बदचलन बीवियों का द्वीप वयस्कों का पंचतंत्र है। इसकी अधिकांश कहानियाँ सोमदेव द्वारा 11वीं शताब्दी में रचित कथासरित्सागर से ली गई हैं।
बहुत कम लेखक पाठक बन लिख पातें हैं। अनुवाद प्रायः यांत्रिक होते हैं, कभी मूल का प्रतिबिंब, तो कभी किसी ग्रंथ का संक्षिप्त सार। लेकिन यह संग्रह उनसे अलग है। यहाँ लेखक केवल कहानी कहने वाला नहीं, बल्कि एक पुनर्रचयिता है। वह मूल से छूट लेता है, पर छूट कल्पनाशीलता के खेल में नहीं, बल्कि वैचारिक साहस में निहित है। यह स्वतंत्रता विशेष रूप से स्त्री पात्रों के चित्रण में दिखती है। जहाँ कथासरित्सागर की स्त्रियाँ सीमित और पारंपरिक भूमिकाओं में आबद्ध हैं, उनकी स्वतंत्रता और आवेग बदचलन है, वहीं इस संग्रह में वे अधिक जटिल, मुखर और निर्णायक रूप में सामने आती हैं। यह न केवल आज के पाठक के लिए ज़रूरी हस्तक्षेप है, बल्कि मूल कथा के भीतर छिपे अव्यक्त स्वर को सामने लाने का प्रयास भी लगता है।
कृष्ण बलदेव वैद हिंदी में लिखते थे और न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में अंग्रेज़ी साहित्य पढ़ाते थे। उन्हें पढ़ते हुए यह भरोसा बनता है कि जीवन और काम के विरोधाभासों के बीच भी लिखा जा सकता है।