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भाषा का समाजशास्त्र

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103 pages, Hardcover

First published January 1, 2004

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About the author

अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त भाषावैज्ञानिक, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से पी-एच.डी.।
प्रकाशित कृतियाँ: भाषा का समाजशास्त्र, भारत में नाग परिवार की भाषाएँ, भोजपुरी के भाषाशास्त्र, भोजपुरी व्याकरण, शब्दकोश आ अनुवाद के समस्या, हिन्दी साहित्य का सबाल्टर्न इतिहास, हिन्दी साहित्य प्रसंगवश। सम्पादित पुस्तकें: कहानी के सौ साल: चुनी हुई कहानियाँ, काव्यतारा, काव्य रसनिधि, दलित साहित्य का इतिहास-भूगोल, भोजपुरी-हिन्दी-इंग्लिश लोक शब्दकोश, पिचानवे भाषाओं का समेकित पर्याय शब्दकोश, साहित्य में लोकतंत्र की आवाज। अंग्रेजी में अनूदित पुस्तकें: दि रि-राइटिंग प्रॉब्लम्स ऑव भोजपुरी ग्रामर, डिक्शनरी एंड ट्रांसलेशन, लैंग्वेजेज ऑव नाग फैमिली इन इंडिया। इग्नू की पाठ्य पुस्तकें: भोजपुरी भाषा और लिपि, भोजपुरी व्याकरण, भोजपुरी अनुवाद।
मॉरीशस सरकार के विशेष अतिथि एवं वहाँ सात दिवसीय व्याख्यान, बी.बी.सी. लन्दन तथा एम.बी.सी., पोर्ट लुई सहित देश के कई आकाशवाणी केन्द्रों से साक्षात्कार एवं वार्ताएँ प्रसारित।
कई राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों, सेमिनारों एवं कार्य-शालाओं में सहभागिता तथा व्याख्यान।
सम्प्रति: एस.पी. जैन कॉलेज, सासाराम के स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग में रीडर।

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Displaying 1 - 2 of 2 reviews
Profile Image for Mukesh Kumar.
167 reviews62 followers
April 17, 2016
Some fascinating insights into caste and linguistics... Sanskrit and Prakrits, how caste hierarchies impact a 'literary' language and how they get implanted on the language of populace.


१. मागधी प्राकृत के साथ संस्कृत आचार्यों के दोयम दर्जे का व्यवहार क्यूंकि वे समाज के हाशिये के जातियों की भाषा थी, का उदाहरण संस्कृत नाटकों में मिलता है, जिसमे निम्न श्रेणी के पात्र प्राकृत बोलते हैं, मां प्राकृत बोलती है और बेटा संस्कृत !
२. वैदिक आर्यों के लिए मगध क्षेत्र ‘अनार्यों’ की धरती थी, जिसके वासी ‘कीकट’ थे, उनकी भाषा ‘कर्णकटु’ और ‘कर्मनाशा’ नदी आर्य भूमि की सरहद, जिसे पार करना निषेध था | समय के साथ जनसँख्या दबाव में उन्हें बढ़ना पड़ा, कर्मनाशा भी पार हुई, कीकट प्रदेश में ‘पवित्र’ स्थलों की स्थापना मजबूरन करनी पड़ी | शायद इसी सेलेक्टिव ऑक्यूपेशन का साम्राज्यवादी तरीका बाद में अंग्रेजों ने भी अपनाया |
३. भोजपुरी कृषि और श्रम संस्कृति की भाषा है, कामगारों, किसानों, मजदूरों की | यदि आधुनिक युग के संयत्र दरकिनार कर दें, तो कृषि संस्कृति का मुख्य आधार बैल है, जिसे रंग, आयु, सींग पर वर्गीकृत करने वाले कई विशेषण प्रचलित हैं : ललका, उजरका, करिआवा, धावर, गोल...
४. श्रम संस्कृति में सुबह के महत्व के कारण, सुबह और उसके आस पास के समय के लिए बहुत शब्द हैं : अन्हमुन्हारे, भोर, भोरहरिये, किरिन फुटले, बिहाने, फह फटले, झलफलाहे, सेकराहे, मुहलुकान आदि | वहीँ संस्कृत के शब्दावली में देवी देवताओं का वर्चस्व था तो शिव के ही २००० नाम है, विष्णु के १६००, इंद्रा के ४५०...
५. Loan words कैसे लोकमानस में कुछ परिवर्तनों के बाद प्रचलित होते हैं इसके कुछ उदाहरण :
- Box से बाक्स, बकसा , Honorary Magistrate से अनेरिया मजीस्टेट, Royal से ‘रावल’ और फिर ‘राऊर’, अरबी ‘फज्र’ से ‘फजिले’, फ़ारसी ‘खिश्म’ से ‘खीस’ (क्रोध), तुर्की ‘बुलाक’ से बुलाकी, पुर्तगाली ‘balde’ से बाल्टी |
- ‘चट-चट’ की आवाज़ से चटकी (चप्पल), फट-फट की आवाज़ से फटफटिया (मोटरसाइकिल), छू-छू की आवाज़ से छुछुनर (चूहा)|
६. Huns और उज्बेकों के आगमन पर नस्लभेदी विशेषणों का प्रचलन : ‘हुन्हड़ा’ जोकि लुटेरे या दबंग व्यक्ति का पर्याय है और ‘उजबक’ जो की मूर्ख का ! ईरानियों के प्रति दृष्टिकोण बदलने से देवतावाची ‘असुर’ का पर्याय ‘राक्षस हो गया |
७. समाज में जैसे जैसे वर्ग भेद और उंच नीच की जटिलताएं गहराने लगती हैं, भाषा में भी स्तर भेदक अभिव्यक्तियाँ कायम होने लगती हैं | जैसे अंग्रेजी में मध्यम पुरुष के लिए दो शब्द हैं : Thou और You, संस्कृत में ‘त्वं’, ‘भवत’, वहीँ मुंडा भाषाओँ में कोई नहीं | सांथाली में आदर के लिए अलग सर्वनाम नहीं है, तो क्या आदिम समाज ज्यादा समतामूलक था ?
1 review
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November 1, 2016
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This entire review has been hidden because of spoilers.
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