Munshi Premchand (Hindi: मुंशी प्रेमचंद) was an Indian writer famous for his modern Hindustani literature. He is one of the most celebrated writers of the Indian subcontinent,and is regarded as one of the foremost Hindustani writers of the early twentieth century.
Born Dhanpat Rai, he began writing under the pen name "Nawab Rai", but subsequently switched to "Premchand", while he is also known as "Munshi Premchand", Munshi being an honorary prefix. A novel writer, story writer and dramatist, he has been referred to as the "Upanyas Samrat" ("Emperor among Novelists") by some Hindi writers. His works include more than a dozen novels, around 250 short stories, several essays and translations of a number of foreign literary works into Hindi.
Premchand is considered the first Hindi author whose writings prominently featured realism. His novels describe the problems of the poor and the urban middle-class. His works depict a rationalistic outlook, which views religious values as something that allows the powerful hypocrites to exploit the weak. He used literature for the purpose of arousing public awareness about national and social issues and often wrote about topics related to corruption, child widowhood, prostitution, feudal system, poverty, colonialism and on the India's freedom movement.
Several of his early works, such as A Little Trick and A Moral Victory, satirised the Indians who cooperated with the British colonial government.
In the 1920s, he was influenced by Mahatma Gandhi's non-cooperation movement and the accompanying struggle for social reform. During this period, his works dealt with the social issues such as poverty, zamindari exploitation (Premashram, 1922), dowry system (Nirmala, 1925), educational reform and political oppression (Karmabhumi, 1931).
In his last days, he focused on village life as a stage for complex drama, as seen in his most famous work Godan as well as the short-story collection Kafan (1936).Premchand believed that social realism was the way for Hindi literature, as opposed to the "feminine quality", tenderness and emotion of the contemporary Bengali literature.
प्रेमचंद जी का यह उपन्यास ग्रामीण जीवन को बड़ी सरलता से बयां करता है । प्रेमाश्रम में मुंशी प्रेमचंद किसानों के उत्पीड़न का गंभीरता से विवरण करते हैं । वह बताते हैं की कैसे अंग्रेजों द्वारा बनाई गई सामंती व्यवस्था किसानों के गले का फंदा बन जाती है जिसे ज्ञानशंकर जैसे जमींदार एवं अधिकारी मिलकर खींच के रखने चाहते हैं । मनोहर , बलराज , कादिर एवं थोड़े समय के बाद सुक्खू का भी इस अन्याय के खिलाफ खड़ा होना एक आशा कि लहर जगाता है ।
किसानो की विवशता पूर्ण अवस्था के अलावा भी इस उपन्यास में काफी कुछ है । इसमें मनुष्य के complex emotions का बड़ी ही सुंदरता से वर्णन किया गया है ।
मुंशी प्रेमचंद जी ने हर एक पात्र के हर पहलू का सरलता से वर्णन किया है । किसी पात्र को भी आप ब्लैक एंड व्हाइट के पहलु से नही देख सकते , हर इंसान में बुराई एवं भलाई दोनो होती हैं । इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है ज्ञानशंकर , जो कि गांववालों पर काफी अन्याय करते हैं पर अक्समात ही उन्हें बीच बीच में अपनी गलतियों का एहसास होता था चाहे कुछ क्षण के लिए ही सही। उनमें गुण भी हैं - वह काफी ज्ञानी हैं और अपनी बात को शब्दों में पीरोना कोई उनसे सीखे ।
वैसे ही प्रेमशंकर जो गांववालो के लिए देवता समान थे , उनकी हरसंभव तरीके से मदद करते थे पर अपने पतिधर्म को काफ़ी वर्षों तक ना निभा पाए , श्रृद्धा को उनके इस व्यवहार से जितना दुख सेहना पढ़ा उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।
प्रेमाश्रम से कोविड-19 pandemic से डटकर लड़ने की और साथ ही साथ ज़िन्दगी को कठिनाइयों के बावजूद ख़ुशी से जीने की भी प्रेरणा मिलती है! यह उपन्यास पढ़कर मुझे ऐसा लगा कि मनुष्य की हिम्मत और जज्बे की कोई सीमा नहीं है ! जहां आज हमारी पीढ़ी जो की बचपन से सब सुख सुविधाओं के साथ पली है, इस पंडेमिक की स्थिति में निराश एवं हताश पड़ गई है , वहीं 1918-1920 का वो दौर जिसमे यह उपन्यास लिखा गया है बतलाता है कि कैसे प्लेग के चलते परिवार के परिवार तबाह हो जाते थे और तब भी गरीब किसान परिवारों के जीने का होंसला ना टूटता था । इसका एक नायाब उदाहरण देखने को मिलता है जब इतनी विपत्तियों के बाद भी सब गांववाले शाम को प्रेमशंकर के साथ मिलकर चौपाल पर आनंदपूर्वक अभिनय करते हैं ! वह भाग दिल को छू लेने वाला है !
प्रेमचंद को देश की पीड़ित जनता से सच्ची हमदर्दी थी जो कि वो प्रेमशंकर के पात्र द्वारा कही गई इन पंक्तियों में बयां करते हैं : " मै किसानों को शायद ही कोई ऐसी बात बता सकता हूं , जिसका उन्हें ज्ञान ना हो । मेहनती तो उनसे अधिक दुनिया भर में कोई न होगा । उनकी दरिद्रता कि ज़िम्मेदारी उन पर नहीं, बल्कि उन हालात पर है जिनके तहत उन्हें अपना जीवन बिताना पड़ता है । वे परिस्थितियां क्या हैं ? आपस की फुट , स्वार्थ और वर्तमान समाजिक व्यवस्था , जो उन्हें मजबूती से जकड़े हुए हैं । लेकिन जरा विचार करने पर मालूम हो जाएगा - यह तीनों टहनियां एक ही बड़ी टहनी से निकली हैं और यह टहनी यह व्यवस्था है , जो किसानों के खून पर कायम है । "
Continues with favourite theme of Premchand - rural distress. And as always Premchand made the ending of the book a little bittersweet. I am quite satisfied with the ending though. The name of the book was a bit confusing for me - as I expected to see something from angle of romance, but here Prem refers to compassion and love. The book is showing contrast between two ideals - one where a person is full of compassion and other where a person does all the trickery to get what he wants. I would not mention which ideal wins as it will be a spoiler. The way the characters were developed in this book was just amazing. You feel a connect with all the characters and you can imagine them to be in front of you. In some parts, the story slowed down quite a bit, which made the book a little difficult to read.
इस किताब मैं भी प्रेमचंद ग्रामीण दिक्कतों को दिखाने का प्रयास कर रहे हैं। हमेशा की तरह इस पुस्तक का भी अंत थोड़ा खटमीठा है। पर मुझे इस पुस्तक का अंत पसंद आया। पुस्तक के नाम से मैंने कुछ प्यार की कहानी की अपेक्षा की थी, पर यहाँ प्रेम मतलब लोगों के साथ संवेदनशील आचरण और लोगों की मदद करना था। इस पुस्तक मैं २ भिन्न विचारधाराएं एक दूसरे के सामने लढती हैं। एक विचारधारा है संपूर्ण कुटिलता स्वार्थमय जीवन की और दूसरी विचारधारा है प्रेमपूर्ण, न्यायसंगत और समानता से भरा हुआ आचरण। प्रेमचंद ने अपने पात्रों को बखूबी विकसित किया है। पुस्तक पढ़ते पढ़ते हमें इन पात्रों से बहुत लगाव हो जाता है। कुछ जगहों पर कहानी थोड़ी धीरे हो जाती है, और इसलिए यह पुस्तक पढ़ने में थोड़ी मुश्किल थी।
जब मैं 75% बुक पढ़ चुका था तब मुझे कुछ समझ में आया। प्रेमचंद जी ने सभी किरदारों का नाम बड़ा ही सोच समझ कर रखा है। जैसे कि प्रभा शंकर: जो कभी मान मर्यादा के लिए अपने घर का पूरा पैसा उपयोग करने को भी राजी थे। ज्ञान शंकर: जिन्होंने बहुत ही उच्च कोटि का ज्ञान प्राप्त किया था अखबार में उत्कृष्ट लेखन करते थे वाक चतुरता थी। प्रेम शंकर: उनका विलायत से लौटना और पूरे लखनपुर में प्रेम संसार बसाना और लोगों को खूब प्रेम करना सदा सेवा करना। दयाशंकर: वैष्णो दया शंकर के बारे में ज्यादा कुछ बताया नहीं है परंतु उनके पुलिस साथी कहते देखिए लोगों से इनको खूब दया थी इन्होंने अपने धन से दूसरों के बच्चों की शादी तक कराई थी। माया शंकर: मायाशंकर एक ऐसा किरदार थे जो अपने नाम के विपरीत थे। मोह माया से छूटे हुए थे उन्होंने जमीदारी तक छोड़ दी थी तथा सारा दिखा किसानों को दे दिया था।
इसी प्रकार अन्य किरदार भी थे जैसे कि विद्या गायत्री श्रद्धा तेज शंकर और उनके भाई कमल राय जी, इत्यादि।
बड़ी मजेदार कहानी है। मुझे जहां तक समझ में आया है कि प्रेमचंद जी यह बताना चाहते हैं कि किस प्रकार ज्ञान खूब उछल कूद मचाता है, धन संचय तथा प्रेम के लिए अधर्मी नीति उपयोग करता है अपनी आत्मा को जला बैठता है अपनी इच्छाओं का दास हो जाता है। किस तरह प्रेम जले हुए पर ठंडा प्रदान करते हैं शीतलता प्रदान करते हैं, जिसकी छाया में उच्च कोटि के सद्भाव के बीच पनपते हैं ंं। किसान भाइयों से परिचय कराया गया कि कैसे हो गरीब होते हुए भी अपना काम चलाते हैं कैसे पल-पल ने आग पर चलना पड़ता है कैसे जमीदार उनको खाते हैं तथा चूसते रहने का प्रयत्न करते रहते हैं। परंतु इन लोगों के हृदय कितने साफ होते हैं तथा इनमें भी खूब मान मर्यादा होती है।
This entire review has been hidden because of spoilers.
A tale about the atrocities of the ruling class backed by the British rule in India. As always Premchand does it fantastically. The novel is pretty long though. But it includes a vast array of topics (such as corruption, religious stupidities, life philosophies etc etc) besides the main theme. It is veritably a remarkable literary work.
It reminds me of that horse meme. I'm not impressed with the "everything goes well and everyone starts living happily" type of ending. But overall, it was fun reading it.
Hindi has something magical in it—it always hooks me. Premchand beautifully showed the poor condition of farmers in British colonial India.
What a great trip this has been. There are so many lessons to learn from this book by Premchand ji. Every character teaches us something. Very happy to start my new year with this awesome novel. Great Read.
प्रेमाश्रम मुंशी प्रेमचंद की शुरुआती रचनाओं में से एक है, लेकिन इसमें भी वही गहराई, वही सामाजिक चेतना और वही मानवीय भावनाएँ दिखती हैं, जो उनकी बाद की प्रसिद्ध कृतियों जैसे गोदान या वरदान में दिखाई देती हैं।
कहानी ज़मींदारी प्रथा, न्याय व्यवस्था और समाज में बढ़ती असमानता के बीच प्रेम, कर्तव्य और आत्मबल की टकराहट को बहुत ही संवेदनशील ढंग से सामने लाती है। इस उपन्यास में भी प्रेमचंद जी ने हर पात्र को अपना अलग स्वभाव, सोच और संघर्ष दिया है और यही चीज़ इसे एक जीवंत अनुभव बनाती है। कई बार पढ़ते-पढ़ते ऐसा लगता है कि हम किसी फिल्म को नहीं, बल्कि एक सच्ची ज़िंदगी को सामने घटते देख रहे हैं। संवाद, बिंब, भावनात्मक गहराई, सब कुछ एकदम सधा हुआ और प्रभावशाली है।
हालाँकि, कुछ जगहों पर मुझे लगा कि उपन्यास थोड़ा ज़्यादा खिंच गया है। कुछ बातें कम शब्दों में भी कही जा सकती थीं और शायद उतना ही असर छोड़तीं। लेकिन यह भी हो सकता है कि लेखक का कोई उद्देश्य रहा हो, जो उस समय मेरी नज़र से छूट गया।
अगर आपने गोदान, गबन, या वरदान जैसी प्रेमचंद की अन्य रचनाएँ पढ़ी हैं और उनसे जुड़ाव महसूस किया है, तो प्रेमाश्रम ज़रूर पढ़ें। यह भी आपको वही सादगी, वही पीड़ा, और वही सामाजिक सजगता का एहसास देगा जो प्रेमचंद जी की लेखनी को इतना अद्वितीय बनाती है।