हरिशंकर परसाई के व्यंग्य को श्रेष्ठतम इसलिए कहा जाता है कि उनका उददेश्य कभी पाठक को हँसाना भी नहीं रहा ! न उन्होंने हवाई कहानियां बनीं, न ही तथ्यहीन विद्रूप का सहारा लिया ! अपने दौर की राजनितिक उठापठक को भी वे उतनी ही जिम्मेदारी और नजदीकी से देखते थे जैसे साहित्यकार होने के नाते आदमी के चरित्र को ! यही वजह है कि समाचार-पत्रों में उनके स्तंभों को भी उतने ही भरोसे के साथ, बहैसियत एक राजनितिक टिप्पणी पढ़ा जाता था जितने उम्मीद के साथ उनके अन्य व्यग्य-निबंधो को ! इस पुस्तक में उनके चर्चित स्तम्भ 'सुनो भई साधो' में प्रकाशित 1983-84 के दौर की टिप्पणियां शामिल हैं ! यह वह दौर था जब देश खालिस्तानी आतंकवाद से जूझ रहा था ! ये टिप्पणियां उस पुरे दौर पर एक अलग कोण से प्रकाश डालती हैं, साथ ही अन्य कई राजनितिक और सामाजिक घटनाओं का उल्लेख भी इनमें होता है ! जहीर है खास परसाई-अंदाज में ! मसलन, 21 नवम्बर, 83 को प्रकाशित 'चर्बी, गंगाजल और एकात्मता यज्ञ' शीर्षक लेख की ये पंक्तियाँ ! "काइयां सांप्रदायिक राजनेता जानते हैं कि इस देश का मूढ़ आदमी न अर्थनीति समझता, न योजना, न विज्ञान, न तकनीक, न विदेश नीति ! वह समझता है गौमाता, गौहत्या, चर्बी, गंगाजल, यज्ञ ! वह मध्ययुग में जीता है और आधुनिक लोकतंत्र में आधुनिक कार्यकर्म पर वोट देता है ! इस असंख्य मूढ़ मध्ययुगीन जान पर राज करना है तो इसे आधुनिक मत होने दो !"
Harishankar Parsai (हरिशंकर परसाई) was one of the greatest hindi satire writer. Despite holding a MA degree in English, he never wrote in this language. Started his career as a teacher, he later quit it to become a full time writer and started a literature magazine "Vasudha"(it was later closed because of financial difficulties).
He was famous for his blunt and pinching style of writing which included allegorical as well as realist approach. He was funny enough to make you laugh but serious enough to prick your conscience. There would be hardly any dimension of life left which has not appeared in his satires. He received Sahitya Academy Award(biggest literature award in India) for his book "Viklaang Sraddha ka Daur". He has penned down some novels also.
यह पूरी किताब 1984 के लेखों का संकलन है,और उस समय की राजनीति के ही इर्दगिर्द लिखे गये हैं,कुछ लेख सामाजिक समस्याओं पर भी इमानदारी से कटाक्ष करतें हैं मगर उनकी संख्या बहुत कम है,99% सभी लेखों मे सारी समस्या की जड़ चौधरी चरण,स्वामी ,अटल बिहारी ,अकालियों, वामपंथियों,को बनाया गया है,और कांग्रेस की कमियों पर परसाई जी पसर गये हैं जबकि सरकार में कांग्रेस है,हर समस्या और कमी के लिए सभी लेखों में इन्हीं व्यक्तियों को दोषी ठहृराना बोर कर दिया और जमा नहीं, वहीं परसाई जी की सदाचार की ताबीज ने हंसाया और चिंतन को प्रेरित भी किया, हो सकता मैं 1984 और 2017 की तुलना कर रहा हूं,क्योंकि तब भाजपा की छवि सांप्रदायिक रही हो लेकिन,सरकार तो कांग्रेस की थी न