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रह गईं दिशाएँ इसी पार

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सृष्टि और संहार, जीवन और मृत्यु के बफर-जोन पर खड़े आदमी की नियति से साक्षात्कार कराता संजीव का यह उपन्यास हिन्दी साहित्य में जैविकी पर रचा गया पहला उपन्यास है। उपन्यास के पारम्परिक ढाँचे में गैर पारम्परिक हस्तक्षेप और तज्जनित रचाव और रसाव इसकी खास पहचान है। निरंतर नए से नए और वर्जित से वर्जित विषय के अवगाहनकर्ता संजीव ने इसमें अपने ही बनाए दायरों का अतिक्रमण किया है और अपने ही गढ़े मानकों को तोड़ा है।

मिथ, इतिहास, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नए से नए विषय तथा चिन्तन की प्रयोग भूमि है यह उपन्यास और यह जीवन और मृत्यु के दोनों छोरों के आर-पार तक ढलकता ही चला गया है, जहाँ काल अनंत है, जहाँ दिशाएँ छोटी पड़ जाती हैं, जहाँ गहराइयाँ अगम हो जाती हैं और व्याप्तियाँ अगोचर...!

312 pages, Paperback

Published January 1, 2011

15 people want to read

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Sanjeev

49 books7 followers

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Profile Image for Indra  Vijay Singh.
148 reviews7 followers
May 5, 2024
#51 रह गई दिशाएं इसी पार ( संजीव )

रह गई दिशाएं इसी पार मेरे द्वारा पढ़ा गया संजीव जी का पहला उपन्यास है। यह उपन्यास को लेकर मेरी प्रतिक्रिया मिली जुली है। संजीव जी का लेखन बहुत ही उच्च कोटि का है किंतु इस उपन्यास में उन्होंने इतने सारे मुद्दे एक साथ समेटने का प्रयत्न किया है की यह थोड़ा बिखरा बिखरा सा लगता है। कई बार कहानी अपना सुर ताल खो देती है। 320 पन्नो में इसे स्मेटना प्लॉट के साथ अन्याय नजर आता है। इतना विस्तृत फलक लिए हुए इस कृति को कम से कम 1000 पन्नो तक जाना चाहिए। कई सारे गंभीर मुद्दों को यह किताब उठाती तो है पर उसके साथ न्याय नहीं कर पाती है।

अगर आपको साइंस और क्लोनिंग इत्यादि विषयों में रुचि है तो यह इसके नैतिक पहलुओं पर बहुत गहराई में जाकर चर्चा करती है।
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