'दर्रा दर्रा हिमालय' एक परिवार की हिमालय पर घुमक्कड़ी का वृत्तान्त है ! ऐसा परिवार जो फुरसत के क्षणों में विदेशों को सैर के बजाय बर्फ ढंके इन पहाड़ों को वरीयता देता है ! इंदौर के अजय सोडानी को हिमालय की सर्द, मनोहारी और जानलेवा वादियों से गहरा अनुराग है ! काल्पनिक से लगनेवाले सौन्दर्यशाली पहाड़ों पर सपरिवार चढ़ाई और बर्फ के गगनचुम्बी शिखरों को दर्रा-दर्रा महसूस करने के दौरान प्रकृति के मनोरम स्पर्श से भीगे तन-मन कई बार मौत के मुकाबिल भी रहे, लेकिन जिंदगी के पन्ने पर हौसले की स्याही से साहस की गाथा रचने वाले मौत की परवाह कहाँ करते ! जनश्रुतियों और पौराणिक ग्रंथो में चर्चित स्थलों और मार्गों की सत्यता को परखने, हिमालय और वहां के जनजीवन के विलुप्तप्राय सौन्दर्य को निहारने-समझने की उत्कंठा में करीब बीस हजार फीट की ऊंचाई वाले कालिंदी खाल पास को लांघते हुए भी मौत का भय बर्फ की तरह पिघलता रहा ! हिमालय की घाटियों में विचरती वायु में जाने ऐसा क्या था कि अजय बार-बार वहां लौटे और हर बार हिमालय की दी हुई एक नई चुनौती को स्वीकार किया ! 'दर्रा दर्रा हिमालय' अपनी राष्ट्रिय धरोहरों और प्रतीकों के प्रति अनुरक्ति वाले मानस की साहसिक यायावरी की गाथा तो कहती ही है, साथ ही रोज-ब-रोज बढती प्रदूषण की समस्या और पर्यावरण संरक्षण पर उसकी चिंता से भी रू-ब-रू कराती है !
अजय सोडानी का जन्म 8 अप्रैल, 1961 को इन्दौर में हुआ। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा इन्दौर के वैष्णव स्कूल में हुई। एम.जी.एम. मेडिकल कॉलेज, इन्दौर से इन्होंने एम.बी.बी.एस. और एम.डी. तथा एम्स, नई दिल्ली से न्यूरोलॉजी में डी.एम. की उपाधि प्राप्त की। फिलहाल सेम्स मेडिकल कॉलेज, इन्दौर में प्रोफेसर (न्यूरोलॉजी) के रूप में कार्यरत हैं। भ्रमण करना इनके जीवन का विशेष पक्ष रहा है। इन्होंने शहरों से इतर, भारत के सुदूर इलाकों में भी सपत्नीक पैदल भ्रमण करने का गौरव हासिल किया है। अपनी यात्राओं के दौरान अर्जित अनुभवों को कविता, निबन्ध, छायाचित्र तथा कहानियों का रूप देनेवाले अजय सोडानी देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरन्तर प्रकाशित व प्रशंसित होते रहे हैं। अपनी विशिष्टता के कारण ही इनकी यात्राएँ
‘लिम्का बुक ऑफ रिकॉड्र्स’—2006 तथा 2011 में दर्ज की जा चुकी हैं। हिमालय-यात्रा सीरीज़ में यह इनकी पहली पुस्तक है।
"आप जीवन की दौड़ से भागकर यहाँ हिमालय पर आए हैं- कुछ देर ठहर कर देखें तो सही। गुज़रते क्षण और आते क्षण के मध्य में जो एक छुपा हुआ स्पन्दनहीन अन्तराल है, आती और जाती साँस के मध्य जो एक निष्कम्प ठहराव है, उसको महसूस करने की चेष्टा करें। गति से अभिभूत हम लोग उस ठहराव की आदतन उपेक्षा करते हैं, जबकि मुझे लगता है कि जिस आनन्द की खोज में हम सब भाग रहे हैं वह तो उसी ठहराव में छुपा हमारा इन्तज़ार कर रहा होता है।"
अजय सोडानी जी द्वारा रचित यह पुस्तक पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। सौभाग्य ही कहूँगी इसे, क्योंकि कभी सोचा भी नहीं था कि इस तरह के स्थान भी होंगे हमारे हिमालय में। अजय जी ने इन स्थानों की न केवल झलक दिखाई अपितु इन काल्पनिक से लगने वाले पहाड़ों पर चढ़ाई को शब्दों से जीवन्त कर दिया। इस पुस्तक में दो यात्राओं का वर्णन है- कालिन्दी खाल और आडेन काॅल।
कालिन्दी खाल, संसार का सबसे ऊँचा ट्रैकेबल पास है, 19500 फीट से कुछ ज़्यादा ऊँचा। इसे पार करने को भारतीय पर्वतारोहण संस्थान द्वारा expedition का दर्जा दिया गया है। अजय जी ने group के साथ गंगोत्री से शुरू करके बद्रीविशाल तक की trekking की। इस 17 दिन के मनमोहक सफर को बेहद खूबसूरती से बयाँ किया है उन्होंने। वहीं आडेन काॅल यात्रा को पांडवों के पदचिह्नों पर चलना भी कहा जाता है। यह रुदुगैरा घाटी को भिलंगना घाटी से जोड़ता है। गंगोत्री से शुरू करके घुतु तक की 13 दिन की इस बेहद कठिन यात्रा को अजय जी ने बहुत साहसिक ढंग से लिखा है। साथ ही कुदरत की सुन्दरता को बेहद खूबसूरती से शब्दों में पिरोया है। कुदरत पर मानव द्वारा आधुनिकता के नाम पर ढाए जा रहे कहर का कारुणिक वर्णन किया गया है। हिमालय के बारे में पढ़ी हुई मेरी बेहद मनपसंद पुस्तकों में से एक है यह।
Excellent book, first of its kind in Hindi. Takes you along into the toughest terrains of Indian Himalayas, brings to to the breathtaking beauty of it, at the same times explores the ill effects of global warming, bid dams. Provides glimpses of local culture. Highly recommended to all who aspire to visit Himalayas and love to read travelogues