"मुसाफिर हूँ यारों, न घर है न ठिकाना "
#मुसाफिर_कैफे ,बातों की किताब, बातें पुरानी तरीका नया. कहानी की शुरूआत से भी पहले "बात से पहले की बात" से ही दूबे जी ने पाठकों की नब्ज को पकड लिया.
देखने या सुनने में 3 लोगों की कहानी लेकिन पढने के बाद हर पढने वाले की कहानी बन जाती है... क से कहानी सबने बचपन से पढी होगी लेकिन इन्हीं ने च से चाऊमीन खिला दिया...
कहानी शुरू में नार्मल लडके लडकी की लव स्टोरी सी लगती है.लेकिन जैसे-जैसे आगे बढ़ती है तो हर भाग में जिंदगी से ,समाज से, खुद से रुबरु कराने वाला सच लिखा है,जिसे जानते सब हैं लेकिन हमारे लॉजिक से हम मजबूर है.चाहे वो लाइन "पहली बार के बाद हम बस अपने आप को दोहराते हैं हर बार दोहराने में बस पहली बार ढूंढते हैं " या कहानी की अंतिम लाइन "वैसे भी जिंदगी की मंजिल भटकना है कहीं पहुँचना नहीं" झकझोर कर रख देती हैं.
इस किताब ,सॉरी लाइफ मिनींग बुक को पढने के बाद तो जो अब तक किताबों को साफ-सुथरा रखते थे, नाम तक नहीं लिखा ,उन सब ने भी अंडर लाइन करना शुरू कर दिया है.
हर पढने वाले को यह कहानी अपनी लगी क्यों कि एक अच्छी लाइफ के लिए सबने सपने देखने तक छोड़ दिए. जिंदगी को लॉजिकल बना दिया. सपनो को पूरा करने की भी एक कीमत होती है और हर कोई वो कीमत चुका नहीं सकता.
लाइफ का मिनींग सबकी समझ में अलग है.. लेकिन मैं इस बारे में सुधा से सहमत हूँ. "असल में किसी को दूसरे की सारी बाते कभी सही नही लग सकती " इसलिए कुछ लोग सच को न पचा पाए.
मेरे लिए एक लाइन में इस बुक का निष्कर्ष है "Die with your memories, not with your dreams."
और हां दूबे जी ध्यान रखिए कहीं कॉल्स आना शुरू हो जाए कि "आपकी बुक पढ के मेरा बेटा, बेटी, पति या पत्नी मुसाफिर हो लिए सुधा, चंदर या पम्मी बन के "