मैं हालात का सताया आदमी हूं, नाम का जीता हूं लेकिन आज तक कभी कुछ नहीं जीता. मेरे बनाने वाले ने मेरी तकदीर ही ऐसी उकेरी है कि खुद मुझे इस हकीकत का एहतराम करना पड़ता है कि मुझसे बुरा कोई नहीं. कोई नहीं जिसके प्रारब्ध के पन्नों पर सदा से ही काली स्याही फिरी हो.
देखा जाए तो कहानी कोई यूनिक नहीं है लेकिन कुछ घटनाये जैसे हवलदार को थाने में ही धमकाना, बहराम से जीत का माफ़ी माँगना, सावन का हश्र और दुश्मन का खुद को मारना उपन्यास को औसत घोषित करने से बचा लेता है. अंत में घटनाये बड़ी तेज़ी से होती है जो इसको पठनीय बनाता है. Its a nice one time read👌👌
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय, जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।
संत कबीर का यह दोहा मुझे तब याद आ रहा था जब मैं “मुझसे बुरा कौन” और “मुझसे बुरा कोई नहीं” उपन्यास पढ़ रहा था। जीत सिंह सीरीज के ये दोनों उपन्यास इसी वर्ष लगभग दो महीने के अंतराल पर छपे हैं। दोनों उपन्यास एक ही वृहद् कहानी के दो भाग हैं – जिसका पहला भाग “मुझसे बुरा कौन”, अप्रैल में प्रकाशित हुआ, वहीँ दूसरा भाग “मुझसे बुरा कोई नहीं” इसी महीने प्रकाशित हुआ है। ये दोनों ही उपन्यास “हार्पर हिंदी” से प्रकाशित हुए हैं, इसलिए आसानी से सभी बुकस्टोर और ई-कॉमर्स वेबसाइट पर उपलब्ध हैं।
मैं फिर से दोहे की तरफ आता हूँ, जो इन दोनों उपन्यास में जीता के चरित्र को चरितार्थ करता है। यह खुद जीत सिंह का स्वयं के लिए आंकलन है की वह बुरा इंसान है लेकिन अपनी बदनसीबी के कारण। जीत सिंह सीरीज पढने वाले पाठकों एवं उसके प्रशंसकों ने हमेशा उससे हमदर्दी जताई है, उसे कभी बुरा इंसान माना ही नहीं। जीत सिंह का किरदार इन दोनों उपन्यास में किसी बुरे इंसान का नहीं है, पूर्व में प्रकाशित इस सीरीज के किसी भी उपन्यास में उसका किरदार बुरे इंसान का था भी नहीं, बल्कि वह तो बदनसीब इंसान है, जिसके साथ बुराई, यारमारी, धोखेबाजी आदि अपने-आप जुड़ते नज़र आते हैं और अगर ये सभी बुराइयां उसके साथ न जुड़े तो ‘जीता’ को ‘जीता’ कहने में संकोच होता है।
कुछ खास मजा नाही आया इस पुस्तक को पढते वक्त. तेज तर्रार रोमांच इसमे था ही नही. कहानी बहुत धीमे ढंग से चलती है. यहाँ तक की अंतिम दौर तक कोई रफ्तार नही पकडती. फिर भी अपने रहस्य की वजह से थामे रखने में कामयाब हो जाती है. बेहतर हो सकती थी.
I like new novels 'Mujhse Bura Kaun' & 'Mujhse Bura Koi Nahin' a lot. Though Jeet Singh role is less in the novel but it is important and his name is there in almost every scene. They way Pathak Sir has taken story forward, it reminded of Bakhiya Puran (even Netaji compared his action of inviting at breakfeast to Bakhiya). It could have been easily stretched story in 3 parts but Pathak ji kept climax crisp that i liked as it represents power of Netaji that he don't give time to relax to his enemies and similar message is being delivered to every person before being killed. Jeeta ne novel me bhale hi 5000 Rs jeete ho but usne hamara dil jeeta.
These novels' position in jeet singh series is like what iPhone has in phones or what USA has in countries or what position you have among other writers.