हिन्दी की वरिष्ठ कथाकार और पत्रकार मृणाल पाण्डे अपने लेखन में समय तथा समाज के गम्भीर मासलों को लगातार उठाती रही हैं। भारतीय स्त्रियों के संघर्ष और जिजीविषा को भी वे इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखती-परखती रही हैं। यही कारण है कि स्त्री प्रश्न के प्रति गहरी प्रतिबद्धता के बावजूद उनका लेखन स्त्री विमर्श के संकीर्ण दायरे में सिमटा हुआ नहीं है। वे अन्दर के पानियों का सपना देखती हैं, तो ‘नारी वाद आन्दोलन की विडम्बना’ को भी उजागर करती हैं।
इस पुस्तक में समय-समय पर लिखी गई उनकी टिप्पणियाँ और आलेख संकलित हैं। लेखिका ने राजनीति में ‘महिला’ सशक्तिकरण और ‘पंचायती राज की महिला भागीदारी’ जैसे बड़े सवालों के साथ-साथ कई छोटे-छोटे मामलों और प्रश्नों को भी उठाया गया है, जिनसे गुज़रते हुए एक ऐसा ‘हॉरर शो’ पाठकों के सामने उपस्थित होता है, जिसमें पुरूष वादी समाज की नृशंसता में फँसी स्त्री की छटपटाहटों के कई रूप दिखलाई देते हैं। हमने सिर्फ पराजय ही नहीं, प्रतिकार की छटपटाहट भी सही है। करुणा के भीतर की बेचैनी को रेखांकित करना मृणाल पाण्डे के लेखन की खास विशेषता है।
एक पत्रकार के नाते वे हर छोटे बड़े सवाल को शिद्दत के साथ उठाती हैं, लेकिन अपने पात्रों को जड़ पदार्थ मानकर छोटा नहीं बनाती, बल्कि एक लेखिका के नाते संवेदना के स्तर पर उनसे जुड़ जाती हैं-यही चीज़ मृणाल पाण्डे को सबसे अलग और विशिष्ठ बनाती है।
(स्रोत:pustak.org)