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लोरियाँ
50 pages, Paperback
Published January 1, 2014
About the author
Bipan Chandra
64 books215 followersBipan Chandra (born 1928) is an Indian historian, specialising in economic and political history of modern India. He has specialized on the national movement. He is considered an authority on Modern Indian History and is one of its most popular scholars.
Source for information : Wikipedia (http://en.wikipedia.org/wiki/Bipan_Ch... ) and for the Author's photograph : Penguin ( http://www.penguinbooksindia.com/en/c... )
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June 17, 2017
बचपन में हम सबने सुनीं हैं लोरियां| माएं, दादियाँ, नानियाँ सुनातीं थी लोरियां| जब पिता के मन में ममता जागती है, तब भी लोरी सुनाई देती है|
लोरियां माँ के दूध के बाद ममता का सबसे मीठा भाव है| संगीत और शब्द का नैसर्गिक सरल और सुलझा हुआ रूप लोरियां| अधिकतर लोरियां स्वतःस्फूर्त होतीं है| शांत रात्रि में जब बच्चा गोद में आता है तब हृदय में पैदा होने वाले स्पंदन से निकलती हैं लोरियां| कभी धुन नहीं होती तो कभी शब्द नहीं होते… ध्वनि होती है, भावनाएं होती हैं| लोरियां बनती बिगड़ती रहती हैं| अक्सर याद नहीं रहती, याद नहीं रखीं जातीं|
फिर भी कई बार होता है, लोरियां कवि और गीतकार गाते हैं, शब्दों और धुनों में पिरोते हैं| कभी कभी माओं का हृदय शब्दों को यादगार लोरियों में बदल देता है| ऐसी लोरियां लोकगीत की तरह समाज में विचरतीं है, फिल्मों में गाई जातीं है| उनके संकलन भी आते हैं|
हाल में मैंने यह पुस्तक खरीदी है – लोरियां| एक छोटी सी बच्ची के पिता को खरीदना भी और क्या चाहिए? इसमें कुछ लोकलोरियां हैं तो महाकवियों की प्रसिद्ध लोरियां भीं हैं| हालाँकि कुछ गीतों को शायद गलती से लोरी कह दिया गया है| जैसे – जसोदा हरि पालने झुलावै|
कवियों और गीतकारों की लिखी लोरियों में ममता का भाव कम रह जाता है, काव्य और गीत का तकनीकी पक्ष मजबूत होने लगता है| इसमें कुछ अच्छे प्रयास भी हुए है| कई बार प्रसिद्ध गीतकार और कवि बेहतर शब्दों के जाल में उलझकर साधारण सी लोरी लिख पाते है| दूसरी ओर एक स्वतःस्फूर्त लोरी लिखे जाने पर उतनी सुन्दर नहीं जान पड़ती जितना वो ममतामयी गले से गाये जागते समय होती है|
आज जब लोरियां गाने का समय टेलीविजन के सामने निकल जाता है| लोरियों का अपना महत्व बरकारार है| यह हमारे शिशुओं का प्राकृतिक अधिकार है कि वो ममतामयी धुनें, शब्द और गीत सुने – लोरियां सुनें| यह पुस्तक इस दिशा में उचित कदम है|
शकुंतला सिरोठिया, कन्हैयालाल मत्त, प्रकाश मनु की लोरियां, लोरियों के नैसर्गिक सौंदर्य के निकट है| अन्य लोरियां गेय कम पठनीय अधिक हैं| कुल मिलकर पचास लोरियों की यह पुस्तक संग्रहणीय है|
लोरियां माँ के दूध के बाद ममता का सबसे मीठा भाव है| संगीत और शब्द का नैसर्गिक सरल और सुलझा हुआ रूप लोरियां| अधिकतर लोरियां स्वतःस्फूर्त होतीं है| शांत रात्रि में जब बच्चा गोद में आता है तब हृदय में पैदा होने वाले स्पंदन से निकलती हैं लोरियां| कभी धुन नहीं होती तो कभी शब्द नहीं होते… ध्वनि होती है, भावनाएं होती हैं| लोरियां बनती बिगड़ती रहती हैं| अक्सर याद नहीं रहती, याद नहीं रखीं जातीं|
फिर भी कई बार होता है, लोरियां कवि और गीतकार गाते हैं, शब्दों और धुनों में पिरोते हैं| कभी कभी माओं का हृदय शब्दों को यादगार लोरियों में बदल देता है| ऐसी लोरियां लोकगीत की तरह समाज में विचरतीं है, फिल्मों में गाई जातीं है| उनके संकलन भी आते हैं|
हाल में मैंने यह पुस्तक खरीदी है – लोरियां| एक छोटी सी बच्ची के पिता को खरीदना भी और क्या चाहिए? इसमें कुछ लोकलोरियां हैं तो महाकवियों की प्रसिद्ध लोरियां भीं हैं| हालाँकि कुछ गीतों को शायद गलती से लोरी कह दिया गया है| जैसे – जसोदा हरि पालने झुलावै|
कवियों और गीतकारों की लिखी लोरियों में ममता का भाव कम रह जाता है, काव्य और गीत का तकनीकी पक्ष मजबूत होने लगता है| इसमें कुछ अच्छे प्रयास भी हुए है| कई बार प्रसिद्ध गीतकार और कवि बेहतर शब्दों के जाल में उलझकर साधारण सी लोरी लिख पाते है| दूसरी ओर एक स्वतःस्फूर्त लोरी लिखे जाने पर उतनी सुन्दर नहीं जान पड़ती जितना वो ममतामयी गले से गाये जागते समय होती है|
आज जब लोरियां गाने का समय टेलीविजन के सामने निकल जाता है| लोरियों का अपना महत्व बरकारार है| यह हमारे शिशुओं का प्राकृतिक अधिकार है कि वो ममतामयी धुनें, शब्द और गीत सुने – लोरियां सुनें| यह पुस्तक इस दिशा में उचित कदम है|
शकुंतला सिरोठिया, कन्हैयालाल मत्त, प्रकाश मनु की लोरियां, लोरियों के नैसर्गिक सौंदर्य के निकट है| अन्य लोरियां गेय कम पठनीय अधिक हैं| कुल मिलकर पचास लोरियों की यह पुस्तक संग्रहणीय है|
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