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Laprek Trilogy #3

Ishq Koi News Nahin

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104 pages, Paperback

Published January 1, 2016

6 people are currently reading
65 people want to read

About the author

Vineet Kumar

106 books3 followers

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Community Reviews

5 stars
12 (21%)
4 stars
10 (18%)
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22 (40%)
2 stars
7 (12%)
1 star
4 (7%)
Displaying 1 - 8 of 8 reviews
Profile Image for Anupma.
173 reviews
November 28, 2025
पड़नी इसलिए शुरू करी के कहीं हिंदी ना भूल जाए, पर काफ़ी नास्टैल्जिया मिला इन कहानियों में। काफ़ी कुछ बदल गया है और बहुत कुछ बिल्कुल नहीं।
Profile Image for Alka.
383 reviews29 followers
November 20, 2016
several small stories, more like instances...common elements of Delhi, news room, man and woman. One could say romance too, not love. interesting to read this genre, my first time. I wouldn't be too keen on it though, makes me wait for more.
Profile Image for Anand Utsav.
11 reviews
February 2, 2018
I honestly expected more form the book, being third in the Ishq series of Lapreks. But the writer prefers long prose which can't be nano fiction per se. Completes the troika and by now I find myself totally into Lapreks.
Profile Image for Nikhil Talwar.
221 reviews7 followers
February 11, 2018
I just loved the book. These kind of books keeps me entertaining all the time. The cover page is also very beautiful. I hope, someday next book in this series will publish.
Profile Image for Akriti.
11 reviews4 followers
January 27, 2020
Shabdon ke jaal me achha fasaya. Patro ke naam anokhe hain. Aur kitaab hai, koi news to nahi, ki breaking ho.
Profile Image for Aishwarya Mohan Gahrana.
28 reviews3 followers
April 16, 2016
तीसरा लप्रेक “इश्क़ कोई न्यूज़ नहीं” सामने है| यह पुस्तक रवीश कुमार के लप्रेक “इश्क़ में शहर होना” और गिरीन्द्रनाथ झा के “इश्क़ में माटी सोना” से कई मायनों में भिन्न है|

अगर मैं विक्रम नायक के शब्द उधार लूँ, तो यह परिपक्व नादानियों की कहानियां हैं| इन कहानियों में विनीत कुमार की स्त्री – पुरुष सम्बन्ध और प्रेम सम्बन्ध के परिपक्व समझ और उनके अन्तरंग विवरण से उनका साम्य उजागर होता है| अधिकतर कहानियों में महिला पात्र स्पष्टतः मुखर हैं| यह कहानियां प्रेम की उस बदलती इबारत की कहानियां है जिसमें स्त्री सजीव, बुद्धिमान, बुद्धिजीवी और सुस्पष्ट है| यहाँ स्त्री समाज के सभी सरोकारों के साथ समान तल पर खड़ी है| पुरुष पात्रों में नए बदलते समीकरणों के प्रति एक लाचारगी, बेपरवाही और नादानी भी झलक जाती है| विनीत कुमार के लप्रेक हल्के – फुल्के होते – होते गंभीर हैं और अपने संवादों के कारण दूर तक मार करते हैं| विनीत कुमार का लप्रेक केवल डिजिटल रोमांस नहीं है बल्कि खुदरा प्यार की थोक खबर है, इसमें उस इक्क की बात है जो मरता हैं| विनीत कुमार इस न मरते इश्क़ को मारते – मारते जीने और जीते जाने की लघुकथा है|

विनीत कुमार उस युवा वर्ग से हैं जो जानता – समझता है, “काफ़ी हाउस में पैसे किसी के भी लगें, कलेजा अपना ही कटता है”| विनीत कुमार का इश्क़ के ब्रेकअप की मौजूदगी में अंकुरित होता और अपनी सभी शर्तों – समर्पणों – और समझदारी में फलता – फूलता है| कहानियाँ अपनी लघुता में सम्पूर्ण हैं और उनके संवाद ज़ुबान पर चढ़ जाते हैं| दो एक संवाद यहाँ प्रस्तुत हैं:

“ब्रेकअप के बाद रिश्तों – यादों को दफ़नाने के लिए अलग से कब्र नहीं खोदने पड़ते”

“जिस शख्स को लोकतंत्र के बेसिक कायदे से प्यार नहीं वो प्यार के भीतर के लोकतंत्र को जिन्दा रख पायेगा?”

“लाइफ में स्ट्रगल के बदले स्टेटस आ जाए तो किसी एक के एक्साइटमेंट को मरना ही होता है”

“उम्र तो मेरी ढल गई न, शौक तो उसी उम्र में ठिठका रहा”

लप्रेक में इश्क़ के बाद सबसे महत्वपूर्ण है, चित्रांकन – विक्रम नायक द्वारा अंकित चित्र कहानियाँ| तीसरे लप्रेक में विक्रम नायक और विनीत कुमार के बीच भाव पूरी भावना के साथ व्यक्त हुए हैं| विक्रम कहानियों को पूरी निष्ठा के साथ पकड़ पाए हैं| लप्रेक में पहली बार मुखपृष्ठ पर इश्क़ अपनी शिद्दत के साथ इसी पुस्तक में आया है| पृष्ठ VIII पर विक्रम अपनी इस रचना की प्रेम – प्रस्तावना एक छोटे से चित्र से रचते हैं| अधिकतर पृष्ठों पर चित्र कहनियों के साथ साम्य रखते हुए अपनी कहानी स्पष्ट और एक कदम आगे बढ़ कर कहते हैं| पृष्ठ 7, 13, 15, 54, 57, 65, 74, आदि पर मेरी कुछ पसंदीदा चित्र कहानियाँ हैं, इसके अलावा भी अनेक बखूबी से चित्रित लप्रेक मौजूद हैं|

“इश्क़ कोई न्यूज़ नहीं” में इश्क़ के बहुत से नमूने हैं, वह वाला भी जिससे आप आजकल में मिले थे|
Profile Image for Shubham Kumar.
32 reviews13 followers
June 1, 2017
लप्रेक यानि लघु प्रेम कथा, छोटी और मजेदार कहानी लिखने का एक नया अंदाज़। कुछ लप्रेक को पढ़कर मन खिल जाता है, जैसे नाचने का मन करे। लप्रेक मन को एकदम आनंदित और खुश कर देती है। कोई लप्रेक खूब हँसाता है तो कोई सोचने को मजबूर करता है। किसी को पढ़कर मुस्कान खुद व् खुद आ जाती है तो कभी गुस्सा।लप्रेक वाली बात जिसके भी मन की उपज है उसको दिल से धन्यवाद तो जरूर कहूंगा।

लप्रेक जगत की पहली किताब रवीश कुमार ने लिखी। रवीशजी जाने माने पत्रकार है। उन्होंने 'इश्क़ में शहर होना' में पूरी दिल्ली का दर्शन कराया। और उनका लिखा हर एक लप्रेक लाजवाब है। जो उस किताब को एक बार पढ़ ले। वो उसे फिर पढ़ता है और पहली बार की तरह ही मजे लेता, कहीं उससे भी ज्यादा। हर लप्रेक के अंत वाली पंक्ति में जो रविश जी ने लिखा है वो तो गज़ब का है।
मतलब उनकी ये किताब किसी मास्टरपीस से कम नहीं है।

लप्रेक की दूसरी किताब लिखी गई गिरिन्द्रझा के द्वारा। वो इसमें दिल्ली से लेकर गांव तक का सैर कराते हैं और उनका हर लप्रेक दमदार है। कुछ लप्रेक तो गिरीन्द्रजी ने रवीशजी से भी अच्छा लिखा है। पर कहीं कहीं ये थोड़ा बोर करती है। लेकिन ये भी एक प्रसंसनीय किताब है। इस किताब में लप्रेक का जो देहाती संस्करण देखने को मिलता है। वो कदम का पेड़, खेत और उन सब के बीच उपजी प्रेम कहानियां।

और लप्रेक की तीसरी किताब लिखी है, विनीत कुमार ने।
विनीत कुमार मिडिया-विश्लेषक के रूप में प्रसिद्ध हैं। विनीत कुमार भी दिल्ली की कहानी ही बताये हैं। विनितजी कहते हैं कि दिल्ली उनकी गर्लफ्रेंड जैसी है। और जैसा उन्होंने दिल्ली को देखा-जिया है उसी अनुसार लप्रेक लिखे हैं। या ऐसे कहें की 'इश्क़ कोई न्यूज़ नहीं' कुछ ख्वाहिशों का वर्चुअल संस्करण है। इन्होंने लप्रेक में नई चीजें लेने की कोशिश की है। और इन्टरनेट की भाषा का भी इस्तेमाल बड़ा गज़ब तरीके से किया है। इनका हर लप्रेक कुछ अलग और कुछ नई कहानी बताता है। 'इश्क़ कोई न्यूज़ नहीं' सबसे नया है तो कुछ नयापन दिखता है। कुछ लप्रेक तो दिल को छू जाती है। हाँ एक और बात ये है कि विनित कुमार, गिरिन्द्रझा और रविश कुमार का प्रयास वाकई सफल रहा है। और तीनों ने बहुत अच्छा लिखा है। और विक्रम नायक को तीनों किताबों का सह-लेखक कह सकते हैं। जिनकी हर चित्र दमदार है और कहानी में जान फुक देती है, आपको बार-बार देखने को मजबूर करती है।
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