Librarian Note: There is more than one author by this name in the Goodreads database.
Dushyant Kumar (Hindi: दुष्यन्त कुमार) was a poet of modern Hindi literature. In India, he is generally recognized as one of the foremost Hindi poet during the 20th century. He was also a Dramatist, Litterateur and Gazal writer.
Dushyant Kumar was born at Navada Village of Bijnor District in Uttar Pradesh. He did M.A. with Hindi from Allahabad.
His literary career started at Allahabad. He wrote many dramas, poems, Gazals, short stories. He actively participated in Seminars at Parimal Academy of Literature. He also worked with Naye Patte, an important Indian Newsletter of that time, Akashwani and Rajbhasha Section in Madhya Pradesh. His poetry touches directly to heart. Many new poets are inspired of him like dr. Kumar vishwas, Pushpendra Naagar.
Dushyant Kumar died at the age of 42 on December 31, 1975, but in this short lifespan, he acquired a great accomplishment in the field of Hindi Literature. Only because of him, Ghazal gained popularity in Hindi. Now also his Shers and Ghazals are conned in Literary & Political Programmes.
4.5 This collection of Ghazals is mind blowing amazing. Hindi avatar of Ghalib's kind. Deep and profound and thoughtful and satirical... and magical. Excerpts could be read multiple times! I read the Kindle version... and highlighted more than 50% of the book! Highly recommended for Ghazal lovers.
बहुत ही जबरदस्त!!! मेरी सबसे पसंदीदा ग़ज़ल इस संग्रह की- . हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी, शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में, हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए। . एक और- . भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ आजकल दिल्ली में है ज़ेर-ए-बहस ये मुदद्आ ।
मौत ने तो धर दबोचा एक चीते कि तरह ज़िंदगी ने जब छुआ तो फ़ासला रखकर छुआ ।
गिड़गिड़ाने का यहां कोई असर होता नही पेट भरकर गालियां दो, आह भरकर बददुआ ।
क्या वज़ह है प्यास ज्यादा तेज़ लगती है यहाँ लोग कहते हैं कि पहले इस जगह पर था कुँआ ।
आप दस्ताने पहनकर छू रहे हैं आग को आप के भी ख़ून का रंग हो गया है साँवला ।
इस अंगीठी तक गली से कुछ हवा आने तो दो जब तलक खिलते नहीं ये कोयले देंगे धुँआ ।
दोस्त, अपने मुल्क कि किस्मत पे रंजीदा न हो उनके हाथों में है पिंजरा, उनके पिंजरे में सुआ ।
इस शहर मे वो कोई बारात हो या वारदात अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियाँ।। . kavitakosh. org पर आप पूरी किताब फ्री में पढ़ सकते हैं। और बेहतर मजा लेना हो तो Youtube पर कुमार विश्वाश की आवाज में दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल सुनिये।।
दुष्यंत कुमार का ग़ज़ल संग्रह 'साये में धूप' उस दौर की रचना है जब देश कुछ दशक पहले ही आज़ाद हुआ था, लेकिन राजनीति के प्रति निराशा समाज में और फिर साहित्य में साफ़ झलकने लगी थी। कुछ ऐसी ही भावना अज्ञेय जी के डायरी अंशों के संकलन 'कवि-मन' में भी देखने को मिली थी लेकिन अज्ञेय जी वहाँ अधिक मुखर थे। हिन्दी के साहित्यकारों द्वारा स्वाधीनता संघर्ष में किए गये योगदान – कुछ ने उत्तेजक लेख और कवितयें लिखी थीं और कुछ साहित्यकार तो स्वयं जेल भी गये थे – को देखते हुए उनकी भारतीय सरकार से आशायें भी बहुत थी लेकिन सरकार के काम करने के तरीके और जनता के सरोकारों से कोई मतलब ना दिखाती हुई सरकारों का चित्र हमें ‘70 के दशक के साहित्य में दिखता है। ये भावना आगे आने वाले दशकों में बलवती ही हुई है और शायद इसलिए राजनीतिज्ञ इतने अलोकप्रिय हो गये हैं।
'साये में धूप' की गज़लें उसी दौर की उस हताशा का प्रतिनिधित्व करती हैं। कुछ प्रसिद्ध गज़लें जैसे 'हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए', 'कहाँ तो तय था चरागाँ हर एक घर के लिए' आपने अवश्य ही सुनी होंगी क्योंकि राजनितिक विश्लेषण करते हुए इन गज़लों के माध्यम से नाकामियों को दर्शाया जाता है। दुष्यंत कुमार की गज़लों में ग़रीबों के प्रति सहानुभूति साफ़ झलकती है। उनकी मज़बूरियों को वो अपनी ग़ज़लों में स्थान देते हैं क्योंकि स्वतंत्रता के बाद सरकार से सबसे ज़्यादा किसी वर्ग को उम्मीद थी तो वो इन्हीं को थी। उदाहरण के लिए देखिए - 'ना हो कमीज़ तो पावों से पेट ढँक लेंगे, ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए।' 'ये सारा ज़िस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा मैं सज़दे में नही था, आपको धोखा हुआ होगा।' 'चट्टानों पर खड़ा हुआ तो छाप रह गई पावों की सोचो कितना बोझ उठाकर मैं इन राहों से गुज़रा।'
ऐसा नही है कि 'आम आदमी' की आवाज़ उस समय सिर्फ़ दुष्यंत कुमार जी ने ही उठाई थी। तमाम अन्य साहित्यकारों ने भी इसके लिए आवाज़ उठाई थी, लेकिन ज़्यादातर लोगों ने गद्य में – ज़्यादातर आलोचना या व्यंग – ही किया था। दुष्यंत कुमार इसे ग़ज़लों के रूप में लाकर एक अलग ही आवाज़ दे देते हैं। शाषन व्यवस्था में फैली पंगुता और भ्रष्टाचार को उन्होने इन शेरों के माध्यम से व्यक्त किया है - 'यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियाँ, मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा।' 'भूख है तो सब्र कर, रोटी नहीं तो क्या हुआ, आजकल दिल्ली में है ज़ेरे बहस ये मुद्दआ। ' 'इस सड़क पर इस क़दर कीचड़ बिछी है हर किसी का पाँव घुटने तक सना है।'
दुष्यंत कुमार ने सिर्फ़ जनता की छटपटाहट को ही स्थान दिया हो ऐसा नहीं है। कई ग़ज़लों में आशावादी स्वर रहे हैं। कुछ शेर देखिए - 'एक चिंगारी कहीं से ढूंढ़ लाओ दोस्तों, इस दीये में तेल से भीगी हुई बाती तो है।' 'कैसे आकाश में सुराख़ नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालों यारों।'
दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों के कुछ और रुचिकर अंश यहाँ देखिए - 'मौत ने तो धर दबोचा एक चीते की तरह, ज़िंदगी ने जब छुआ तब फासला रखकर छुआ।' 'सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।' 'मूरत सँवारने में बिगड़ती चली गई, पहले से हो गया है ज़हाँ और भी खराब।'
दुष्यंत जी के लेखन की खासियत है कि इनके लिखे में छिपे अर्थ को ढूँढ़ना पाठक को पूरी तरह उनके कार्य से जोड़े रखता है, और जब वह अर्थ खोज लेता है, खुद के अनुभवों से जोड़कर देखता है, हल्की मुस्कान के साथ दुष्यंत जी की गजलों का जादू उसी ठहराव में बसता है।
*तू किसी रेल सी गुज़रती है* *मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ*
*"मसान"* माझा सर्वात आवडता चित्रपट. चित्रपट बघत असतांना गाण्यात हे शब्द ऐकले आणि कोणी लिहिले आहेत हे शोधले आणि मला हे पुस्तक आणि पर्यायाने दुष्यन्त कुमार सापडले. दुष्यन्त कुमारांचा जन्म उत्तर प्रदेशातील बिजनौर जिल्ह्यातील नवादा गावात झाला होता. त्यांनी अलाहाबादमधून हिंदीमध्ये एम.ए. केली. त्यांच्या साहित्यिक कारकिर्दीची सुरुवात अलाहाबादमध्ये झाली. त्यांनी अनेक नाटके, कविता, गज़ल, लघुकथा लिहिल्या. त्यांनी परिमल साहित्य अकादमीच्या संगोष्ठींमध्ये सक्रियपणे सहभाग घेतला. त्यांनी त्या काळातील एक महत्वाचे भारतीय वृत्तपत्र 'नये पत्ते', आकाशवाणी आणि मध्य प्रदेशातील राजभाषा विभागासोबत देखील काम केले. त्यांची कविता थेट हृदयाला स्पर्श करते. डॉ. कुमार विश्वास, पुष्पेंद्र नागर, मनोज मुंतशीर, वरुण ग्रोव्हर या सारखे अनेक नवीन कवी त्यांच्यापासून प्रेरणा घेतात. दुष्यन्त कुमारांचे निधन ३१ डिसेंबर, १९७५ रोजी वयाच्या अवघ्या ४२ व्या वर्षी झाले, परंतु आपल्या अल्पश्या आयुष्यातच त्यांनी हिंदी साहित्याच्या क्षेत्रात मोठी कामगिरी केली. त्यांच्यामुळे गझलाला हिंदीमध्ये देखील लोकप्रियता मिळाली असे म्हण��ात. आजही त्यांचे शेर आणि गझल साहित्यिक आणि राजकीय कार्यक्रमांमध्ये म्हटले जातात.
दुष्यन्त कुमारचा गझल संग्रह *"साये में धूप"* त्या काळ��तील रचना आहे जेव्हा भारत देश काही दशकांपूर्वीच स्वतंत्र झाला होता, परंतु राजकारणाविषयी निराशा समाजात आणि नंतर साहित्यात स्पष्टपणे दिसू लागली होती. काही प्रसिद्ध गझली जसे *'हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए'*, *'कहाँ तो तय था चरागाँ हर एक घर के लिए'* तुम्ही नक्कीच ऐकल्या असतील कारण राजकीय विश्लेषण करताना या गझलींच्या माध्यमातून अपयशांना दर्शविले जाते. दुष्यन्त कुमारच्या गझलींमध्ये गरिबांबद्दलची सहानुभूती स्पष्टपणे दिसते. उदाहरणार्थ पाहा -
*'ना हो कमीज़ तो पावों से पेट ढँक लेंगे,* *ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए।'*
*'ये सारा ज़िस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा* *मैं सज़दे में नही था, आपको धोखा हुआ होगा।'* वाह क्या बात है - माझा सर्वात आवडता शेर आहे हा!
*'चट्टानों पर खड़ा हुआ तो छाप रह गई पावों की* *सोचो कितना बोझ उठाकर मैं इन राहों से गुज़रा।'*
असे नाही की सामान्य जनतेचा आवाज त्या वेळी फक्त दुष्यन्त कुमारजींनीच उठवला होता. इतर अनेक साहित्यकारांनी देखील लिहीत होते, परंतु बहुतेकांनी गद्यात, पद्यात टीका किंवा व्यंग हे मार्ग निवडले होते. दुष्यन्त कुमार यांनी मात्र हीच खंत गझलींच्या रूपात आणून एक वेगळाच अंदाज व्यक्त केला. शासनव्यवस्थेत पसरलेली पंगुता आणि भ्रष्टाचार त्यांनी या शेरांच्या माध्यमातून व्यक्त केली आहे.
*'यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियाँ,* *मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा।'*
*'भूख है तो सब्र कर, रोटी नहीं तो क्या हुआ,* *आजकल दिल्ली में है ज़ेरे बहस ये मुद्दआ।'*
*'इस सड़क पर इस क़दर कीचड़ बिछी है* *हर किसी का पाँव घुटने तक सना है।'*
दुष्यन्त कुमारजींनी फक्त जनतेच्या हालअपेष्टांना स्थान दिले असे नाही. फक्त नकारात्मक सूर नाही लावलेला त्यांनी. अनेक गझलींमध्ये आशावादी स्वर देखील आहेत. काही शेर पाहा -
*'एक चिंगारी कहीं से ढूंढ़ लाओ दोस्तों,* *इस दीये में तेल से भीगी हुई बाती तो है।'*
*'कैसे आकाश में सुराख़ नहीं हो सकता,* *एक पत्थर तो तबीयत से उछालों यारों।'*
दुष्यन्त कुमारजींच्या गझलींचे आणखी काही रुचकर आणि मला आवडलेले अंश -
*'मौत ने तो धर दबोचा एक चीते की तरह,* *ज़िंदगी ने जब छुआ तब फासला रखकर छुआ।'*
*'सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं* *मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।'*
*'मूरत सँवारने में बिगड़ती चली गई,* *पहले से हो गया है ज़हाँ और भी खराब।'*
दुष्यन्त कुमारजींच्या लेखनाची विशेषता अशी आहे की त्यांच्या लिखाणात लपलेला अर्थ शोधण्यात एक वेगळीच मज्जा आहे, आणि जेव्हा तो अर्थ आपण शोधून काढतो, स्वतःच्या अनुभवांशी जोडून पाहतो, तेव्हा एका हलक्या हास्याबरोबर दुष्यन्त कुमारजींच्या गझलींचा जादू आणि त्यातला ठहराव आपोआपच आपल्या मनाचा ठाव घेते. त्यांना वाचतांना साहिर लुधियानवींचा सतत भास होतो. अशांतता आणि बंडखोरी दुष्यन्त कुमारांच्या शब्दांतून स्पष्टपणे बाहेर पडते. त्यांच्या शब्दांची आग आपल्या हृदयात देखील एक ठिणगी पेटवून जाते. मी जेव्हा ह्या ओळी वाचल्या तेव्हा या ओळींच्या प्रेमात पडलो:
*कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए,* *मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिंदुस्तान है।*
*रह—रह आँखों में चुभती है पथ की निर्जन दोपहरी* *खैर, आगे और बढ़ें तो शायद दृश्य सुहाने आएँगे*
दुष्यन्त कुमारजींने जे आपल्या ह्या पुस्तकाच्या शेवटी खूप छान लिहिले आहे. मला राहवले नाही म्हणून इथे टाकत आहे:
जिंदगी में कभी-कभी ऐसा दौर आता है जब तकलीफ गुनगुनाहट के रास्ते बाहर आना चाहती है ! उसमे फंसकर गेम-जाना और गेम-दौरां तक एक हो जाते हैं ! ये गजलें दरअसल ऐसे ही एक दौर की देन हैं ! यहाँ मैं साफ़ कर दूँ कि गजल मुझ पर नाजिल नहीं हुई ! मैं पिछले पच्चीस वर्षों से इसे सुनता और पसंद करता आया हूँ और मैंने कभी चोरी-छिपे इसमें हाथ भी आजमाया है ! लेकिन गजल लिखने या कहने के पीछे एक जिज्ञासा अक्सर मुझे तंग करती रही है और वह है कि भारतीय कवियों में सबसे प्रखर अनुभूति के कवि मिर्जा ग़ालिब ने अपनी पीड़ा की अभिव्यक्ति के लिए गजल का माध्यम ही क्यों चुना ? और अगर गजल के माध्यम से ग़ालिब अपनी निजी तकलीफ को इतना सार्वजानिक बना सकते हैं तो मेरी दुहरी तकलीफ (जो व्यक्तिगत भी है और सामाजिक भी) इस माध्यम के सहारे एक अपेक्षाकृत व्यापक पाठक वर्ग तक क्यों नहीं पहुँच सकती ? मुझे अपने बारे में कभी मुगालते नहीं रहे ! मैं मानता हूँ, मैं ग़ालिब नहीं हूँ ! उस प्रतिभा का शतांश भी शायद मुझमें नहीं है ! लेकिन मैं यह नहीं मानता कि मेरी तकलीफ ग़ालिब से कम हैं या मैंने उसे कम शिद्दत से महसूस किया है ! हो सकता है, अपनी-अपनी पीड़ा को लेकर हर आदमी को यह वहम होता हो...लेकिन इतिहास मुझसे जुडी हुई मेरे समय की तकलीफ का गवाह खुद है ! बस...अनुभूति की इसी जरा-सी पूँजी के सहारे मैं उस्तादों और महारथियों के अखाड़े में उतर पड़ा !
हे एक उत्कृष्ट कविता व गझलांचे छोटेसे पुस्तक आहे. आपण सगळ्यांनी जरूर वाचा आणि लोकांपर्यंत पोचावा.
This is my first ever ghazal read. And he had me at,
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी, शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में, हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।
Reading him felt like reading Sahir Ludhianvi. The agitation and rebellion comes out clearly, strongly through Dushyant Kumar's words. I felt a fire burning in my heart. I fell irrevocably in love with these lines-
एक जंगल है तेरी आंखों में मैं जहां राह भूल जाता हूं तू किसी रेल-सी गुज़रती है, मैं किसी पुल-सा थरथराता हूं।
Wonderfully summed. This is a brilliant poetry cum ghazal book.
I've read one of the ghazals(the titular one) in my Hindi textbook in class XII. And I absolutely loved it.
"Kahan toh tay tha chiraagaan har ek ghar ke liye, Kahaan chiraag mayassar nahi sheher ke liye. ........ Na ho kameez toh pairon se pait dhak lenge, Yeh log kitne munasib hain is safar ke liye. ........ Yahan darakhton ke saaye me dhoop lagti hai, Chalo yahan se chalein aur umra bhar ke liye. ........ Jiyein toh apni galiyon me gulmohar ke tale, Marein toh gair ki galiyon me gulmohar ke liye."
These are a few lines, not in the correct order probably. But I love the thing. :)
जिस किताब के ६३ संस्करण आये हो, एक छोटी सी ग़ज़ल संग्रह की, उसके बारे में क्या लिखा जाए? पर हर रचना जमी हो वैसी बात तो नहीं है| पर जो जमी हैं वह जन चेतना में हैं, कर तीसरे दिन उद्धरित होती हैं| हर बार थका आदमी उढ़ाता है यहाँ से चार लाइनें| हताशा को शब्द मिलते हैं, आपके प्रश्नों को संगरचना मिलती है|
There is nothing to say. The Ghazal is an art form and Dushyant Kumar writes not as an artist but as a fan of the art. He loves to twist the poetry and create effects that remain forever. So many of the modern day slogans and poems are written on Dushyant Kumar's poetic foundations. Enjoy 64 pages of pure gold!
"वो किसी रेल सी गुज़रती है, मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ."
'साये में धूप' दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों का एक क्रांतिकारी संग्रह है जिसमें राजनीतिक आक्रोश व सामाजिक विषमतायें प्रमुख हैं| इस संग्रह से उन्होंने हिंदी ग़ज़लों का एक नया आयाम स्थापित किया है|
The best poet of recent times who not only write about love and romance. But rather use literature to make people aware about the times they are living in. He asks people to question their own nature.
He writes in hindi-urdu mix, just like current generations speaks the two language. Manoj muntashir has created an extract video about this book on his YT channel.He recited few poem (the best ones) in that video. Which is divided in two parts.
A must recommended book for someone who wants to read hindi poetry beyond love and romance. Who wants to read hindi poetry as a medium of expression.
Hindi sabki ho sakti hai, lekin Koi Dusra Dushyant Kumar nahi ho sakta.
कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए, मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिंदुस्तान है। Itni bebabki se agar koi likh sakta hai, aur vo saral tareeke se, to keval dushyant kumar hi hain, aur koi nahi.
"लम्बी सुरंग सी है तेरी जिंदगी तो बोल, मैं जिस जगह खड़ा हूं वहां है कोई सिरा ? "
And
"इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है नाव जर्जर ही सही लहरों से टकराती तो है ।"
For me, these are the best lines in the book. Having never read any of the renowned hindi poets, I found most of the pages difficult to comprehend as the words used are from Urdu and Hindi family both. However, I enjoyed reading it and would recommend every poet to read it.
तू किसी रेल-सी गुज़रती है मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ
Such an absolute pleasure it was reading every single word portrayed in the book.
You have gotta read this book without a miss if you are into poem and prose, especially vibrant Hindi kavitayen. It's going to leave you amazed.
Allow yourself a wonderful journey through Dushyant Kumar's realm.
This is something, if you will re-read again and again, the chances are that you will end up finding more meaning each time you go through the same lines.
He is what I would refer as a sharp poet. His lines would remain relevant throughout the time. He is different for sure, poetical in a different way and his lines would go down to your heart for sure.
Dushyant Kumar has a different aggressive style of writing.The problems surmounting political class penetrate a deep and profound grief in his poems. There is no way a better poet than him in jotting down such beautiful revolutionary poems.
कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए
These are the first two lines from the first poem in this book and these lines have got me struck and think . Poet Dusyant Kumar was indeed and exraordinarry poet, who wrote with such an ease and so casually as if someone is just talking to you. In the foreword of this book he has written he wanted to get Hindi and Urdu closer, and this gets reflected in each and every peom and gazal. I feel language is like God, we humans have created it and divided it as per our requirement and ease and understanding. Urdu and Hindi when used together so greatly compliment each other and this is what i felt after reading each and piece by Dusyant Kumar. Few lines from the foreword.
—कि उर्दू और हिन्दी अपने—अपने सिंहासन से उतरकर जब आम आदमी के बीच आती हैं तो उनमें फ़र्क़ कर पाना बड़ा मुश्किल होता है. मेरी नीयत और कोशिश यही रही है कि इन दोनों भाषाओं को ज़्यादा से ज़्यादा क़रीब ला सकूँ. इसलिए ये ग़ज़लें उस भाषा में लिखी गई हैं जिसे मैं बोलता हूँ.....
हाथों में अंगारों को लिए सोच रहा था, कोई मुझे अंगारों की तासीर बताए. —दुष्यन्त कुमार
So, to all those who want to read good poetry in hindi, read this, it gives the word to those feelings which we feel inside, I am sure the feeling might be related to anything but you will be able to equate it from one or the other poem.
यहाँ में इस पुस्तक के बारे में किसी भी प्रकार की समीक्षा नहि कर रहा हूँ। ये बस मेरे अपने विचार हे जो में लोगों से साझा करना चाहता हूँ।
1975 में इस पुस्तक का पहला संस्करण छपा था ओर अभी अप्रेल 2021 में इसका 71 वाँ संस्करण छपा हे। क़रीब 60 पन्नो के इस ग़ज़ल संग्रह को 46 साल में 71 बार छापना पड़ा। अब आप समझ सकते हे के इसके बारे में लिखना क्यू मुश्किल हे।
हालाँकि मेरी मातृभाषा गुजराती हे, पर में सबसे ज़्यादा हिंदी साहित्य पढ़ता हूँ। हिंदी साहित्य के प्रत्ये पहले से ही मेरा जुड़ाव ज़्यादा रहा हे। मैंने जब दुष्यंत कुमार जी के बारे में पहली बार श्री Manoj Bajpayee जी से एक youtube विडीओ में सुना था तभी "साये में धूप" पढ़ने का फ़ेसला कर लिया था। हाल ही में मैंने श्री Manoj Muntashir द्वारा गाए गए इस ग़ज़ल संग्रह के कुछ अंश भी सुने। जो बहोत ही लाजवाब हे।
“कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए, मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिंदुस्तान है।”
दुष्यंत कुमार जी आज़ादी के बाद के उन कवियों में गिने जाते हे जिन्होंने आज़ाद भारत में पनपती सामाजिक अव्यवस्था, ग़रीबी ओर आज़ादी पाते ही सुन्न हो चुके लोगों के ह्रदय ओर मस्तिष्क पर बड़ी बेबाक़ी, कुशलता ओर खुलेपन से लिखा। उनकी लेखनी में समाज के लिए चिंता हे, बैचेनि हे, बेलौस मस्ती हे।
मुजे दुष्यंत कुमार जी की लेखनी की सबसे अहम ओर ख़ास बात यह लगती हे की, में हर बार इनकी ग़ज़ल के अर्थ को समजने की कोशिश करते हुवे अपने आप को उस ग़ज़ल से जोड़ लेता हूँ। मुजे लगता हे के ये शायद मेरे ही अनुभवो को बयान कर रहे हे। इन्���ोंने बड़े ही नायाब तरीक़े से हिंदी और उर्दू का मिलनसार किया हैं।
इस ग़ज़ल संग्रह को पढ़े हुए बहुत समय बीत गया पर आज तक कभी इसके बारे में अपने ख़याल व्यक्त करने का मोका नहि मिला।
आज अचानक से इस संग्रह की कुछ पंक्तिया सामने आयी ओर आज हिंदी दिवस भी हे। “साये में धूप" के बारे में लिखने का इससे सुनहरा मोका ओर कोई हो ही नहि सकता।
"साये में धूप" मेरी उन चुनिंदा पुस्तकों में से एक है जिसे बार बार पढ़ने के बाद भी एक और बार पढ़ने का मन करता है।
अंत में दुष्यंत कुमार जी के संग्रह में से मेरी सबसे पसंदीदा पंक्तियो के साथ छोड़े जा रहा हूँ।
“वो किसी रेल सी गुज़रती है, मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ।”
ओर
“कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों।”
दुष्यंत हिन्दी गज़ल की प्रथा को महान बनाने वाले कवी हैं।
I feel this book is a gem in the genre of Hindi-Ghazal poetry. the voice is unflinching, the emotions are screaming to come out... Dushyant has put together some of his most restless emotions , towards the degradationof society, towards 1970s politics, towards the general condition of masses , in this finely crafted piece.
"कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं " -- a revolt can not be summed up better than this.
Another Sher in the same ghazal, speaks about the descend of Man...and we couldn't agree more.. अब नई तहज़ीब के पेशे-नज़र हम आदमी को भूल कर खाने लगे हैं
it is difficult to quote all the ghazals in this book, but every Ghazal beckons to be read and pondered upon.
Simply put, this is Dushyant kumar at this life's best..
"बाढ़ की संभावनाएँ सामने हैं, और नदियों के किनारे घर बने हैं ।
चीड़-वन में आँधियों की बात मत कर, इन दरख्तों के बहुत नाजुक तने हैं ।
इस तरह टूटे हुए चेहरे नहीं हैं, जिस तरह टूटे हुए ये आइने हैं
आपके कालीन देखेंगे किसी दिन, इस समय तो पाँव कीचड़ में सने हैं ।"
इन दिनों दुष्यंत कुमार बहुत याद आते हैं। सत्ता का दुरूपयोग जब जब होगा तो दुष्यंत कुमार याद आएंगे। जब जब रीढ़विहीन होकर आईने टूट जाएँगे तब तब दुष्यंत याद आएंगे। बस और दुष्यंत नही आएंगे।
अपनी भाषा के चुनाव से लेके अपनी ग़ज़लों तक मे विद्रोह को चुनते हैं पर उनकी हर ग़ज़ल में उस थकान की छलक साफ झलकती है जो मन के रोज़ दुखने से शब्दों में गुनगुनाती हुई बदल जाती है।
न हिंदी न उर्दू, अपनी आम बोली कि भाषा मे ग़ज़ल कहने वाले दुष्यंत की हर ग़ज़ल एक रेल सी गुजरेगी और पाठक पुल सा थार्थरायेगा ।
It's been a few months that I am focusing on reading more Hindi books. Earlier, I used to read just few lines and that's that. Reading, Dushyant Kumar gives me more reasons to continue exploring Hindi/Urdu languages book. Coming to this book, Saaye Mein Dhoop is a collection of Dushyant Kumar's ghazals. The concept ranges from political, religion, romantic love, life and so on. The poems are immensely beautiful but because of so many Urdu words, they were a little difficult to understand. But overall, I loved the book so so so much. It's one of most highlighted books ever