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नाकोहस

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'किस दुनिया के सपने देखे, किस दुनिया तक पहुंचे...' इन बढ़ते, घुटन-भरे अंधेरों के बीच रोशनी की कहीं कोई गुंजाइश बची है क्या ? इसी सवाल से जूझते हमारे तीनों नायक-सुकेत, रघु और शम्स-कहाँ पहुंचे... "तीनों? करुणा क्यों नहीं याद आती तुम्हें? औरत है ! इसलिए?" नकोहस तुम्हारी जानकारी में हो या न हो, तुम्हारे पर्यावरण में है... टीवी ऑफ़ क्यों नहीं हो रहा ? सोफे पर अधलेटे से पड़े सुकेत ने सीधे बैठ कर हाथ में पकडे रिमोट को टीवी की ऐन सीध में कर जोर से ऑफ़ बटन दबाया...बेकार...वह उठा, टीवी के करीब पहुँच पावर स्विच ऑफ किया... हर दीवार जैसे भीमकाय टीवी स्क्रीन में बदल गई है, कह रही है : "वह एक टीवी बंद कर भी दोगे, प्यारे...तो क्या...हम तो हैं न..." टीवी भी चल रहा है... और दीवारों पर रंगों के थक्के भी लगातार नाच रहे हैं...सुकेत फिर से टीवी के सामने के सोफे पर वैसा ही...बेजान... टीवी वालों को फोन करना होगा ! कम्प्लेंट कैसे समझाऊंगा? लोगों के सेट चल कर नहीं देते, यह सेट साला टल कर नहीं दे रहा...

164 pages, Kindle Edition

Published January 1, 2016

17 people are currently reading
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About the author

Purushottam Agarwal

11 books7 followers
पुरुषोत्तम अग्रवाल की पुस्तक 'अकथ कहानी प्रेम की : कबीर की कविता और उनका समय' भक्ति-सम्बन्धी विमर्श में अनिवार्य ग्रन्थ का दर्जा हासिल कर चुकी है !

उनकी पिछले कुछ वर्षों में प्रकाशित कहानियाँ जीवंत और विचारोत्तेजक चर्चा के केंद्र में रही हैं, जिनमे शामिल हैं, 'चेंग-चुई', 'चौराहे पर पुतला', 'पैरघंटी', 'पान पत्ते की गोठ' और 'उदासी का कोना' !

'नकोहस' उनका पहला उपन्यास है !

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1 star
3 (15%)
Displaying 1 - 5 of 5 reviews
1 review
February 27, 2017
Waste of time

Book is not interesting .So read only if you are having plenty of time to waste.sorry but this is true
Profile Image for Rudra .
18 reviews
June 16, 2025
पुस्तक - नाकोहस
लेखक - पुरुषोत्तम अग्रवाल
प्रकाशन वर्ष - १जनवरी २०१६

पुरुषोत्तम अग्रवाल ने वर्तमान भारत के राजनीतिक एवं सामाजिक संघर्ष के वास्तविकता और असंतोष को दुःस्थान उपन्यास (डायस्टोपियन नॉवेल)के माध्यम से प्रदर्शित किया हैं।

इतनी सेंटीमेंटल है हमारी जनता और प्रजातांत्रिक सरकार जो रंगों, सड़के एवं बिल्डिंग के नाम से आहत हो जाती हैं ।
यहां तक कि सिर्फ कार्टून बनाने से तथाकथित लोगों ने बारह लोगों की हत्या कर दी। (शार्ली एब्दो प्रकरण)
जड़ से उजड़े व्यक्तियों (अपरूटेड) का सामना जड़
बुद्धि व्यक्तियों से होता हैं।
कहानी हैं सुकेत रघु और शम्स निर्भीक बुद्धिजीवि हैं जो अपनी दूरदृष्टी, वाकपटुता, और व्यवहार कुशल सहयोगियों के बीच हंसमुख स्वभाव के है।उपन्यास भाषण की स्वतंत्रता, सेंसरशिप और अनियंत्रित शक्ति के खतरों के विषयों की विवेचना करता है।
इन्हें यूनिवर्सिटी रिटायर्ड प्रोफेसर त्रिपाठी ने सलाह दी हैं कि ऑलवेज बी ऑन ए राइट साइड ऑफ दि हर्ट सेंटीमेंट ।
सुकेत और उसके मित्र रघु और शम्स समाज में मौजूद हर प्रकार के नीति( उपनिवेशवाद, समाजवाद, पश्चिमी मीडिया का प्रभाव, फासीवाद, इस्लामोफोबिया)पर अपने विचार खुल कर रखते हैं।
शरणार्थियों(आदिवासी, कश्मीरी, दलित) के विषय में बात करने पर नर पुंगव द्वारा देशद्रोही कहा जाना, पीटा जाना, धमकियां देना और विभिन्न व्यंजनों से विभूषित किया जाता हैं।
सुकेश कहता है खुद पर हँसते रहने से मौत का डर भी कम हो जाता हैं और जिंदगी का डर भी ।
सुकेश और उसके साथीयों ने १९८४ के दंगों को काफी करीब से देखा था या ये कहे कि इन दंगों को, सरकार की नाकामियों को, हजारों शरणार्थि को जो अपने ही शहर के किसी कोनो में खुले मैदानों में शरण लेने पर मजबूर थे उनके दर्द को जिया था।
लेखक ने १९८४ के दंगे, २००२ का गोधरा कांड उसके बाद होने वाले सांप्रदायिक दंगे, भोपाल गैस त्रासदी जैसे दुर्घटनाओं को अपने कहानी के पात्रों से जोड़ दिया है।
पुरुषोत्तम अग्रवाल के उपन्यास केंद्र में हैं एक भयावह सरकारी संगठन, नेशनल कमीशन फॉर हर्ट सेंटीमेंट्स (नाकोहस)एक सर्वज्ञ समूह है जो अंधेरे में प्रशिक्षित है। यह समूह, स्पष्ट रूप से छिपा हुआ हैं और एक खतरनाक गिरगिट (शाब्दिक रूप से) प्रवक्ता द्वारा और कुछ गुप्त संचालको के द्वारा चलया जाता है, इस समूह के सदस्य मन-पढ़ने और अदृश्य यातनाएं देने का आनंद लेते है, यह संस्था उन सभी बुद्धिजीवियों (सुकेत और उसके मित्र रघु और शम्स को) "सुधारने" के लिए प्रेरित करता है जो अभी भी स्वतंत्र विचार करने में सक्षम हैं और सरकार विरोधी हैं।
सत्तावादी सरकार के द्वारा इतिहास को मिटाना नए सत्य को गढ़ना , निजता का हनन उपन्यास के केंद्र में मौजूद रहते हैं।
लेखक नाकोहास प्रवक्ता के माध्यम से कहता हैं की अगर इस समाज में बने रहना है तो बाकी फालतू चीजों को निकालो दिमाग से वो इतिहास, वो सोच, वो फलसफा ऑल ब्लडी नॉनसेंस,
'कला वही जो दिल बहलाए' 'साहित्य वही जो मौज कराए' 'चिन्तन वही जो झट चेतन कर जाए' 'लेखन वही जो फट पल्ले पड़ जाए' अक्ल से काम लो अक्ल से।

पुरुषोत्तम अग्रवाल का नाकोहस दुःस्थानता उपन्यास है (१९८४- जॉर्ज ऑरवेल डायस्टोपियन फिक्शन का अच्छा विकल्प हैं) जिसे पढ़ने के लिए कुछ ज्यादा ही एकाग्रता की आवश्यकता हैं क्योंकि यह उपन्यास वास्तविकता और दुःस्थानता के इधर उधर बेहद ही महीन अंतर से चलती रहती हैं ।
हास्य व्यंग, और कल्पनाओं का जम कर प्रयोग किया गया हैं। भारतीय साहित्य एवं ऐतिहासिक घटनाओं से संबंधित रचनाओं को उदाहरण के तौर पर कई बार पेश किया गया हैं ।
पुरुषोत्तम अग्रवाल ने अपने पात्रों को दुःस्थानता के अंधकार में डाल कर भारतीय राजनीति और समाज के भविष्य को सुनहरा सवेरा दिखाने का प्रयास किया हैं।
वर्तमान में कसे जा रहे राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक फंदों को समझने के लिए यह उपन्यास सभी को अवश्य पढ़ना चाहिए।
Profile Image for Animesh Priyadarshi.
43 reviews3 followers
September 27, 2022
#NaCoHuS
#National_Commission_of_Hurt_Sentiments

“अभी बेसिक्स तो समझ ही लो…देखो, पहले तो खोपड़ी में सही समझ के लिए जगह बनाओ, फेंको फालतू चीजें यार, निकालो दिमाग़ से…यह याद, वह इतिहास, यह सोच, वह फलसफा, ऑल ब्लडी नॉनसेंस…सीधी-सी बात…कला वही जो दिल बहलाए, साहित्य वही जो मौज कराए…फट से पल्ले पड़ जाए…अक्ल से काम लो—जिस चीज की कोई इमीजिएट यूज-वैल्यू नहीं, उसकी बस थ्रो-वैल्यू होती है…चाहे कोई कमोडिटी हो, चाहे मेमोरी। होना क्या है तुम्हारे इस साले आर्ट-फार्ट से…”

“मैं ईसाई घर में जन्मा, इसीलिए ईसाई मिशनरियों की हरकतों का जिम्मेवार भी हो गया? मैं तो नहीं कहता कि महज हिन्दू होने के कारण आप उन्नीस सौ चौरासी के लिए भी जिम्मेवार हैं, और दो हजार दो के लिए भी…”

ये सब आर्ग्युमेंट कुछ सुना-सुना सा लगता है ना? अगर नहीं तो आप आज के समय के भारतवर्ष को घंटा जानते हैं? आज के “राष्ट्रवादी भारतीयों” की भावनाओं और अकाट्य तर्कों से अपनी "नाकोहसी बुद्धि" के विकास के लिए ज़रूर पढ़ें, 'नाकोहस'! और अगर न मानें, तो भेजते हैं आपके घर भी दो - चार 'बौनैसर' तभी आपका दिमाग ठिकाने पर आएगा। हाँ नहीं तो!?

यह उपन्यास हिंदी में नयी है, हाँ Orwell के १९८४ की याद गाहे-बगाहे अवश्य दिलाती रहती है। समाज की परिस्थितियों से दुःखी इंसान यदि हैं आप तो आपको यह अपनी ही कहानी लगेगी, मेरा दावा है जैसा मुझे लगा। यह उपन्यास आपको पूरी तरह से सन्न नहीं करती वरन कुछ आपका बख़्श देती है कि आप मरणासन्न हो जाते हैं! १९८४ में Orwell साहब ने अपने पाठकों पर यह दया बिल्कुल नहीं दिखलायी थी। कथा कभी भी बोझिल नहीं होती बल्कि आपके मन में यह भाव रह जाता है कि इसमें स्त्री पक्ष की कमी है। तीन कोनों में खड़े “सुकेत” “शम्स” और “रघु” की जगह पर चौथे कोन में खड़ी “करुणा” की कमी खलती है! धर्म या सम्प्रदाय यदि केंद्र में है - शोषण के आधार में तो फिर लिंग भी तो है! स्त्री भी तो शोषित है, उसका पक्ष न होना मुझे सबसे ज़्यादा खलता है।

मेरी राय यह है कि हिंदी के पाठकों को यह किताब बिल्कुल ही मिस नहीं करनी चाहिये! आपको एक नयी दृष्टि के बरक्स खड़ा करती है यह रचना।

थैंक यू!
This entire review has been hidden because of spoilers.
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