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जिप्सी Gypsy

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यह उपन्यास अपनी भाषिक संरचना से कथा-उद्देश्य की जमीन पर जिस तरह आंतरिक और बाह्य क्रियात्मकता के साथ रचा गया है, वह अपने-आप में एक उदाहरण है, और यह उदाहरण उपन्यासकार इलाचंद्र जोशी की एक बड़ी विशेषता है ! इस उपन्यास की धुरी है एक खानाबदोश लड़की जिसके कथा-आयतन में सम्मोहन, प्रेम, चेतना, कुंठा और उत्तेजना, फिर तमाम स्थितियों तथा संघर्षो की विस्तृत और अन्तहीन घटनाएँ अपनी गहरी जड़ो के साथ मानव-सभ्यता में अपना कालबोध प्रतीत होती हैं !

उपन्यास में लेखक ने स्त्री और पुरुष के मनोविज्ञान का कैनवास रचते व्यक्ति, समाज-वर्ग और धर्म, विचार, व्यवस्था तथा राजनीति के बीच की खाइयों और उसकी परिणति-प्रक्रिया पर भी अपनी पैनी नजर बनाये रखी है ! बहुमुखी प्रतिभा के विशिष्ट रचनाकार इलाचंद्र जोशी ने जिस दृष्टि और कलात्मकता के साथ अपनी इस कृति में अपने पात्रों के मनोलोक और उनके अपने बाहरी संसार से टकराव को सघनता से रचा है, उससे कोई भी संवेदनशील पाठक अछूता नहीं रह सकता !
(स्रोत: pustak.org)

375 pages, Paperback

Published January 1, 2015

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About the author

इलाचन्द्र जोशी (1903-1982 )हिन्दी के प्रसिद्ध उपन्यासकार थे। इलाचन्द्र जोशी भाषा हिंदी प्रसिद्धि मनोवैज्ञानिक उपन्यासकार, काहानीकार, आलोचक थे हिन्दी में मनोवैज्ञानिक उपन्यासों का प्रारम्भ श्री जोशी से ही हुआ, लेकिन श्री जोशी ने मात्र मनोवैज्ञानिक यथार्थ का निरूपण न कर अपनी रचनाओं को आदर्शपरक भी बनाया। इलाचन्द्र जोशी हिन्दी में मनोवैज्ञानिक उपन्यासों के आरम्भकर्ता माने जाते हैं। जोशी जी ने अधिकांश साहित्यकारों की तरह अपनी साहित्यिक यात्रा काव्य-रचना से ही आरम्भ की। पर्वतीय-जीवन विशेषकर वनस्पतियों से आच्छादित अल्मोड़ा और उसके आस-पास के पर्वत-शिखरों ने और हिमालय के जलप्रपातों एवं घाटियों ने, झीलों और नदियों ने इनकी काव्यात्मक संवेदना को सदा जागृत रखा।

जोशी जी बाल्यकाल से ही प्रतिभा के धनी थे। उत्तरांचल में जन्मे होने के कारण, वहाँ के प्राकृतिक वातावरण का इनके चिन्तन पर बहुत प्रभाव पड़ा। अध्ययन में रुचि रखने वाले इलाचन्द्र जोशी ने छोटी उम्र में ही भारतीय महाकाव्यों के साथ-साथ विदेश के प्रमुख कवियों और उपन्यासकारों की रचनाओं का अध्ययन कर लिया था। औपचारिक शिक्षा में रुचि न होने के कारण इनकी स्कूली शिक्षा मैट्रिक के आगे नहीं हो सकी, परन्तु स्वाध्याय से ही इन्होंने अनेक भाषाएँ सीखीं। घर का वातावरण छोड़कर इलाचन्द्र जोशी कोलकाता पहुँचे। वहाँ उनका सम्पर्क शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय से हुआ।

जोशी जी एक उपन्यासकार के रूप में ही अधिक प्रतिष्ठित हैं। उनके कवि, आलोचक या कहानीकार का रूप बहुत खुलकर सामने नहीं आया। इनके उपन्यासों का आधार मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद की संज्ञा पाता है। मनोवैज्ञानिक उपन्यासों पर ‘फ़्रायड’ के चिन्तन का अधिक प्रभाव पड़ा, किन्तु इलाचन्द्र जोशी के साथ यह बात पूरी तरह से लागू नहीं होती। जोशी जी ने पाश्चात्य लेखकों को भी बहुत पढ़ा था, पर रूसी उपन्यासकारों-टॉल्स्टॉय और दॉस्त्योवस्की का प्रभाव अधिक लक्षित होता है। यही कारण है कि उनके औपन्यासिक चरित्रों में आपत्तिजनक प्रतृत्तियाँ होती हैं, किन्तु उनके चरित्र नायकों में सदगुणों की भी कमी नहीं होती। उदारता, दया, सहानुभूति आदि उनके अन्दर यथेष्ट रूप में पाए जाते हैं। ये नायक इन्हीं कारणों से असामाजिक कार्य भले कर बैठते हैं, किन्तु बाद में वे पश्चाताप भी करते हैं।

कहानी
धूपरेखा
आहुति
खण्डहर की आत्माएँ

जीवनी
रवीन्द्रनाथ
शरद: व्यक्ति और साहित्यकार
जीवन का महान विश्लेषक विराटवादी कवि गेटे

आलोचनात्मक ग्रन्थ
साहित्य सर्जन
साहित्य चिन्तन
विश्लेषण

उपन्यास
लज्जा।
संन्यासी
परदे की रानी
प्रेत और छाया
मुक्तिपथ
जिप्सी
जहाज़ का पंछी
भूत का भविष्य
सुबह
निर्वासित
ऋतुचक्र

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January 14, 2025
लेखक ने मनोविज्ञान शास्त्र, सम्मोहन विद्या, मार्क्सवाद, ईसाईयत का घालमेल कर यह रचना लिखी है। इसमें विभिन्न पात्रों द्वारा व्यक्त किए विचार लेखक के गंभीर अध्ययन और चिंतन का प्रमाण हैं। लेखक ने अपने पात्रों का गहरा आत्म और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण कर उनके बीच के संवाद द्वारा इन विचारधाराओं के अंदरूनी रहस्यों पर प्रकाश डाला है। यह मात्र इन विचारधाराओं का विवरण नहीं है, बल्कि लेखक ने स्वतः विश्लेषण कर इनके बीच के आंतरिक सम्बन्धों को भी उजागर किया है।

पर विचारधाराओं के महायज्ञ के बीच कहानी की बड़ी निर्मम हत्या हुई है या यूँ कहें कि नवजात स्थिति में ही उसमें सन्निहित भावनाओं को पूर्णतः पनपने से पहले ही कुचल दिया गया है। मालूम होता है लेखक के पास अपने अध्ययन के पश्चात बहुत माल मत्ता तैयार हुआ था तो उसने उसको एक मूर्त रूप देने के लिए एक माटी सृजित कहानी तो लिखनी प्रारम्भ की पर उसे भट्टे में पककर पक्का रूप नहीं लेने दिया।

फलस्वरूप कहानी के पात्र अपने चरित्र में विरोधाभास लिए हुए हैं क्यूँकि उन्हें उनके स्वाभाविक रूप से बढ़ने ना देकर लेखक ने मात्र एक मोहरे की तरह उपयोग कर फेंक दिया है। कहानी के मध्य में पात्र अपनी विचारधाराओं का प्रचार करने बैठते हैं और कथा वाचन करने लगते हैं जिससे कहानी में ठहराव आ जाता है और कहानी उबाऊ होने लगती है।

रंजन - कहानी के वाचक और दो मुख्य पात्रों में से एक। सहमत, पर स्वार्थी और निस्तेज। बड़े बाप की औलाद जिसने कभी अभाव ना जाना हो पर सब सुख सम्पन्नता में पले जाने के कारण नास्तिक हैं। आज से १०० वर्ष पूर्व के Luxury Beliefs Troubled: A Memoir of Foster Care, Family, and Social Class धारी। चरित्र से ढीले - मनिया की सुंदरता से आकर्षित हो येन केन प्रकारेण उसकी विषम परिस्थितियों का लाभ उठा उस पर "सम्मोहन" शक्ति का उपयोग कर अपने वश में करने को आतुर। फिर अपने प्रिय मित्र के देहावसान के उपरांत उसकी विधवा पत्नी के साथ प्रेम आलाप। यहाँ तक कि महामारी के बीच दरिद्र रोगियों का उपचार करने आयी युवा नर्सों को भी अपनी कामुक दृष्टि से नहीं छोड़ते।

उदाहरणतः
उनमें से एक लड़की (जो मुझे सबसे सुंदरी लग रही थी और जो बीस बाइस से अधिक उमर की नहीं जान पड़ती थी) बड़े गौर से मेरी ओर देख रही थी। उस लड़की के प्रति मैं एक अजीब आकर्षण का अनुभव कर रहा था।


मनिया - पुस्तक की नामराशि "जिप्सी"। रंजन के तथाकथित "सम्मोहन" प्रयोग का सच जान कर भी उसकी भुक्तभोगी बनी ताकि रंजन के सानिध्य और संपन्नता का लाभ ले सके। हिंदू माँ और तिब्बती पिता की पुत्री। पर हिंदू रंजन से प्रेम पर हिंदू रीति से विवाह करने में अनिच्छुक क्यूँकि "कोई भी सही पर हिंदू नहीं"। रंजन द्वारा धर्म त्याग "Common Law" विवाह करने के लिए भी इच्छुक नहीं क्यूँकि उसका बौध धर्म से लगाव है। इतना लगाव कि कुछ ही समय बाद ही उन्हें ईसा की कृपा मिल गयी और वे रंजन से एक ही शर्त पर विवाह करने के लिए सहमत हुई कि दोनों ईसाई धर्म अपना लें। आगे जाकर उग्र मार्क्सवादियों के हमले के फल स्वरूप अपना मुँह जला बैठीं पर "Stockholm Syndrome" तो देखिए स्वयं ही आंदोलनजीवी बन बैठीं और गृहस्थी को त्याग दिया। अर्थात् - हिंदू < बौध < ईसाई < मार्क्सवाद। आप बस क्रॉनॉलॉजी समझ लीजिए!
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