I am impressed with the maiden effort of the author and enjoyed a lot. The suspense and step-wise unravelling of mystery kept me engaged throughout the length of the novel. Story is fast-paced. Quotations here and there are added attractions but the discussion between the characters seems over-stretched at a few places, which act as impediment to the fast paced story.
Overall a good read. A new, promising author has arrived on the horizon with One Shot.
बदला - इंसानी भावनाओं में से एक अलाहिदा क़िस्म की भावना I पकते हुए गुस्से से ठहर कर उपजी या फिर आतिश की तरह भड़क कर जलती - एक भावना I कभी अपने किसी के प्रति हुई नाइंसाफी से पैदा हुई, तो कभी खुद के प्रति हुई हुई से I कभी गुस्से की ज्यादती से इस तरह अँधा बनाती हुई कि पूरे दिमागी तवाजन को हिलाकर खुद के भीतर की बुनियादी अच्छाई को हर कर शैतानी मश्गलों में मुब्तला कर दे I तो कभी वहशी बना देने वाली I हत्ता कि, चीख-चीखकर 'खून का बदला खून' जैसी मुनादी करती हुई सी I क्यों ? शायद रूह की तस्कीन के लिए, तपते, उबलते कलेजे को ठंडक पहुँचाने के लिए कि जो हुआ और जो उसके बाद हुआ, हमने उसका हिसाब चुका लिया गया I इन्सान का बच्चा जैसे-जैसे बढ़ता जाता है, उसे सही-गलत, अच्छे-बुरे की पहचान भी होती जाती है I यही पहचान हमारे भीतर एक और जज़्बे की परवरिश भी करती जाती है - खुद के प्रति हुए किसी गलत का जवाब देने की, खुद के प्रति या किसी दूसरे ऐसे - जो हमारी मोहब्बतों, हमारी बेशुमार चाहतों का हक़दार है- के प्रति हुई किसी नाइंसाफी के लिए आवाज़ उठाने की I यह बदला भरी भावना किसी जुर्म की पनाहगाह है या 'इन्साफ हुआ' की मुनादी I यह एक अलग बहस का मुद्दा है I दोनों ही बातें हैं - जो किस तरह हुआ, किस तरह चुकाया गया, किन रास्तों को अपनाया गया जैसी बुनियादी बातों पर मुनहसर है I जुर्म से मुत'अल्लिक़ अफसानों और जासूसी अफ़सानानिगारी मे बदले के जोश और जज्बे से लबरेज़ कई बेहतरीन नोवेल्स अलग-अलग ज़ुबानों में पढ़ने को मिले हैं I इसी साल आया 'रमाकांत मिश्र' का 'सिंह मर्डर केस' भी इसी जज़्बात की बुनियाद पर टिका तमाम इंसानी जज्बातों से भरा-पूरा एक बेहतरीन और कामयाब नावेल है I लेकिन यहाँ बात उसकी नहीं हो रही है I तकरीबन मई के आस-पास ही यह सुनने में आया था कि जल्द ही 'कँवल शर्मा' का 'वन शॉट' आने वाला है I ब्रिटिश लेखक 'ली चाइल्ड' के एक खासे मकबूल नावेल के नाम वाले इस नावेल ने बरबस ही अपनी ओर ध्यान खींचा था और चूंकि कँवल जी पहले ही बतौर एक तर्जुमा नवीस अपनी पहचान कायम कर चुके थे और उनकी तर्ज़े तहरीर ने अपनी बानगी, रवानगी से बहुत मुत'अस्सिर किया था, तो यह उम्मीदें लगनी लाज़िमी भी थीं I बहरहाल किन्ही नामालूम वजुहातों से नावेल वक़्त रहते न आ पाया I और सितम्बर के महीने में किसी तरह उसकी मौसूलियत मुमकिन हो सकी I नावेल हाथ में आते ही पहली नज़र में मायूसी उसके वाइट पेपर पर न आये होने से हुई क्योंकि इसके आने की ख़बरों के दरमियान यह बात भी सुनने को मिली थी कि वाइट पेपर पर आने की वजह से ही नावेल के शाया होने का मुआमला रवि पॉकेट बुक्स की ओर से मुअल्लक (विलंबित ) है I बहरहाल जो भी वजहें रही हों I हो सकता है लेखक और प्रकाशक इस मामले में नावेल की कीमतों में हो जाने वाले अतिरिक्त इज़ाफे पर मुत्तफ़िक न रहें हों I कवर पेज काफी खूबसूरत लगा I अलबत्ता उसकी क्वालिटी उतनी उम्दा न थी I मगर अस्सी रुपये में - 'एक रुपये में पूरा जंगल खरीदेंगे, न जाने कहाँ-कहाँ से चले आते हैं'- जैसा डायलाग याद आते ही कुछ शिकायत दर्ज कराने का हौसला जाता रहा I उपन्यास की छपाई देखकर कथानक की लम्बाई का सहज ही अंदाज़ा हो जाता है I फोंट्स छोटे हैं I और पूरा कथानक तीन सौ सफहों पर फैला हुआ है जो अमूमन नार्मल फोंट्स पर तकरीबन ४२५ -४५० पेजेज के आस-पास ठहरता I तो उस हिसाब से जो हुआ है ठीक ही हुआ है I अलबत्ता, पढ़ते समय कुछ दिक्कतें जरूर दरपेश हुईं I शुरूआती सफ़हे ही पाठक को वाह-वाही पर मजबूर कर देते हैं I लेखकीय के माध्यम से लेखक ने काफी रोचक और ज्ञानवर्धक जानकारी दी है I नावेल की शुरुआत एक स्पाई बेस्ड थ्रिलर जैसी है I जहाँ हिंदुस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी 'रॉ' का एक एजेंट 'विनय रात्रा' अपने एक मिशन के तहत जॉर्जिया की राजधानी तिब्लिसी में होता है I और वहीँ रहकर अपने मुल्क की ख़ातिर अपने काम को अंजाम दे रहा होता है I फिर यह कहानी शुरूआती चंद सफहों पर चलकर एक मोड़ लेती है, जहाँ विनय को ख़बर मिलती है कि उसके छोटे भाई 'रोहन रात्रा' की मौत हो गयी है जो आगे चलकर उसके लिए एक क़त्ल की खबर बन जाती है I ज़ाहिर है, मां जाया होने, अपना खून होने की कलक दिल में जोर मारती ही है और जब खबर यह हो कि मरने वाला अपनी मौत न मरा, किसी के लाये मरा तो मन में बदले की भावना का जाग उठना भी लाजिमी है I तो 'वन शॉट' एक भाई का दूसरे भाई के लिए इन्साफ की मुहिम छेड़ने का अफसाना है, एक मजलूम और ज़बर के ज़ुल्म के आगे घुटने टेके निजाम और एक मफलूज़ हुए शहर को उसका खोया हुआ वज़ूद वापस सौंपने का अफसाना है I नावेल की सबसे बड़ी ख़ूबी उसकी तर्ज़े -तहरीर है जो बिलाशक़ लेखक की अपनी एक इन्फिरादी पहचान बनाने के लिए काफी है I पढ़ते हुए लफ़्ज़ों की हलावत (मीठापन ) रूह को तर करती है I एक शफ्फाक़ ज़ुबान, और आसां लफ्ज़ से बुना गया अफ़साना अपनी रफ़्तार से बढ़ता चला जाता है I मगर, लेखन में की गयी अतिरिक्त मेहनत कहीं-कहीं बानगी को बिगाड़ती भी है I नावेल थर्ड पर्सन में लिखा गया है जो लेखक की अपने कथ्य पर पकड़ और उसके एतमाद को दिखाती है I और पूरी नफासत से लेखक ने नैरेशन को संभाला है I अलबत्ता कहीं-कहीं डायलाग लम्बे बन पड़े हैं जो थोड़ा उबाऊ सा लगने लगते हैं I लेकिन यह सब शुरूआती हिस्से में ही आया है I बाद का हिस्सा जब रफ़्तार पकड़ता है तो अंजाम तक ही पहुँचता है और पाठक बहता चला जाता है I उपन्यास पढ़ते हुए कही खामियां भी नज़र आयीं जो सिर्फ संपादन टीम की ख़ामी है I और आगामी संस्करणों में उक्त खामियों को दुरुस्त किया जाना अपेक्षित है I मगर यह खामियां इतनी बड़ी भी नहीं हैं जिनके चलते कथानक में कोई ख़लल पड़ता हो I नावेल का क्लाईमेक्स मिली-जुली प्रतिक्रिया पैदा करता है I प्रेडिक्टेबल है भी और नहीं भी I यह लेखक का कमाल है I पाठक अपनी तरह लेने को आज़ाद है I कुछ पाठक मुतमईन हो सकते हैं और कुछ नाख़ुशी ज़ाहिर कर सकते हैं I मगर हर लेखन का ये एक ऐसा पक्ष है जिसे नज़रअंदाज़ न करके भी नज़रअंदाज़ करना ही पड़ता है I वो यह कि कोई भी लेखन मुकम्मल हो ही नहीं सकता - जिसका खुद के इतना मुकम्मल होने पर दावा हो कि वह हर आमो-ख़ास का पसंदीदा हो I हर रचना अपने हर रीडर के पैमानों पर खरी उतर सके यह बहुत कम देखने को मिला है I पूरे उपन्यास में सिर्फ एक ख़ास प्रसंग का न होना अखरता है I और पुरजोर तरीके से उसे बड़ी ख़ामी के तौर पर दर्ज़ कराया जा सकता है I यह ख़ामी है दोनों भाइयों की किसी भी सूरत में मुलाकात न होना I न जिन्दे में न छोटे के मुर्दा बने पड़े वज़ूद की सूरत में I लेखक की तर्ज़े- तहरीर और अहलियत को देखते हुए यकीनी तौर पर कहा जा सकता है कि वह एक ख़ास प्रसंग एक यादगार प्रसंग बन पड़ता जिसमे कई दिलदोज़ डायलॉग्स और मोनोलॉग्स की भरपूर गुंजाइश होती I उपन्यास एक भाई के क़त्ल हो जाने पर उसके अंजाम से तड़पते एक भाई के उसके गुनाहगारों से बदला लेने का अफ़साना है जो दिल से लिखा गया है और जहाँ दिल का मुआमला हो वहां थोड़ी-बहुत खामियाँ भी होती हैं I किये गए फैसलों के नतीजों के मुआमले में भी, तो कभी शुरू किये गए सफ़र की सार्थकता को लेकर भी I यह तो फिर भी एक अफ़साना है I मगर मायने हम��शा खूबियों और खामियों की हिस्सेदारी के हैं I उनके अनुपात के हैं I और इस मुआमले में 'वन शॉट' की हिस्सेदारी खूबियों वाले पहलू में है I यह पहले उपन्यास के नाते एक काबिले तारीफ बात है I लेखक की कामयाबी की अलामत है, उस पर आइन्दा दिनों में आयद हो जाने वाली जिम्मेदारियों की अलामत है I
वन शॉट विनय रात्रा श्रृंखला का पहला उपन्यास है। यह एक भाई के अपने मृत भाई को इंसाफ दिलाने की दास्तान है। उपन्यास मुझे पसंद आया। उपन्यास के प्रति मेरी राय आप निम्न लिंक पर जाकर प्राप्त कर सकते हैं: वन शॉट