हरिशंकर परसाई के लिए व्यंग्य साध्य नहीं, साधन था ! यही बात उनको साधारण व्यंग्यकारों से अलग करती है ! पाठक को हँसाना, उसका मनोरंजन करना उनका मकसद नहीं था ! उनका मकसद उसे बदलना था ! और यह काम समाज-सत्य पर प्रमाणिक पकड़, सच्ची सहानुभूति और स्पष्ट विश्व-दृष्टि के बिना संभव नहीं हो सकता ! खास तौर पर अगर आपका माध्यम व्यंग्य जैसी विधा हो ! हरिशंकर परसाई के यहाँ ये सब खूबियाँ मिलती हैं ! उनकी दृष्टि की तीक्ष्णता और वैचारिक स्पष्टता उनको व्यंग्य-साहित्य का नहीं विचार-साहित्य का पुरोधा बनाती है ! तुलसीदास चन्दन घिसैं के आलेखों का केंद्रीय स्वर मुख्यतः सत्ता और संस्कृति के सम्बन्ध हैं ! इसमें हिंदी साहित्य का समाज और सत्ता प्रतिष्ठानों से उसके संबंधों के समीकरण बार-बार सामने आते हैं ! पाक्षिक 'सारिका' में 84-85 के दौरान लिखे गए इन निबंधों में परसाई जी ने उस दुर्लभ लेखकीय साहस का परिचय दिया है, जो न अपने समकालीनों को नाराज करने से हिचकता है और न अपने पूर्वजों से ठिठोली करने से जिसे कोई चीमड़ नैतिकता रोकती है ! गौरतलब यह कि इन आलेखों को पढ़ते हुए हमें बिलकुल यह नहीं लगता कि इन्हें आज से कोई तीन दशक पहले लिखा गया था ! हम आज भी वैसे ही हैं और आज भी हमें एक परसाई की जरूरत है जो चुटकियों से ही सही पर हमारी खाल को मोटा होने से रोकता रहे !
Harishankar Parsai (हरिशंकर परसाई) was one of the greatest hindi satire writer. Despite holding a MA degree in English, he never wrote in this language. Started his career as a teacher, he later quit it to become a full time writer and started a literature magazine "Vasudha"(it was later closed because of financial difficulties).
He was famous for his blunt and pinching style of writing which included allegorical as well as realist approach. He was funny enough to make you laugh but serious enough to prick your conscience. There would be hardly any dimension of life left which has not appeared in his satires. He received Sahitya Academy Award(biggest literature award in India) for his book "Viklaang Sraddha ka Daur". He has penned down some novels also.
परसाई जी की पुस्तकों की सफलता उनकी सार्थकता में है. लगभग 3 दशक पहले लिखे गए व्यंग्य आज भी सटीक चोट कर रहे हैं और करते रहेंगे क्यूंकि ये व्यंग्य बाण किसी व्यक्ति विशेष की तरफ नहीं छोड़े गए थे, इनका लक्ष्य था मनुष्य की अतार्किकता और जब तक तर्क का साम्राज्य स्थापित नहीं हो जाता तब तक ये पुस्तक अपनी चमक नहीं खोएगी.
परसाई जी जिस बेबाकी और शैली में लिखते हैं, उससे उनके कलम द्वारा छोड़ा गया तीर सीधे निशाने के केंद्र बिंदु पर लगता है। यही कारण है कि व्यंग लेखन में परसाई जी का नाम सर्वोपरि लिया जाता है।
किसी कवि नें लिखा है कि "चित्रकुट के घाट पर भइ सन्तन की भीड़। तुलसीदास चन्दन घिसे तिलक देत रघुबीर।।"
परसाई जी इस दोहे को पढ़ के प्रश्न उठाते हैं कि संतन की भीड़? संतन की भीड़ नहीं होती। अगर भीड़ थी तो उसमें दो तिहाई तो लुच्चन होंगें। वे लुच्चन रघुवीर से तिलक करवा समाज में घूमते होंगें कि देखो मुझे तो रघुवीर नें तिलक किया है, और तुलसीदास शाम तक उसी घाट पर चंदन ही घिसते रहे होंगें।
इसी विचार को आज के संदर्भ में जोड़कर परसाई जी आगे बताते हैं कि कैसे आजकल नेता तिलक लगा समाज में भक्त बने घूमते हैं और मजदूर वर्ग शाम तक उन्हें तिलक लगाने के लिए चंदन ही घिसता रहता है।
ऐसे ही परसाई जी तमाम विषयों पर बड़ी दृढ़ता से अपना मत रखते हैं और इतने रोचक तरीके से लिखते हैं कि बात में वजन भी महसूस होता है और एक हल्की मुस्कान भी बनी रहती है।
परसाई की कलम में जादू है। कलम का ये कारीगर संस्थागत रूप ले चुके अनैतिक मानदंडों को उजागर करता है; जहां एक और लेखक का चुटीला व्यंग्य हमें हंसा रहा होता है, वहीं अंदर ही अंदर हम सोचते है; हमारी सोच प्रखर और सटीक होती हैं, हम बेहतर समझ सकने योग्य हो रहे होते हैं।