अक्टूबर जंक्शन से शुरू होकर आग और पानी से होते हुए मैं एक बार फिर पहुँचा अस्सी घाट... वही घाट जहाँ गंगा की लहरों में भांग घुली होती है, जहाँ गालियाँ भी प्रेम की भाषा होती हैं, और जहाँ पप्पू की चाय दुकान किसी संसद से कम नहीं। यही से शुरू होती है काशीनाथ सिंह के उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ की असली यात्रा।
यह उपन्यास केवल एक साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि 1990 के दशक के बनारस और उससे भी बड़े सामाजिक परिवेश का जीवंत दस्तावेज़ है। यह वह समय था जब भारत मंडल आयोग की सिफारिशों, राम जन्मभूमि आंदोलन, बाबरी मस्जिद विध्वंस और भूमंडलीकरण जैसे गहरे सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक बदलावों से गुजर रहा था। इन तमाम घटनाओं का असर केवल दिल्ली या लखनऊ तक सीमित नहीं था, बल्कि बनारस के अस्सी जैसे छोटे मोहल्लों तक भी पहुँचा था। लेखक ने इन्हीं बदलावों की धड़कन को पन्नों पर उतारा है, न तो किसी डर से बचते हुए, न ही शुद्धता की झूठी चादर ओढ़कर।
उपन्यास की शुरुआत में ही लेखक साफ कह देते हैं कि यह किताब उन लोगों के लिए नहीं है जो शुद्ध भाषा, शुद्ध विचार और शुद्ध चरित्र की तलाश में रहते हैं। क्योंकि यहाँ श्लोक भी मिलेगा, और गाली भी और बनारस में दोनों ही अपनी-अपनी जगह पूज्य हैं।
‘काशी का अस्सी’ के पात्र उपन्यास के नहीं, बल्कि मोहल्ले के हैं, इतने असली कि लगे जैसे अभी घाट से आकर सामने बैठ गए हों। गया सिंह, जो बनारसी ठसक का प्रतिनिधि हैं; तन्नी गुरु, जो गाली देते हुए भी जीवनदर्शन सिखा जाते हैं; रामजी राय, जिनकी गंभीरता में विचारों की गहराई है; और पप्पू, जिसकी चाय की दुकान अस्सी की संसद है....जहाँ बहस होती है, कटाक्ष होता है, और कभी-कभी सिर्फ खामोशी में गहरा अपनापन होता है। खुद लेखक भी उपन्यास में बतौर एक पात्र मौजूद रहते हैं ...कभी पर्यवेक्षक बनकर, तो कभी खुद बहस में कूदकर।
इस रचना की खास बात यह है कि यहाँ पात्रों के जरिए पूरा समाज बोलता है, कोई किरदार अकेला नहीं, वह अपने समय और समाज का प्रतिबिंब है।
उपन्यास जिन वर्षों की कहानी कहता है, वह 1990 से 1998 के बीच का वह दौर था जब भारतीय समाज में कई तहों पर खलबली मची हुई थी। मंडल आयोग ने सामाजिक समीकरण हिला दिए थे, धार्मिक राजनीति ने सदियों पुरानी धार्मिक समरसता को छिन्न-भिन्न करना शुरू कर दिया था, और वैश्वीकरण ने बनारसी जीवन की सहजता को तेज़ी से बदलती उपभोक्तावादी संस्कृति में ढालना शुरू कर दिया था।
अस्सी मोहल्ले की संस्कृति, जहाँ दिन की शुरुआत घाट पर गंगा स्नान और अंत पप्पू की चाय दुकान पर बहस के साथ होती थी, वह धीरे-धीरे बदलने लगी। अब लोग घंटों बैठकर गपशप नहीं करते, बहसें कम हो गईं, संवेदनाएँ सिकुड़ने लगीं।
इस बदलाव का सबसे बड़ा प्रतीक उपन्यास में तब सामने आता है जब लेखक बताते हैं कि अब अस्सी मोहल्ले का नाम बदलकर ‘तुलसी नगर’ रख दिया गया है। यह सिर्फ नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि लेखक के लिए उस संस्कृति का अंत था जिसमें बहस, तर्क, भांग, चाय, गाली और गंगा एक साथ रहते थे।
‘तुलसी नगर’ बनते ही जैसे लेखक की आत्मा चुभ जाती है। वे साफ समझते हैं कि अब चाय की दुकानों पर चर्चा नहीं, कमरों में सन्नाटा होगा; अब कविता पाठ की जगह टीवी का शोर होगा; और अब वह बनारसी जीवन जो गाली में भी अपनापन ढूंढ़ता था, वह इतिहास हो चला है।
इस पूरे उपन्यास की सबसे बड़ी ताकत इसकी भाषा है जो न केवल ठेठ बनारसी है, बल्कि इतनी जीवंत कि जैसे पात्र आपके सामने बोल रहे हों। यहाँ गालियाँ अपमान नहीं, अपनापन हैं। लेखक ने यह साबित कर दिया है कि साहित्यिक भाषा का अर्थ केवल साहित्यिक वाक्य नहीं, बल्कि वह जीवंतता है जो समाज की असल धड़कन को पकड़ सके।
‘काशी का अस्सी’ पढ़ते हुए यह साफ हो जाता है कि यह केवल एक मोहल्ले की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस पूरे दौर का सामाजिक, राजनीतिक विश्लेषण है जिसमें भारत अपने पुराने मूल्यों और नई आधुनिकता के बीच झूल रहा था।
यह उपन्यास अस्सी के जरिए पूरे देश की तस्वीर पेश करता है, जहाँ सामाजिक न्याय की माँगें, धार्मिक उन्माद, जातिवाद की राजनीति और उपभोक्तावादी जीवनशैली आपस में टकरा रही थीं।
लेखक का यह दर्द कि अस्सी अब तुलसी नगर बन चुका है, केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामूहिक है। वह हमें बताता है कि नाम बदल देने से आत्मा नहीं बदलती, लेकिन आत्मा खो देने से शहर, मोहल्ला और संस्कृति सब कुछ खो बैठते हैं।
इस उपन्यास को पढ़ना मतलब केवल अस्सी को जानना नहीं, बल्कि यह समझना है कि एक शहर कैसे धीरे-धीरे बदलते वक्त के साथ अपनी आत्मा खोता है। 'काशी का अस्सी' इस बदलाव की आखिरी गवाही है....एक बनारसी गवाही, जिसमें गाली भी है, ग़म भी है, और गंगा की मौन पीड़ा भी।