नॉवल तो बहुत पहले ईबुक में ही ख़रीद लिया था, फिर पता चला की प्रिंटेड कापी भी आने वाली है तो सोचा कि वही ख़रीद कर पढ़ेंगे. पर हालात कुछ ऐसे हुए की ईबुक, हार्ड कॉपी दोनों होने के बावजूद कोई भी नहीं पढ़ पाया.
बस अभी दो दिन पहले ही पढ़ी है. पढ़ने से पहले मन में बहुत प्रश्न थे कि क्या ये मनोरंजन दे पाएगी? भाषा नीरस तो नहीं होगी? नए लेखक हैं तो भरोसा हो नहीं पा रहा था. नॉवल ख़रीद तो चुके ही थे तो लेखक पर एक एहसान (!!) की ख़ातिर पढ़ना शुरू किया.
जब पढ़ना शुरू किया तो पता चला की क्या कमाल लिख डाला है लेखक ने, एहसान हम ने नहीं, लेखक ने हम पर किया है, एक अलग अनुभव दिया है.
नॉवल में बार बार कहानी flashback में जाती है और वर्तमान में लौट लौट कर आती है. एक साहसिक प्रयास! एक नए लेखक के लिए यह इतना आसान नहीं होता क्योंकि लिखते समय चूक होने की संभावना बढ़ जाती है. लेखक ने इस चैलेंज को बहुत अच्छे से सम्भाला है..
मुझे आधे से ज़्यादा नॉवल पढ़ने के बाद भी नाम से शिकायत थी, मुझे लग रहा था कि मरने वाला कोई सरदार होगा पर ऐसा तो था ही नहीं.. बाद में मुझे लेखक की सोच से इत्तफ़ाक़ हुआ कि क्यों ये नाम उपयुक्त है, और बिलकुल सही है.
मुझे इस नॉवल को पढ़ने से पहले पुलिस, CBI, CID etc सब एक ही लगते थे, उनके काम करने के तरीक़ों का अंतर नहीं पता था.. इस नॉवल में इतने विस्तार से इन्वेस्टिगेशन को दिखाया गया है कि सब कुछ अच्छे से समझ आ गया.
नॉवल की भाषा भी आम बोल चाल की है, ऐसा नहीं हुआ कि किसी भी शब्द का अर्थ मुझे ढूँढना पड़ा हो. बहुत मज़ा आया.
लेखक की यह ईमानदार कोशिश बहुत अच्छी है, उम्मीदों से कहीं आगे नॉवल की भाषा, प्लॉट, dialogues, पात्र इत्यादि सभी बहुत शानदार बन पढ़े हैं. रमाकान्त जी, जितेन्द्र जी, शुभानंद जी सभी बधाई के पात्र हैं
लेखक की अगली नॉवल का इंतज़ार है..