अमर कहानियों के रचयिता आचार्य चतुरसेन हिन्दी कथा - साहित्य के अद्वितीय कथा - शिल्पी के रूप में जाने जाते हैं। उनकी कहानियां और उपन्यास हिन्दी साहित्य के इतिहास की अमूल्य धरोहर हैं। आचार्य चतुरसेन ने बत्तीस उपन्यास और लगभग 450 कहानियां लिखीं। उन्होंने अनेक नाटकों के अतिरिक्त विविध विषयों पर भी लेखन - कार्य किया। इस तरह उनकी प्रकाशित कृतियों की संख्या 186 है। उनका कथा - साहित्य तो निश्चय ही गर्व का विषय है। आधुनिक युग के सर्वश्रेष्ठ गल्पकार आचार्य चतुरसेन की सम्पूर्ण कहानियों को सिलसिलेवार एक साथ प्रकाशित करने की योजना के अन्तर्गत 5 भागों में संकलित किया गया है। इन संकलनों की यह विशेषता है कि ये कहानियां सर्वथा प्रामाणिक मूल - पाठ हैं, जो सभी पाठकों के साथ - साथ हिन्दी कहानियों के अध्येताओं और शोधार्थियों के लिए भी मह्त्वपूर्ण हैं। ‘बाहर - भीतर’ सम्पूर्ण कहानियों की श्रृंखला की पहली कड़ी है। इसमें 18 कहानियां दी गई हैं, जो चतुरसेन के लेखन के शिखर को रेखांकित करती हैं
आचार्य चतुरसेन शास्त्री का जन्म 26 अगस्त, 1891 को चांदोख ज़िला बुलन्दशहर, उत्तर प्रदेश में हुआ था। ऐतिहासिक उपन्यासकार के रूप में इनकी प्रतिष्ठा है। चतुरसेन शास्त्री की यह विशेषता है कि उन्होंने उपन्यासों के अलावा और भी बहुत कुछ लिखा है, कहानियाँ लिखी हैं, जिनकी संख्या प्राय: साढ़े चार सौ है। गद्य-काव्य, धर्म, राजनीति, इतिहास, समाजशास्त्र के साथ-साथ स्वास्थ्य एवं चिकित्सा पर भी उन्होंने अधिकारपूर्वक लिखा है।
इनकी प्रकाशित रचनाओं की संख्या 186 है, जो अपने ही में एक कीर्तिमान है। आचार्य चतुरसेन मुख्यत: अपने उपन्यासों के लिए चर्चित रहे हैं। इनके प्रमुख उपन्यासों के नाम हैं-
वैशाली की नगरवधू वयं रक्षाम सोमनाथ मन्दिर की नर्तकी रक्त की प्यास सोना और ख़ून (चार भागों में) आलमगीर सह्यद्रि की चट्टानें अमर सिंह हृदय की परख