पुस्तक - नाकोहस
लेखक - पुरुषोत्तम अग्रवाल
प्रकाशन वर्ष - १जनवरी २०१६
पुरुषोत्तम अग्रवाल ने वर्तमान भारत के राजनीतिक एवं सामाजिक संघर्ष के वास्तविकता और असंतोष को दुःस्थान उपन्यास (डायस्टोपियन नॉवेल)के माध्यम से प्रदर्शित किया हैं।
इतनी सेंटीमेंटल है हमारी जनता और प्रजातांत्रिक सरकार जो रंगों, सड़के एवं बिल्डिंग के नाम से आहत हो जाती हैं ।
यहां तक कि सिर्फ कार्टून बनाने से तथाकथित लोगों ने बारह लोगों की हत्या कर दी। (शार्ली एब्दो प्रकरण)
जड़ से उजड़े व्यक्तियों (अपरूटेड) का सामना जड़
बुद्धि व्यक्तियों से होता हैं।
कहानी हैं सुकेत रघु और शम्स निर्भीक बुद्धिजीवि हैं जो अपनी दूरदृष्टी, वाकपटुता, और व्यवहार कुशल सहयोगियों के बीच हंसमुख स्वभाव के है।उपन्यास भाषण की स्वतंत्रता, सेंसरशिप और अनियंत्रित शक्ति के खतरों के विषयों की विवेचना करता है।
इन्हें यूनिवर्सिटी रिटायर्ड प्रोफेसर त्रिपाठी ने सलाह दी हैं कि ऑलवेज बी ऑन ए राइट साइड ऑफ दि हर्ट सेंटीमेंट ।
सुकेत और उसके मित्र रघु और शम्स समाज में मौजूद हर प्रकार के नीति( उपनिवेशवाद, समाजवाद, पश्चिमी मीडिया का प्रभाव, फासीवाद, इस्लामोफोबिया)पर अपने विचार खुल कर रखते हैं।
शरणार्थियों(आदिवासी, कश्मीरी, दलित) के विषय में बात करने पर नर पुंगव द्वारा देशद्रोही कहा जाना, पीटा जाना, धमकियां देना और विभिन्न व्यंजनों से विभूषित किया जाता हैं।
सुकेश कहता है खुद पर हँसते रहने से मौत का डर भी कम हो जाता हैं और जिंदगी का डर भी ।
सुकेश और उसके साथीयों ने १९८४ के दंगों को काफी करीब से देखा था या ये कहे कि इन दंगों को, सरकार की नाकामियों को, हजारों शरणार्थि को जो अपने ही शहर के किसी कोनो में खुले मैदानों में शरण लेने पर मजबूर थे उनके दर्द को जिया था।
लेखक ने १९८४ के दंगे, २००२ का गोधरा कांड उसके बाद होने वाले सांप्रदायिक दंगे, भोपाल गैस त्रासदी जैसे दुर्घटनाओं को अपने कहानी के पात्रों से जोड़ दिया है।
पुरुषोत्तम अग्रवाल के उपन्यास केंद्र में हैं एक भयावह सरकारी संगठन, नेशनल कमीशन फॉर हर्ट सेंटीमेंट्स (नाकोहस)एक सर्वज्ञ समूह है जो अंधेरे में प्रशिक्षित है। यह समूह, स्पष्ट रूप से छिपा हुआ हैं और एक खतरनाक गिरगिट (शाब्दिक रूप से) प्रवक्ता द्वारा और कुछ गुप्त संचालको के द्वारा चलया जाता है, इस समूह के सदस्य मन-पढ़ने और अदृश्य यातनाएं देने का आनंद लेते है, यह संस्था उन सभी बुद्धिजीवियों (सुकेत और उसके मित्र रघु और शम्स को) "सुधारने" के लिए प्रेरित करता है जो अभी भी स्वतंत्र विचार करने में सक्षम हैं और सरकार विरोधी हैं।
सत्तावादी सरकार के द्वारा इतिहास को मिटाना नए सत्य को गढ़ना , निजता का हनन उपन्यास के केंद्र में मौजूद रहते हैं।
लेखक नाकोहास प्रवक्ता के माध्यम से कहता हैं की अगर इस समाज में बने रहना है तो बाकी फालतू चीजों को निकालो दिमाग से वो इतिहास, वो सोच, वो फलसफा ऑल ब्लडी नॉनसेंस,
'कला वही जो दिल बहलाए' 'साहित्य वही जो मौज कराए' 'चिन्तन वही जो झट चेतन कर जाए' 'लेखन वही जो फट पल्ले पड़ जाए' अक्ल से काम लो अक्ल से।
पुरुषोत्तम अग्रवाल का नाकोहस दुःस्थानता उपन्यास है (१९८४- जॉर्ज ऑरवेल डायस्टोपियन फिक्शन का अच्छा विकल्प हैं) जिसे पढ़ने के लिए कुछ ज्यादा ही एकाग्रता की आवश्यकता हैं क्योंकि यह उपन्यास वास्तविकता और दुःस्थानता के इधर उधर बेहद ही महीन अंतर से चलती रहती हैं ।
हास्य व्यंग, और कल्पनाओं का जम कर प्रयोग किया गया हैं। भारतीय साहित्य एवं ऐतिहासिक घटनाओं से संबंधित रचनाओं को उदाहरण के तौर पर कई बार पेश किया गया हैं ।
पुरुषोत्तम अग्रवाल ने अपने पात्रों को दुःस्थानता के अंधकार में डाल कर भारतीय राजनीति और समाज के भविष्य को सुनहरा सवेरा दिखाने का प्रयास किया हैं।
वर्तमान में कसे जा रहे राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक फंदों को समझने के लिए यह उपन्यास सभी को अवश्य पढ़ना चाहिए।