और पहली बार की तरह ही मजे लेता, कहीं उससे भी ज्यादा। हर लप्रेक के अंत वाली पंक्ति में जो रविश जी ने लिखा है वो तो गज़ब का है।
मतलब उनकी ये किताब किसी मास्टरपीस से कम नहीं है।
लप्रेक की दूसरी किताब लिखी गई गिरिन्द्रझा के द्वारा। वो इसमें दिल्ली से लेकर गांव तक का सैर कराते हैं और उनका हर लप्रेक दमदार है। कुछ लप्रेक तो गिरीन्द्रजी ने रवीशजी से भी अच्छा लिखा है। पर कहीं कहीं ये थोड़ा बोर करती है। लेकिन ये भी एक प्रसंसनीय किताब है। इस किताब में लप्रेक का जो देहाती संस्करण देखने को मिलता है। वो कदम का पेड़, खेत और उन सब के बीच उपजी प्रेम कहानियां।
और लप्रेक की तीसरी किताब लिखी है, विनीत कुमार ने।
विनीत कुमार मिडिया-विश्लेषक के रूप में प्रसिद्ध हैं। विनीत कुमार भी दिल्ली की कहानी ही बताये हैं। विनितजी कहते हैं कि दिल्ली उनकी गर्लफ्रेंड जैसी है। और जैसा उन्होंने दिल्ली को देखा-जिया है उसी अनुसार लप्रेक लिखे हैं। या ऐसे कहें की 'इश्क़ कोई न्यूज़ नहीं' कुछ ख्वाहिशों का वर्चुअल संस्करण है। इन्होंने लप्रेक में नई चीजें लेने की कोशिश की है। और इन्टरनेट की भाषा का भी इस्तेमाल बड़ा गज़ब तरीके से किया है। इनका हर लप्रेक कुछ अलग और कुछ नई कहानी बताता है। 'इश्क़ कोई न्यूज़ नहीं' सबसे नया है तो कुछ नयापन दिखता है। कुछ लप्रेक तो दिल को छू जाती है। हाँ एक और बात ये है कि विनित कुमार, गिरिन्द्रझा और रविश कुमार का प्रयास वाकई सफल रहा है। और तीनों ने बहुत अच्छा लिखा है।
December 31, 2015
Beauty in simplicity. Reading this book was like living the love filled life of Ashish and Sneha the protagonists of the book. Especially the third and fourth section of the book set in the backdrop of a village is pure pleasure to read. It's like revisiting the linguistic marvels of Phaneeshwar Nath Renu.
August 9, 2019
If you ever read Hindi in school and want to start reading Hindi novels, then this book won't be a bad choice at all. Its writing is simple, its stories are short and its reading experience is just beautiful.
May 11, 2019
Illustrations in the book are good...stories are just ok.
Displaying 1 - 12 of 12 reviews












